नई दिल्ली। भारतीय सेना के इतिहास में अहलावत परिवार आज एक ऐसा अध्याय जोड़ने जा रहा है, जो पीढ़ियों तक मिसाल बना रहेगा। एक ही प्रतिष्ठित कैवेलरी रेजिमेंट 1 हॉर्स (स्किनर्स हॉर्स) में लगातार पांच पीढ़ियों के अधिकारी के तौर पर सेवा देने की परंपरा अब नई पीढ़ी में प्रवेश कर रही है। परिवार की पांचवीं पीढ़ी के लेफ्टिनेंट शिवम अहलावत आज, 5 सितंबर 2026 को स्किनर्स हॉर्स में कमीशन प्राप्त करेंगे।
करीब 140 वर्षों से देशसेवा की इस सैन्य परंपरा में अहलावत परिवार की पांच पीढ़ियों ने युद्ध, अभियानों और चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों में अपनी जिम्मेदारी निभाई है। यह सिलसिला लेफ्टिनेंट शिवचंद अहलावत (1886-1918) से शुरू हुआ, जिन्होंने अफगानिस्तान में सेवा देने के साथ चीन के बॉक्सर विद्रोह और प्रथम विश्व युद्ध में भी हिस्सा लिया।
इसके बाद उनके बेटे कैप्टन दरयाव सिंह अहलावत (1918-1948) ने इस विरासत को आगे बढ़ाया। वे द्वितीय विश्व युद्ध के अनुभवी सैनिक रहे। तीसरी पीढ़ी में लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह अहलावत (1955-1982) ने स्वतंत्र भारत के सैन्य अभियानों में अपनी भूमिका निभाई। उन्होंने गोवा मुक्ति अभियान के साथ 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्धों में हिस्सा लिया और युद्ध के दौरान गंभीर रूप से घायल भी हुए।
कारगिल से लेकर पूर्वोत्तर तक निभाई जिम्मेदारी
चौथी पीढ़ी के कर्नल संदीप अहलावत (1993-2026) ने कारगिल संघर्ष और पूर्वोत्तर में उग्रवाद-विरोधी अभियानों में सेवा दी। उन्हें बाद में उसी रेजिमेंट की कमान संभालने का गौरव भी मिला। एक ही रेजिमेंट में लगातार चार पीढ़ियों की सैन्य सेवा का यह रिकॉर्ड लिम्का बुक ऑफ नेशनल रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया।

अब लेफ्टिनेंट शिवम अहलावत के कमीशन के साथ यह विरासत पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच रही है। यानी एक परिवार की पांच पीढ़ियां—ब्रिटिश भारत के युद्धक्षेत्रों से लेकर स्वतंत्र भारत के सैन्य अभियानों तक—एक ही रेजिमेंट की वर्दी में देश की सेवा करती रही हैं।
रेजिमेंट से रिश्ता बना परिवार की पहचान
23 फरवरी 1803 को गठित 1 हॉर्स (स्किनर्स हॉर्स) भारतीय सेना की सबसे पुरानी और प्रतिष्ठित कैवेलरी रेजिमेंटों में गिनी जाती है। अहलावत परिवार के लिए यह रेजिमेंट महज सैन्य इकाई नहीं, बल्कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती आई जिम्मेदारी, गौरव और अनुशासन की पहचान बन चुकी है।
परिवार की यह कहानी सिर्फ सैन्य सेवा की निरंतरता नहीं, बल्कि कर्तव्य, साहस, बलिदान और रेजिमेंटल गौरव की विरासत है। दो विश्व युद्धों से लेकर गोवा मुक्ति, 1965 और 1971 के युद्ध, कारगिल और उग्रवाद-विरोधी अभियानों तक परिवार की अलग-अलग पीढ़ियों ने देश की रक्षा में अपनी भूमिका निभाई।
अब परिवार को उम्मीद है कि पांच पीढ़ियों की इस असाधारण निरंतरता को गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में भी मान्यता मिलेगी। यदि ऐसा होता है, तो यह उपलब्धि अहलावत परिवार के साथ-साथ भारतीय सैन्य परंपरा के लिए भी गौरव का विषय होगी।

















