तमिलनाडु में लगातार हिंदुओं की भावनाओं पर कुठाराघात किया जा रहा है। यह भी देखा जा रहा है कि वहां जब भी डी.एम.के. की सरकार आती है, तो यह काम और तेज हो जाता है। इन दिनों एक ऐसा ही मामला चर्चा में है। यह मामला सुब्रमण्य स्वामी मंदिर से जुड़ा है। यह मंदिर मदुरै के पास तिरुपरंकुंद्रम में एक पहाड़ी पर स्थित है। न्यायालय के आदेश के बाद भी राज्य सरकार ने इस मंदिर में इस वर्ष कार्तिगई दीपम् का पवित्र त्योहार मनाने की अनुमति नहीं दी।
कार्तिगई दीपम् एक प्राचीन पर्व है, जो तमिल महीने कार्तिगई की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसे भगवान मुरुगन की जयंती के रूप में जाना जाता है। 3 दिसंबर को जब दीप प्रज्ज्वलन का समय आया, तो वहां न केवल दीप बुझा रहा, बल्कि भक्तों पर पुलिस की लाठियां बरसीं।
दरअसल, मंदिर के पास ही सिकंदर बदुशाह दरगाह है। इसी दरगाह की आड़ में राज्य सरकार ने हिंदुओं को अपना पर्व मनाने नहीं दिया। सरकार का कहना था कि मंदिर में पर्व मनाने से सांप्रदायिक सद्भाव बिगड़ सकता है। वास्तव में वर्षों से यहां दीपम् पर्व मनाने की परंपरा रही है। बाद में तमिलनाडु के मंदिरों पर अंग्रेजों ने कब्जा कर लिया। इस कारण इस मंदिर के अलावा और कई मंदिरों में परंपराएं टूटीं। किंतु भक्तों ने उस परंपरा को फिर से शुरू किया। कार्तिगई दीपम् का पर्व भी मनाया जाने लगा। चूंकि मंदिर सरकार के अधीन है इसलिए परंपरा को निभाने की कोई अनिवार्यता नहीं है।
इसलिए यह परंपरा कभी टूटी, तो कभी बनी। इसलिए एक भक्त मद्रास उच्च न्यायालय पहुंचा। मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के न्यायाधीश न्यायमूर्ति जी. आर. स्वामीनाथन ने उसकी अर्जी पर विचार किया और पर्व मनाने की अनुमति दे दी। अपने निर्णय में न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने कहा, “किसी धार्मिक परंपरा को मात्र ‘कानून-व्यवस्था’ के नाम पर रोका नहीं जा सकता…। यह बहाना राज्य की असफलता को छिपाने के लिए नहीं चल सकता।” उन्होंने स्पष्ट किया कि मंदिर केवल ‘सार्वजनिक संस्थान’ नहीं, बल्कि धार्मिक संप्रदाय की संपत्ति है, जिसका प्रबंधन राज्य की इच्छा या सुविधा का विषय नहीं हो सकता। उन्होंने कहा, “राज्य पुलिस सी.आई.एस.एफ. की मदद ले सकती है।” लेकिन राज्य सरकार ने इसे ‘राजनीतिक विचारधारा’ बताकर सर्वोच्च न्यायालय में अपील की।
इसके साथ ही राज्य सरकार और कुछ सेकुलर नेताओं ने यह कहना शुरू कर दिया कि न्यायमूर्ति स्वामीनाथन के आदेश से सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुंचा है। इसके बाद ‘इंडी’ गठबंधन के 112 सांसदों ने न्यायमूर्ति स्वामीनाथन को पद से हटाने के लिए महाभियोग लाने की प्रक्रिया शुरू कर दी। हालांकि महाभियोग एक कठिन प्रकिया है। इसे पारित कराना विपक्ष के बस की बात नहीं है। इसके बावजूद विपक्ष ने इसका नोटिस दिया है। ‘इंडी’ गठबंधन एक तरह से न्यायमूर्ति स्वामीनाथन को इस बात के लिए दंडित करना चाहता है कि उन्होंने कैसे हिंदुओं को पूजा की अनुमति दे दी। यह बहुत ही गंभीर मामला है।
कह सकते हैं कि हिंदुओं और उनके मंदिरों को न्याय दिलाना आज कुछ राजनीतिक शक्तियों को बर्दाश्त नहीं है। यह केवल एक न्यायाधीश पर हमला नहीं, बल्कि पूरे देश में हिंदू अस्मिता, मंदिर अधिकारों और धार्मिक परंपराओं की रक्षा करने वाले सभी लोगों को राजनीतिक रूप से डराने की कोशिश है। यदि मंदिर को न्याय देने के लिए न्यायाधीश को ही कठघरे में खड़ा किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि राजनीतिक दमन का संकेत है। यह स्थिति पूरे भारत के लिए चेतावनी है कि मंदिरों की स्वतंत्रता का संघर्ष केवल प्रशासन के खिलाफ नहीं, बल्कि उस राजनीति के खिलाफ भी है जो हिंदू परंपराओं को कमजोर कर अपने हित साधना चाहती है। क्या हिंदू मंदिरों को अपनी ही भूमि पर धार्मिक अधिकारों के लिए अदालतों की शरण लेनी पड़ेगी? और क्या न्यायपालिका को धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करने पर राजनीतिक प्रतिशोध का सामना करना पड़ेगा?

