हिमाचल के सिरमौर और उत्तराखंड के जौनसार बावर के रक्षक और कुलदेव माने जाते महासू देवों में से सबसे छोटे चालदा महासू जी महाराज पहली बार टोंस नदी पार कर अगले कुछ माहों तक सिरमौर में रहेंगे। महासू महाराज को शिव अवतार के रूप में मान्यता है। टोंस नदी किनारे हनोल में चालदा जी के तीन बड़े भाई विराजमान हैं। इन्हें बासिक जी महाराज, बूठिया जी महाराज बोला जाता है। जबकि छत्र धारी चालदा जी महाराज पालकी में भ्रमण पर रहते हैं।
सिरमौर और जौनसार बावर जनजाति के कुलदेव माने जाते हैं। वे जहां रुकते हैं क्षेत्र के लोग वहां पहले उनके लिए मंदिर बनवाते हैं और प्रतिदिन भंडारे की व्यवस्था करते हैं। आमतौर पर एक खत में महाराज करीब एक से डेढ़ वर्ष तक प्रवास करते हैं। देवभूमि उत्तराखंड और हिमाचल की सीमांत जौनसार बावर सिरमौर संस्कृति का प्रमुख धार्मिक आयोजन चालदा महासू देवता की हिमाचल यात्रा इस वर्ष 13 से 14 दिसंबर तक भव्य रूप में संपन्न हो गई है।
एक मंदिर से दूसरे मंदिर तक प्रस्थान की प्रक्रिया है यात्रा
यह यात्रा देवता के एक पवित्र मंदिर समूह से दूसरे मंदिर तक प्रस्थान की पारंपरिक प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें हजारों श्रद्धालु और कारसेवक सम्मिलित होते हैं। यह महान देव यात्रा देवता की दिव्य परंपराओं, धार्मिक अनुष्ठानों और गूढ़ शैव मत परंपराओं से ओत-प्रोत होती है। इस बार खास बात ये कि चालदा महासू जी महाराज पहली बार टोंस नदी को पार कर हिमाचल में प्रवास करेंगे। इस यात्रा में सबसे आगे देवता के ध्वज (नेजा) चल रहे हैं जिन्हें उठाने का दायित्व नेजायिकों का होता है, जिनकी संख्या लगभग 50 रहती है।
इनके पश्चात अष्टधातु से निर्मित चरटा घड़ा उठाया जाता है, जिसमें चार भैरवों का वास माना जाता है। इसे उठाने वाले पारंपरिक सेवक तम्बूआइक कहलाते हैं, जिनकी संख्या लगभग 21 होती है।इसके बाद चालीस मीटर लंबे सफेद छत्र के रूप में काली माता और चौसठ योगिनियों का प्रतीक छत्र रूपी पवित्र ध्वज चलता है। इस वर्ष इसे उत्तराखंड के ख़त देवघार से 35 ग्रामों के छतराइकों द्वारा टौंस नदी पार, मीनस पुल से उठाया जाएगा, जहां लगभग दो हजार श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना है।
मुख्य मध्य भाग में स्वयं चालदा महासू देवता की स्वर्ण-रजत निर्मित पालकी चलती है जिसे थानी समुदाय के कारसेवक उठाते हैं। इनके साथ माली, पाश्वा और अन्य सेवक होते हैं जो यात्रा के दौरान देवता की इच्छा अनुसार लोगों की समस्याओं का समाधान भी करते हैं। पूरे आयोजन की व्यवस्था और परंपरागत संचालन बजीर के दिशा-निर्देशन में होता है।
न्याय देव माने जाते हैं महासू देवता
इस बार यह दायित्व ग्राम बास्तील, खत वावर के श्री दीवान सिंह राणा निभा रहे हैं। लोक विश्वास के अनुसार, चालदा महासू देवता न्याय देव हैं जो अपने भक्तों के जीवन से जुड़े विवादों और प्रश्नों का दिव्य दृष्टि से निर्णयन करते हैं।हजारों की संख्या में श्रद्धालु इस दिव्य यात्रा का हिस्सा बनकर आस्था, परंपरा और लोक संस्कृति के इस अनुपम संगम के साक्षी बन रहे हैं
चालदा महासू महाराज जी के जो बकरे हैं वो पहले ही हिमाचल के पश्मी गांव जिला सिरमौर में पहुंच गए हैं जो 300 से 400 किमी अपने आप चलकर आए हैं। कहते हैं जहां महाराज को अपना प्रवास करना होता है ये बकरे वहां पहले ही स्वयं पहुंच जाया करते हैं। श्रद्धालु इनकी भी पूजा करते हैं। ये शुभ चिन्ह माना जाता है कि ये बकरे जहां जाते हैं वही महाराज अपना प्रवास रखते हैं। लॉक डाउन के कुछ समय बाद एक विशाल बकरा द्राबिल आ गया था तभी ये अनुमान लगाया जा रहा था कि छत्र धारी चालदा जी महाराज हिमाचल आ सकते हैं।
हिमाचल की ओर बढ़े छत्रधारी चालदा महाराज
बीते कल जौनसार बावर छोड़कर छत्रधारी चालदा महाराज हिमाचल की राह पर बढ़ गए। पिछले सोमवार को दसऊ मंदिर से हिमाचल प्रदेश के पश्मी प्रवास पर निकले छत्रधारी चालदा महासू महाराज ने शनिवार को टोंस नदी पार कर हिमाचल की सीमा में प्रवेश किया। इस मौके पर टोंस के दोनों छोर पर आस्था का अपार सैलाब उमड़ पड़ा। एक किनारे श्रद्धालु नम आंखों से अपने आराध्य देव को विदाई दे रहे थे। दूसरे छोर पर देवता की अगवानी करने पहुंचे श्रद्धालुओं की आंखें खुशी से छलक पड़ीं। इस दौरान पूरी टोंस घाटी चालदा महासू महाराज के जयकारों से गूंजती रही।
इधर, एक छोर पर श्रद्धालु देव गीत ‘ना तेरी बागड़ी सूणी ना बरांशा का फेरा, इक साल के अब त सूणा पश्मी तेरा डेरा…’ उधर टोंस के दूसरे छोर पर ‘स्वागत की करो तैयारी, आ रहे हैं छत्रधारी’ के जयकारे लगते रहे। हिमाचल उत्तराखंड के बीच बने मीनस पुल पर हजारों लोग सिरमौर घाटी के जमा हुए और महाराज की पालकी को जयकारों के साथ लेकर आगे बढ़े। हिमाचल सरकार में मंत्री, विधायक भी स्वागत के लिए खड़े थे।

















