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गलत सोच, गंभीर संकेत

मदनी सीधे तौर मुसलमानों को बरगलाने का काम कर रहे हैं। जिहाद को फर्ज बताते हुए वे सर्वोच्च न्यायालय पर सवाल उठा रहे हैं। लेकिन मुसलमानों को सरकार द्वारा उनके उत्थान के लिए चलाई जा रही योजनाओं की बात नहीं बताते

Written byमृदुल त्यागीमृदुल त्यागी
Dec 11, 2025, 02:51 pm IST
in विश्लेषण
महमूद मदनी 29 नवंबर को भोपाल में आयोजित जमीयत-उलमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय संचालन समिति की बैठक में जिहाद को फर्ज बताने जैसा विवादस्पद बयान दिया।

महमूद मदनी 29 नवंबर को भोपाल में आयोजित जमीयत-उलमा-ए-हिंद की राष्ट्रीय संचालन समिति की बैठक में जिहाद को फर्ज बताने जैसा विवादस्पद बयान दिया।

अभी देश 10 नवंबर के लालकिला बम हमले से उबरा नहीं है। पूरे देश में आंतकवादी नेटवर्क की धरपकड़ चल रही है लेकिन उधर जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद मदनी जिहाद का ऐलान कर रहे हैं। वह इसे मुसलमानों के लिए ‘फर्ज’ बता रहे हैं। 10 नवंबर को दिल्ली में लाल किले के पास डॉक्टर उमर मोहम्मद ने विस्फोटकों से लदी कार से आत्मघाती हमला किया था।

मृदुल त्यागी
वरिष्ठ पत्रकार

मदनी कह रहे हैं और डॉक्टर उमर ने यह कर डाला। क्या अंतर है दोनों में? यह सवाल इसलिए भी ज्यादा पुख्ता हो जाता है क्योंकि देश में इसके खिलाफ कहीं कोई जिम्मेदार मुस्लिम आवाज सुनाई नहीं देती। हिंदुस्थान को ‘अपना’ मानने का दावा करने वाले, ‘किसी के बाप का हिंदुस्थान थोड़ी है’ जैसे जुमले उछालने वाले इस पर खामोश हैं, तो सवाल बनता है। जमीयत जैसे संगठनों का अस्तित्व ही इस बात पर टिका है कि मुसलमान डरे रहें। इसी के चलते मदनी हों या असदुद्दीन ओवेसी जैसे नेता, ‘मुसलमानों पर जुल्म’ की तकरीरों से आगे न बढ़ सके। कांग्रेस के नेतृत्व वाले समूचे विपक्ष को यह नैरेटिव भाता है, क्योंकि उनकी राजनीति भी इसी बात पर टिकी है कि मुसलमानों को डराकर केंद्र की भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ लामबंद वोटबैंक बनाया जा सके।

सर्वोच्च न्यायालय पर उठाई अंगुली

मौलाना महमूद मदनी 29 नवंबर को भोपाल के एक कार्यक्रम में थे। उन्होंने आरोप लगाया कि सर्वोच्च न्यायालय केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहा है। उन्हें ऐसा इसलिए लगा क्योंकि अयोध्या में राम जन्मभूमि स्थल और तीन तलाक के मसले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मुस्लिम कट्टरपंथियों की पसंद के अनुसार नहीं आया। यहां उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से ज्यादा खुद को संविधान का जानकार मानते हुए दावा किया कि सर्वोच्च न्यायालय तभी सर्वोच्च न्यायालय कहलाने का हकदार है, जब वह संविधान का पालन करे और कानून को कायम रखे। अगर वह ऐसा नहीं करता, तो वह सर्वोच्च न्यायालय कहलाने का हकदार नहीं है। यानी फैसला राम मंदिर के पक्ष में आया हो, या फिर तीन तलाक के उत्पीड़न से गुजरने वाली मुस्लिम महिलाओं के हक में, मदनी को लगता है कि ये संविधान के अनुसार नहीं है। मदनी के शब्दकोश में सर्वोच्च न्यायालय तभी सर्वोच्च न्यायालय है, जब वह मुसलमानों की गलत जिद, दकियानूस प्रथाओं के हक में रहे।