प्रिवी काउंसिल का निर्णय
न्यायमूर्ति स्वामीनाथन ने 1923 की सिविल कोर्ट डिक्री और 1931 के प्रिवी काउंसिल के निर्णय को आधार बनाया। बता दें कि 25 अगस्त, 1923 को प्रिवी काउंसिल ने इस मंदिर को लेकर एक फैसला दिया था। उसमें मंदिर प्रबंधन को पहाड़ी का मालिक माना गया। सिर्फ कुछ कब्जे वाली जमीन (नेलिथोप्पु, मंडपम, मस्जिद की सीढ़ियां, और मुसलमानों का झंडा) को बाहर रखा गया। माना गया कि पहाड़ी का खाली हिस्सा बहुत पुराने समय से मंदिर का था। इस तरह 1923 में पहाड़ी पर मंदिर का अधिकार पक्के तौर पर तय हो गया। दीपाथून (पत्थर का लैंप पिलर) हिंदुओं का है और मस्जिद से 50 मीटर दूर है। इसके बाद 21 नवंबर, 1996 को भी एक निर्णय आया। इसमें कहा गया कि मंदिर प्रबंधन को दरगाह की नजदीकी का ध्यान रखना चाहिए और कम से कम 15 मीटर दूर जगह चुननी चाहिए, क्योंकि दीपाथून दरगाह से 50 मीटर दूर है, इसलिए वहां दीप जलाने से दरगाह पर कोई असर नहीं पड़ता। इन तथ्यों को राज्य सरकार नजरअंदाज कर रही है।
ऐसे हुआ मंदिरों पर कब्जा
जब अंग्रेज तमिलनाडु पहुंचे और उन्होंने देखा कि मंदिरों के पास असीम संपत्ति और प्रभाव है, तो उन्होंने पहली बार मंदिरों को ‘राजस्व और प्रशासनिक संस्थान’ की तरह देखना शुरू किया। 1817 में लाए गए मद्रास रेगुलेशन-VII ने पहली बार हिंदू मंदिरों को ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकार में रख दिया। इस कानून के बाद जिलाधिकारी और राजस्व अधिकारी मंदिरों के सभी प्रशासनिक निर्णयों के प्रभारी बना दिए गए। यानी मंदिर अब समुदाय की संपत्ति नहीं, बल्कि कंपनी के नियंत्रण वाले ‘सार्वजनिक संस्थान’ बन गए।
इसके थोड़े ही समय बाद ईसाई मिशनरियों ने यह तर्क देना शुरू किया कि ब्रिटिश सरकार ‘मूर्ति पूजा’ पर पैसा कैसे खर्च कर सकती है? उनके दबाव के कारण 1840 में ब्रिटिश सरकार ने घोषणा की कि वह मंदिरों के प्रत्यक्ष प्रबंधन से हट रही है, लेकिन पीछे से उसने उनका पूरा रिकॉर्ड, राजस्व और भूमि पर निगरानी बनाए रखी। इस तरह मंदिरों से हाथ हटाने का दावा केवल दिखावा था-प्रशासनिक पकड़ बनी रही।

1863 में एक नया कानून बना जिसने मंदिरों को अर्ध-सरकारी स्वरूप दे दिया। ये संस्थान न तो पूरी तरह सरकारी थे, न पूरी तरह स्वतंत्र। अंग्रेजों ने उन्हें ऐसे ढांचे में डाल दिया जिसमें सरकार का दखल हमेशा बना रहे, लेकिन जिम्मेदारी कम रहे। यह मॉडल आगे चलकर 1920 के दशक में मद्रास हिंदू धार्मिक बंदोबस्ती (एम.एच.आर.ई.) अधिनियम के रूप में विकसित हुआ। 