वंदे मातरम्: जब मां का सम्मान भी राजनीति का विषय बन जाए
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वंदे मातरम्: जब मां का सम्मान भी राजनीति का विषय बन जाए

संसद में जब वंदे मातरम् पर चर्चा हुई तो कई स्वर उठे-“इंडिगो पर बात क्यों नहीं?”, “बेरोज़गारी पर क्यों नहीं?”, “रुपये के गिरने पर चर्चा क्यों नहीं?”। प्रश्न यह नहीं है कि इन मुद्दों पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए, होनी चाहिए पर प्रश्न यह है कि ये सारी बातें ठीक उसी समय क्यों उठीं जब बात वंदे मातरम् की हो रही थी?

Written byदीपक द्विवेदीदीपक द्विवेदी
Dec 14, 2025, 08:11 am IST
inभारत, विश्लेषण

संसद में जब वंदे मातरम् पर चर्चा हुई तो कई स्वर उठे-“इंडिगो पर बात क्यों नहीं?”, “बेरोज़गारी पर क्यों नहीं?”, “रुपये के गिरने पर चर्चा क्यों नहीं?”। प्रश्न यह नहीं है कि इन मुद्दों पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए, होनी चाहिए पर प्रश्न यह है कि ये सारी बातें ठीक उसी समय क्यों उठीं जब बात वंदे मातरम् की हो रही थी? क्या वंदे मातरम् बोलना, उसकी 150वीं जयंती मनाना, उन अनगिनत बलिदानों को स्मरण करना जो इसकी आवाज पर आज़ादी की लड़ाई लड़ते रहे को स्मरण करना गलत है।

जब मातृभूमि के सम्मान की बात आती है, तभी बाकी मुद्दों को ‘ढाल’ बनाकर आगे क्यों कर दिया जाता है? क्या यह वास्तविक विमर्श है या भारतीय पहचान को कमजोर करने की सोची-समझी राजनीति?

वंदे मातरम् : वह गीत जिसने अनगिनत अनाम बलिदानों को स्वर दिया

1875 में बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा लिखित ‘वंदे मातरम्’ केवल कविता नहीं थी- यह राष्ट्र चेतना का प्रथम घोष था। 1905 के बंग-भंग आंदोलन में यह गीत स्वदेशी आंदोलन का युद्ध-नाद बन गया। ब्रिटिश पुलिस इसके उच्चारण से भी डरती थी। स्कूलों, जुलूसों, छात्र आंदोलनों में जब यह ध्वनि उठती थी वंदे मातरम् तो अंग्रेजों की रीढ़ कांप जाती थी। आज वही गीत, जिसकी धुन पर अरविंद घोष ने आध्यात्मिक राष्ट्रवाद का दर्शन दिया, तिलक ने स्वराज्य की आग जगाई, लाला हरदयाल, चाफेकर बंधु, भूपेन्द्र दत्त, शहीद-ए-आजम भगत सिंह प्रेरित हुए उसे संसद में भी सम्मान देने पर विवाद खड़ा किया जा रहा है। क्या यही 150 वर्षों की तपस्या का परिणाम है? यह वह गीत है जो धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र की सीमाओं से ऊपर उठकर हर भारतीय के हृदय में गूंजता था और गूंजना चाहिए था। पर विडंबना देखिए , जिस गीत ने भारत को एक ध्वज की तरह एकजुट किया, उसे संविधान में पूरा सम्मान न दे पाना तुष्टिकरण की राजनीति का सबसे दुखद उदाहरण रहा। आज भी संसद में वही प्रवृत्ति जारी है जहां जिसे मां कहना चाहिए, उसे विवाद का विषय बना दिया जाता है।