मदनी ने कहा कि ‘जब–जब जुल्म होगा, तब–तब जिहाद होगा। जिहाद इस्लाम में फर्ज़ है। कुरान में इस शब्द का इस्तेमाल उत्पीड़न और हिंसा समाप्त करने के लिए किया गया है।’ मदनी यह न बता सके कि वह कौन सा जुल्म मुसलमानों पर हो रहा है, जिसके मुकाबले के लिए वह जिहाद का आह्वान कर रहे हैं। हालांकि उन्होंने लव जिहाद, लैंड जिहाद, एजुकेशन जिहाद और थूक जिहाद जैसे शब्दों का इस्तेमाल करके दावा किया कि इससे मुसलमानों को बहुत दुख पहुंचाया जाता है, उनके मजहब का अपमान किया जाता है। लेकिन वह इन तमाम किस्म के जिहाद से जुड़ी घटनाओं में से किसी एक का भी तर्कपूर्ण खंडन न कर सके।

उन्होंने कुछ राज्यों में लागू कन्वर्जन कानून पर भी निशाना साधा, कहा कि ‘ये मजहबी स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। किसी मजहब विशेष का पालन करने वाले को डराया जा रहा है, सजा दी जा रही है। दूसरी तरफ घर–वापसी के नाम पर कन्वर्जन की खुली छूट है।’ मौलाना मदनी जैसे लोग जब ये दलीलें देते हैं, तो छांगुर बाबा जैसे लोगों को सुविधापूर्ण तरीके से भूल जाते हैं। जलालुद्दीन नाम के इस व्यक्ति ने 1500 से अधिक लोगों का कन्वर्जन कराया। सौ करोड़ से ऊपर की संपत्ति जुटाई और हिंदू लड़कियों को मुसलमान बनाने के लिए खास ‘रेट लिस्ट’ निकाली। छागुर बाबा अपने एजेंटों को कन्वर्जन करवाने पर बाकायदा फीस देता था, राजपूत और ब्राह्मण लड़की का कन्वर्जन कराने पर 15-16 लाख रुपए, पिछड़े वर्ग के लिए 10-12 लाख और दलितों के लिए 8-10 लाख रुपए तक दिए जाते थे।

नीति और नीयत में खोट

कहने को जमीयत एक गैर राजनीतिक संगठन है, लेकिन यह खुद को मुसलमानों की राजनीति का रहनुमा मानता है। इसी साल 24 जुलाई को दिल्ली के पांच सितारा होटल में जमीयत ने विपक्षी दलों के नेताओं के लिए खासतौर पर भोज का आयोजन किया था। खुद मदनी, जो कि राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं, ने इस बैठक की अध्यक्षता की। इसमें कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, भीम आर्मी जैसे हिन्दू विरोधी दलों के नेता शामिल थे। इस बैठक में उत्तर प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ होने वाली बुलडोजर कार्रवाई, लव जिहाद और बिहार में मतदाता सूचियों के विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) जैसे मसलों पर चर्चा हुई। जमीयत और मदनी पिछले कुछ समय से यह प्रयास करते रहे हैं कि जैसे ही कोई राष्ट्र या हिंदू धर्म विरोधी गतिविधि सामने आए, वह मुद्दों को भटका सकें। छांगुर बाबा वाले मामले के बाद से वह कन्वर्जन कानून के खिलाफ लामबंदी कर रहे हैं। इसके साथ ही राजस्थान में कन्हैयालाल हत्याकांड को लेकर बनी फिल्म पर रोक लगवाने के लिए वह कपिल सिब्बल की मदद लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गए। अब लालकिले के पास हुए बम धमाके के बाद वह मुसलमानों पर जुल्म और जिहाद की बातें कर रहे हैं, तो समझा जा सकता है कि उनकी नीति और नीयत क्या है।

