न्यायपालिका : ‘जो शरणार्थी नहीं, वह घुसपैठिया’
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न्यायपालिका : ‘जो शरणार्थी नहीं, वह घुसपैठिया’

मुख्य न्यायाधीश की कठोर टिप्पणियों ने उस इकोसिस्टम की बेचैनी बढ़ा दी है, जो वर्षों से रोहिंग्या घुसपैठियों को मानवाधिकार का आवरण देकर न्यायपालिका पर दबाव बनाने का प्रयास करता रहा है

Written byआशीष रायआशीष राय
Dec 16, 2025, 08:31 am IST
in भारत

अगर कोई घुसपैठ कर आता है, तो क्या हम उसके लिए रेड कार्पेट बिछाएं?’ यह टिप्पणी सामान्य टिप्पणी नहीं है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के द्वारा की गई इस टिप्पणी ने उस इकोसिस्टम के मुंह पर जोरदार तमाचा जड़ा है जो अपने छिपे मन्तव्यों के साथ न्यायालयों में याचिकाएं दायर करते हैं। दरअसल यह टिप्पणी रीता मनचन्दा के नाम से सर्वोच्च न्यायालय में दायर की गई एक बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका संख्या 505/2025 की सुनवाई के दौरान की गई। याचिका की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ के समक्ष हो रही थी। इस याचिका में हिरासत से पांच रोहिंग्याओं के गायब हो जाने के मुद्दे को उठाया गया था। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अन्य कई गंभीर टिप्पणियां कीं।

घुसपैठ का संकट

यह विवाद का विषय ही नहीं है कि भारत में रोहिंग्या घुसपैठिए हैं, न कि ‘पीड़ित’ शरणार्थी। इनको लेकर भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में दशकों से विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। अब तो यह समस्या पूरे भारत में विस्तारित होकर नासूर बन गई है। भारत में सीमावर्ती देशों से घुसपैठ की संभावनाएं बनी ही रहती हैं जोकि सुरक्षा कारणों से भी बेहद खतरनाक है। भारत सरकार ने तो रोहिंग्याओं को शरणार्थी मानने से मना भी कर दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शरणार्थियों को लेकर समस्या बनी हुई है। 14 दिसम्बर, 1950 को जिनेवा, स्विट्ज़रलैंड में संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी उच्चायुक्त (UNHCR) की स्थापना करके शरणार्थियों की मदद करने का जो निर्णय हुआ उस पर भारत ने सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए हस्ताक्षर करने से साफ मना कर दिया था।

इकोसिस्टम की बेचैनी

दरअसल पिछले कई साल से रोहिंग्याओं को लेकर अलग अलग तरह की याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में दायर करके भारत सरकार पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का काम इस इकोसिस्टम ने कर रखा है। रोहिंग्याओं के बच्चों को मुफ्त शिक्षा, स्वास्थ्य की मांग पर पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा था कि आखिर इस देश के संसाधनों पर अधिकार किसका है? न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि यहां के संसाधनों पर यह अधिकार भारत के नागरिकों का है।

तथाकथित मानवाधिकार के नाम पर एक गैंग इस देश में सक्रिय है जोकि अपने बयानों से, पत्रों के माध्यम से न्यायपालिका और कार्यपालिका पर निरंतर दबाव बनाने का काम करती है। मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान घुसपैठियों के गायब होने के खूब समाचार आ रहे हैं, इसी बीच पांच गायब हुए रोहिंग्याओं के नाम पर दायर की गई रीता मनचन्दा की याचिका में भारत सरकार को नोटिस जारी करा कर कई जानकारियां प्राप्त करने की कोशिश की गई । याचिका में सरकार से निर्वासन प्रक्रिया सहित अन्य कई विभागीय जानकारियां मांगी गई हैं। इसका विरोध करते हुए भारत के सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि याचिकाकर्त्ता का गायब हुए रोहिंग्याओं से कोई संबंध नहीं है, न ही यह याचिका उनके किसी परिजन ने लगाई है। यह याचिका केवल सरकार से जानकारी लेने के लिए लगाई है, इसलिए यह याचिका कानून सम्मत नहीं है। इसके बावजूद याचिकाकर्त्ता बार बार न्यायालय से सरकार को नोटिस जारी करने का अनुरोध करते रहे। मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने सरकार को नोटिस जारी करने से साफ मना कर दिया और याचिका को स्थगित कर दिया।

न्यायपालिका का दृढ़ मत

इस याचिका की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने प्रश्न किया कि “यदि उनके पास (रोहिंग्याओं) भारत में रहने की कोई कानूनी स्थिति नहीं है और वे घुसपैठिए हैं, उन्हें वापस भेजने में समस्या क्या है? यह भी पूछा कि क्या अवैध रूप से सीमा पार कर आए व्यक्तियों को भारतीय कानून के तहत पूरी प्रक्रिया संबंधी सुरक्षा का अधिकार मिल सकता है? न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने अन्य कई गंभीर टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा, “पहले आप आते हैं, आप अवैध रूप से सीमा पार करते हैं, सुरंग बनाकर या बाड़ काटकर भारत में घुस आते हैं और फिर कहते हैं कि अब जब मैं आ गया हूं तो आपके सारे कानून मुझ पर लागू हों, मैं भोजन, आश्रय, बच्चों की शिक्षा जैसी सुविधाओं का हकदार हूं। क्या हम कानून को इतना खींचें?” न्यायालय ने फिर कहा कि भारत सरकार ने रोहिंग्याओं को अब तक “शरणार्थी” घोषित नहीं किया है और अगर कोई “शरणार्थी” नहीं है तो उस व्यक्ति को अवैध घुसपैठिया या अवैध प्रवासी ही माना जाएगा।