मातृभूमि और जन्मदात्री-दोनों का सम्मान संस्कृति का आधार

जब बात मातृभूमि की होती है, तो वह किसी एक धर्म की मां नहीं होती; वह उस भूमि की मां होती है , जिसकी मिट्टी से अन्न मिलता है, जिसके जल से जीवन टिकता है, जिसकी वायु से श्वास चलता है, जिसकी गोद में हमारी सभ्यताएं फली-फूलीं। जो व्यक्ति अपनी जन्मदात्री मां को सम्मान देता है पर धात्री मां भारत माता को सम्मान देने में हिचकता है, उसे क्या यह नैतिक अधिकार है कि वह देश से कुछ मांगे? आज कई पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी अपने सामाजिक माध्यमों पर वंदे मातरम् के विरुद्ध लिखकर अपने बौद्धिक पाखंड का प्रदर्शन कर रहे हैं। क्या यही राष्ट्रप्रेम की आधुनिक परिभाषा है?

वंदे मातरम् से इतनी समस्या क्यों?

भारत जैसे देश में जहाँ मातृत्व जीवन का सबसे बड़ा प्रतीक है, वहाँ अपनी मातृभूमि को “वंदे”—अर्थात नमन—कहना क्या इतना कठिन है? क्या यह गीत किसी एक समुदाय के लिए लिखा गया था? नहीं। क्या यह किसी राजनीतिक विचारधारा का प्रतीक था? नहीं। यह तो वह ध्वनि थी जिसने गुलामी में टूटे देश को एकता और संकल्प का संबल दिया। फिर आज वही गीत कुछ लोगों के लिए असहजता का कारण क्यों बन रहा है? क्यों उसका उच्चारण उन्हें असहज करता है? क्या इसलिए कि यह गीत भारतीयता की ऐसी पहचान है जो किसी राजनीतिक समीकरण में फिट नहीं बैठती?

जब संसद में एक स्वर होना चाहिए था , वंदे मातरम् की चर्चा संसद में आई। जो होना चाहिए था, वह यह पूरी संसद एक स्वर में वंदे मातरम का उद्घोष करती। यह केवल राष्ट्रगीत का सम्मान नहीं होता, यह उन वीरों के प्रति कृतज्ञता होती जिन्होंने “मां, हम तेरे हैं” कहकर अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।

तुष्टिकरण ने देश का विभाजन किया

तुष्टिकरण ने इस देश को पहले भी बांटा था। आज भी वही मानसिकता सक्रिय है, बस भाषा बदल गई है, चेहरे नए हैं। जो लोग वंदे मातरम् से असहज हैं, वे अनजाने में या जानबूझकर भारतीय आत्मा के तंतुओं को काट रहे हैं। विभाजन की आग बाहरी ताकतें नहीं लगातीं , वह भीतर बैठे ऐसे ही विचारक सुलगाते हैं, जो अपनी ही मातृभूमि की स्तुति को प्रतिरोध का विषय बना देते हैं।

150 वर्ष बाद आज आवश्यकता इस बात की है कि हम स्वयं से यह प्रश्न पूछें कि क्या हम उस गीत का सम्मान नहीं कर सकते जिसने भारतीयता को सांस दी? वंदे मातरम् न किसी दल का नारा है, न किसी विचारधारा का घोष। यह भारत की आत्मा का स्पंदन है। जो राष्ट्र अपनी मां का सम्मान नहीं करता, वह न प्रगति कर सकता है, न एकता बनाए रख सकता है। आज आवश्यकता है कि हम राजनीति के शोर में खोई उस मूल भावना को फिर से जगाएँ, जो हर भारतीय के हृदय की गहराई में अब भी गूँजती है । वंदे मातरम् केवल गीत नहीं भारतीयता का चिरंतन स्पंदन है।
वंदे मातरम्।

Topics: संस्कृति का आधारवंदे मातरम्पाञ्चजन्य विशेषमातृभूमिदीपक द्विवेदीभारतीय आत्मा
दीपक द्विवेदी
दीपक द्विवेदी
सिविल सेवा विशेषज्ञ , इतिहास संकलन समिति, जनजाति कल्याण केंद्र। इतिहास , भारतीय ज्ञान परम्परा एवं विभिन्न विमर्श पर वैचारिक लेखन और उद्बोधन। [Read more]
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