कौन हैं महमूद मदनी

महमूद मदनी जमीयत-ए-उलेमा-ए-हिंद (जेयूएच) के सदर हैं। वह मौलाना सैयद हुसैन अहमद मदनी के पोते और मौलाना असद मदनी के बेटे हैं। देवबंद के दारुल उलूम से तालीम लेने के बाद वह लगातार जेयूएच में सक्रिय रहे। 2001 में संगठन के महासचिव बने। 2006 से 2012 तक राज्यसभा सदस्य रहे। मदनी परिवार का जमीयत पर एकछत्र राज रहा है। 1940 में हुसैन मदनी जमीयत के अध्यक्ष बने थे। इसके बाद से इसी परिवार के पास संगठन का नेतृत्व है।

क्या है जमीयत

जमीयत की स्थापना 1919 में हुई थी। इस समय जमीयत की देश में 1700 शाखाएं सक्रिय हैं। यह अपनी सदस्य संख्या एक करोड़ से अधिक बताता है। जमीयत का काम चंदे के साथ–साथ सदस्यता शुल्क से प्राप्त होने वाली धनराशि से चलता है। आरोप है कि इसे राजनीतिक फंडिंग भी मिलती है।

हर आतंकवादी का पैरोकार

जेयूएच एक ऐसा संगठन है, जिसके दो चेहरे हैं। जमीयत ने 2001 में प्रस्ताव पास किया कि ‘आतंकवाद जिहाद नहीं, फसाद है।’ इसके अलावा इस संगठन ने आतंकवाद के खिलाफ कई सम्मेलन किए। लेकिन हकीकत में यह आतंकवाद की घटनाओं के आरोपियों का सबसे बड़ा पैरोकार है। इस काम के लिए जमीयत के भीतर बाकायदा एक कानूनी प्रकोष्ठ है, जो देशभर में आतंकवादी गतिविधियों में शामिल लोगों की कानूनी व आर्थिक मदद करता है।

खुद संगठन की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि इसने सात सौ से अधिक मामलों में ऐसे मुस्लिम आरोपियों की मदद की है, जिन पर आतंकवाद या राष्ट्र विरोध के आरोप थे। एक रिपोर्ट के अनुसार 2007 से अब तक इस तरह के 192 अभियुक्त जेयूएच की मदद से कानूनी मदद पाकर रिहा हो चुके हैं। ये इसलिए रिहा नहीं हुए क्योंकि ये निर्दोष थे, बल्कि अधिकतर में तकनीकी कारणों से इन्हें दोषमुक्त किया गया। हालांकि जमीयत इन्हें निर्दोष बताता है। कुछ उदाहरण देखिए :-

  •  18 अक्तूबर को लखनऊ के खुर्शीद बाग कॉलोनी में हिंदू नेता कमलेश तिवारी की गला रेतकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले के आरोपियों की पैरवी जमीयत की ओर से की गई। इस हत्याकांड के मास्टरमाइंड सैयद आसिम अली को ज़मानत दिलाने के लिए सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी की गई। जुलाई 2024 में इसे जमानत मिल भी गई। जमीयत की पैरोकारी के चलते कुल 13 आरोपियों में से नौ जमानत पर जेल से बाहर आ गए।
  •  उत्तर प्रदेश में ही आतंकवाद निरोधक दस्ते (एटीएस) द्वारा मिनहाज अहमद और मसीरुद्दीन को गिरफ्तार किया गया। इनके पास से प्रेशर कुकर बम और सात किलो विस्फोटक बरामद हुआ। ये दोनों ही कथित तौर पर अल–कायदा से जुड़े थे। इनकी कानूनी पैरवी जमीयत ही कर रहा है।
  •  13 फरवरी 2010 को पुणे जर्मन बेकरी बम विस्फोट मामले में 17 लोगों की मौत हुई थी। इंडियन मुजाहिदीन के आतंकवादी मिर्जा बेग को इस मामले में गिरफ्तार किया गया। इसकी पैरवी की जिम्मेदारी भी जमीयत ने ही उठाई।
  •  19 सितंबर 2010 को दिल्ली में जामा मस्जिद के बाहर एक कार में बम धमाका हुआ। इस मामले में इंडियन मुजाहिदीन के 13 आतंकवादियों को अभियुक्त बनाया गया। इसमें कुख्यात यासीन भटकल भी शामिल था। इनकी पैरवी भी जमीयत उलेमा ए हिंद ही कर रहा है।
  •  2008 के अमदाबाद सीरियल ब्लास्ट में विशेष अदालत ने 38 आतंकवादियों को सज़ा–ए–मौत और 11 को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। यह फैसला आते ही जमीयत के तत्कालीन अध्यक्ष अरशद मदनी के बयान पर गौर कीजिए- ‘विशेष अदालत का यह फैसला अकल्पनीय है। हम हाईकोर्ट जाएंगे। अपनी कानूनी लड़ाई जारी रखेंगे। इसके लिए देश के सबसे योग्य वकीलों की सेवाएं ली जाएंगी। हमें विश्वास है कि हाईकोर्ट में हमें न्याय मिलेगा।’
  •  मुंबई ट्रेन धमाके हों, या मालेगांव ब्लास्ट मामला, सबकी पैरोकार जमीयत ही है। इसके अलावा 26/11 मुंबई हमले जैसे संवेदनशील मामले में भी जमीयत ने अभियुक्तों को कानूनी सहायता मुहैया कराई है।एक अंदरूनी आकलन के मुताबिक सिर्फ निचली अदालतों में सौ से अधिक मामलों में जमीयत या तो कानूनी सहायता उपलब्ध करा रहा है या करा चुका है। कई ऐसे मामले भी हैं, जिनमें निचली अदालतों से सज़ा–ए–मौत के बाद ऊपरी अदालतों में जमीयत की पैरवी से सजा या तो कम हो गई या अभियुक्त बरी हो गए।