1923 से 1927 के बीच बने कानूनों ने पहली बार तमिलनाडु में केवल हिंदू मंदिरों को सरकार के अधीन कर दिया, जबकि चर्च, मस्जिद और वक्फ पूरी तरह स्वतंत्र रहे। यही वह ऐतिहासिक अन्याय है जिसने आने वाले वर्षों में हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (एच.आर.सी.ई.) जैसे विभागों की नींव रखी। 1920 के दशक में ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाया गया यह ‘मंदिर बोर्ड मॉडल’ स्वतंत्र भारत में और मजबूत हो गया। 1951 और 1959 में कांग्रेस सरकारों ने इन ब्रिटिश कानूनों को जस का तस अपनाकर (एच.आर.सी.ई.) विभाग बना दिया, जो आज 38,000 से अधिक मंदिरों को नियंत्रित करता है।
संविधान के मूल अधिकारों के साथ टकराव
तमिलनाडु में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण केवल प्रशासनिक मुद्दा नहीं है; यह सीधे-सीधे भारत के संविधान के मूल अधिकारों से टकराता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 प्रत्येक नागरिक और संप्रदाय को मजहबी स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं। अनुच्छेद 25 व्यक्ति को अपने धर्म का पालन, प्रचार और अभ्यास करने का अधिकार देता है; वहीं अनुच्छेद 26 मजहबी संप्रदायों को अपनी पांथिक संस्थाओं का प्रबंधन करने, धार्मिक और आर्थिक निर्णय स्वयं लेने और अपनी संपत्ति का स्वामित्व सुरक्षित रखने का अधिकार देता है। इन दोनों प्रावधानों का उद्देश्य यह था कि भारत एक ऐसा राष्ट्र बने, जहां राज्य और धर्म के बीच संतुलित दूरी बनी रहे यानी सरकार किसी पंथ या पांथिक संस्था के आंतरिक मामलों में दखल न दे।
लेकिन तमिलनाडु में लागू एम.एच.आर.ई. अधिनियम संविधान की इस मूल भावना के विपरीत खड़ा है। यह कानून केवल हिंदू धार्मिक संस्थाओं पर लागू होता है, जबकि अन्य मत-पंथों की संस्थाएं- चर्च, मस्जिद, वक्फ- पूरी तरह स्वायत्त रहती हैं। राज्य का मंदिरों के आंतरिक प्रशासन, उनकी आर्थिक संपत्ति, दान, भूमि और धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप करना अनुच्छेद 26 का सीधा उल्लंघन है, जो किसी भी पांथिक संप्रदाय को अपनी संस्था का प्रबंधन करने और उसकी संपत्ति का संचालन करने का अधिकार देता है।
यदि सदियों से एक परंपरा बिना किसी समस्या के चलती रही है, तो अचानक उसे प्रतिबंधित करना क्या पांथिक स्वतंत्रता का उल्लंघन नहीं है? अदालतें कई बार कह चुकी हैं कि धार्मिक प्रथाएं केवल तब रोकी जा सकती हैं, जब उनका उद्देश्य समाज को नुकसान पहुंचाना हो; लेकिन तमिलनाडु में अक्सर हिन्दू परंपराओं पर कुठाराघात ही प्रशासन की पहली प्रतिक्रिया होती है, समाधान ढूंढना नहीं।

