मुख्य न्यायाधीश ने याचिका की सुनवाई के दौरान एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि “हमारे देश में भी गरीब लोग हैं। वे नागरिक हैं। क्या वे कुछ सुविधाओं के हकदार नहीं? पहले उन पर ध्यान क्यों न दें?” मुख्य न्यायधीश की इस टिप्पणी ने छद्म मानवाधिकारवादियों की नींद उड़ा रखी है। इस पोषित इकोसिस्टम ने मानवाधिकार के नाम पर बिना किसी पहचान पत्र के रोहिंग्याओं को मुफ्त स्वास्थ्य, बच्चों को सरकारी विद्यालयों में मुफ्त शिक्षा हेतु कई याचिकाएं सर्वोच्च न्यायालय में लगा रखी हैं और इनको अब डर सताने लगा है कि मुख्य न्यायाधीश की इन कड़ी टिप्पणियों के बाद उन याचिकाओं को भी सर्वोच्च न्यायालय कहीं खारिज न कर दे।

सरकार के विरुद्ध विमर्श गढ़कर बवाल करने वाले को जब इस बार मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी उनके मन्तव्य के अनुरूप नहीं लगी तो 5 दिसंबर 2025 को एक समूह द्वारा सार्वजनिक पत्र के माध्यम से टिप्पणी को असंवेदनशील और अमानवीय बताते हुए कहा गया कि ऐसी टिप्पणी निष्पक्षता के विपरीत है। पत्र में कहा गया कि रोहिंग्या जैसे शरणार्थियों को लेकर “घुसपैठिया”, “रेड-कार्पेट क्यों बिछाएं” जैसी टिप्पणियां मानव गरिमा के विपरीत दिखाई देती हैं।

इस पत्र के हस्ताक्षरकर्ताओं में प्रशांत भूषण, राजीव धवन, कॉलिन गॉनजलवेस जैसे नाम शामिल हैं। कहा गया कि सर्वोच्च न्यायालय का कार्य कमजोर, वंचित और अधिकारविहीन लोगों की रक्षा करना है। अब इन तथाकथित पोषित मानवाधिकारवादियों की यह कोशिश शुरू हो गई है कि मुख्य न्यायाधीश पर सवाल खड़ा करके उनको दबाव में लिया जाए ताकि उनके लंबे कार्यकाल के दौरान न्यायपालिका उनके अनुसार चल सके।

अब एक ऐसा भी वर्ग खड़ा हुआ है जोकि इस इकोसिस्टम का प्रत्युत्तर तुरंत देता है। तथाकथित पोषित मानवाधिकारवादियों के पत्र के जवाब में 10 दिसम्बर को 44 पूर्व न्यायाधीशों का भी एक पत्र जारी हुआ है। इस पत्र में पूर्व न्यायाधीशों ने कहा कि मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की टिप्पणियां न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा थीं और उन्हें व्यक्तिगत या पूर्वाग्रही रूप में पेश करना गलत है।

उन्होंने कहा कि न्यायालय की टिप्पणियों को गलत रूप में प्रस्तुत और विकृत किया गया है, और यह न्यायपालिका के विरुद्ध अभियान के रूप में देखा जाना चाहिए। इस पत्र में यह भी कहा गया कि अवकाश प्राप्त न्यायाधीश इस तरह की प्रायोजित आलोचना को स्वीकार्य नहीं करते हैं क्योंकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा करना आवश्यक है। आलोचना को एक प्रेरित/भड़काऊ अभियान बताया गया जो न्यायपालिका की स्वतंत्रता और प्रतिष्ठा को प्रभावित कर रहा है।

आजकल यदि कोई प्रशासनिक अधिकारी, न्यायिक अधिकारी देशहित की बात करे तो उसे एक मजहब विशेष के विरुद्ध बताने का विमर्श चला दिया जाता है। इस बार भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने साफ पूछ लिया है कि वैध दस्तावेज के बिना किसी को भी विशेष संरक्षण कैसे दिया जा सकता है? क्या राष्ट्रीय सुरक्षा में कानून का अनुपालन नहीं होना चाहिए?

ऐसे में इस इकोसिस्टम का खुला पत्र पोषित, प्रेरित और भड़काऊ अभियान से ज्यादा कुछ नहीं है क्योंकि ‘घुसपैठिया’ व ‘शरणार्थी’ शब्द सर्वोच्च न्यायालय की पीठ द्वारा केवल कानूनी संदर्भ में ही पूछे गए थे। लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के कड़े रूख से लगता है कि न्यायपालिका को ऐसे पत्रों के माध्यम से दबाव में लेने की इस इकोसिस्टम की चाल इस बार कामयाब नहीं होने वाली है।

Topics: सर्वोच्च न्यायालयमानवाधिकारघुसपैठियामुख्य न्यायाधीशइकोसिस्टमआशीष राय‘पीड़ित’ शरणार्थीअधिवक्ताFEATURED. पाञ्चजन्य विशेष
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