मदनी यह सब क्यों नहीं बताते

मदनी मुसलमानों के उत्पीड़न की कहानियां गढ़ रहे हैं, जबकि उसके उलट इस समय देश में अल्पसंख्यक कल्याण, विशेष रूप से मुसलमानों के लिए अभूतपूर्व काम हो रहा है। जो देश के हर नागरिक को मिलता है, उसमें अल्पसंख्यकों व मुसलमानों की पूरी हिस्सेदारी है। इसके बावजूद अलग से अल्पसंख्यक कल्याण मंत्रालय का बजट 3350 करोड़ रुपये है।

आर्थिक दशा सुधारने के साथ ही शिक्षा और स्वास्थ्य तमाम योजनाओं का लाभ भारत के मुसलमानों को मिल रहा है। भारत के मुसलमानों को वे सुविधाएं हासिल हैं, जो दक्षिण एशिया में कहीं किसी मुल्क में नहीं हैं।

  •  इस समय मुफ्त राशन योजना के तहत 81.35 करोड़ लोगों को राशन मिल रहा है। इसमें 15 करोड़ से अधिक मुस्लिम भी इसका लाभ ले रहे हैं।
  •  आयुष्मान भारत के तहत 55 करोड़ भारतीयों को स्वास्थ्य बीमा का कवर मिला हुआ है। इस हिसाब से तकरीबन साढ़े आठ करोड़ मुसलमानों को मुफ्त स्वास्थ्य बीमा मिला हुआ है।
  •  प्रधानमंत्री आवास योजना में शहरी और ग्रामीण मिलाकर कुल 3 करोड़ 57 लाख मकान बन चुके हैं। यानी 54 लाख मुसलमानों को पक्का मकान हासिल हुआ है।
  •  1 मार्च 2025 तक 10.33 करोड़ उज्ज्वला गैस कनेक्शन बांटे जा चुके हैं। यानी एक करोड़ 55 लाख मुस्लिम महिलाओं की रसोई में गैस कनेक्शन पहुंचा है।
Topics: जिहाद का ऐलानलालकिला बम हमलाराष्ट्र विरोध के आरोपन्यायपालिका पर सवालसर्वोच्च न्यायाललैंड जिहादविवादास्पद मुद्देमौलाना महमूद मदनीराम जन्मभूमि स्थलजमीयत उलेमा ए हिंदतीन तलाक  लव जिहादपाञ्चजन्य विशेषथूक जिहाद कन्वर्जन कानूनवोटबैंकआतंकवाद/हिंसा
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