स्वतंत्रता संग्राम, वंदे मातरम और RSS: कांग्रेस कब तक बोलेगी झूठ, अपनी ही सरकार में सच्चाई कर चुकी है स्वीकार
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स्वतंत्रता संग्राम, वंदे मातरम और RSS: कांग्रेस कब तक बोलेगी झूठ, अपनी ही सरकार में सच्चाई कर चुकी है स्वीकार

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक केशव राव बलिराम हेडगेवार का योगदान सर्वविदित और अविस्मरणीय है और उनके निर्देश पर स्वाधीनता संग्राम में हजारों स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप में आहुतियाँ दीं

Written byडॉ. आनंद सिंह राणाडॉ. आनंद सिंह राणा
Dec 8, 2025, 07:21 pm IST
inभारत
संघ के सस्थापक डॉ हेडगेवार जी और महान क्रांतिकारी राजगुरु जी

संघ के सस्थापक डॉ हेडगेवार जी और महान क्रांतिकारी राजगुरु जी

तुष्टीकरण की राजनीति कर सत्ता पर दशकों तक काबिज रहने वाली कांग्रेस पार्टी को राष्ट्र के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाले आरएसएस के खिलाफ जमकर झूठ फैलाए। अब भी वह झूठ फैला रही है। स्वाधीनता संग्राम में संघ के योगदान और वंदे मातरम को लेकर कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सोमवार को फिर झूठ बोला। सच्चाई यह है कि अंग्रेज के सामने डॉ हेडगेवार ने वंदे मातरम का गायन कर ब्रिटिश सत्ता को चुनौती दी थी। अमर बलिदानी भी संघ के स्वयंसेवक रहे हैं।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आद्य सरसंघचालक केशव राव बलिराम हेडगेवार का योगदान सर्वविदित और अविस्मरणीय है और उनके निर्देश पर स्वाधीनता संग्राम में हजारों स्वयंसेवकों ने प्रत्यक्ष और परोक्ष रुप में आहुतियाँ दीं, परन्तु अत्यंत दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह रहा कि उसे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में कांग्रेस पोषित इतिहासकारों ने रेखांकित ही नहीं किया । हद तो तब हो गई जब 30 जनवरी सन् 1948 को महात्मा गाँधी की हत्या का ठीकरा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर फोड़कर उसे प्रतिबंधित कर छवि धूमिल करने का दुष्कृत्य किया।

यह ठीक उसी प्रकार हुआ, जिस प्रकार बरतानिया सरकार के विरुद्ध जितने भी सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम हुए, उनको विद्रोह, गदर, लूट, डकैती और आतंकवाद की संज्ञा दे दी गई और बरतानिया सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर शासन में सहभागिता कर रही कांग्रेस ने भी तथाकथित स्वाधीनता संग्राम लड़ते हुए यही विचार रखा।

वामपंथियों ने इतिहास को क्षत-विक्षत किया

कांग्रेस ने वामपंथियों और तथाकथित सेक्यूलर इतिहासकारों की जमात भारत के सभी विश्वविद्यालय और महाविद्यालय में बैठा दी गई। फलस्वरूप इन्होंने भी बरतानिया सरकार और कांग्रेस के इतिहास को बुलंद करते हुए, सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के इतिहास को क्षत – विक्षत किया और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को विलोपित ही कर दिया। इसलिए जब भी स्वाधीनता संग्राम में संघ के योगदान को रेखांकित किया जाता है, तो कांग्रेस सहित सभी हिंदू विरोधी खेमे एकत्र होकर हंगामा खड़ा करने लग जाते हैं। अब देखिए न क्रांतिकारियों को आतंकवादी, पागल,लुटेरा बताने वाले कॉंग्रेसियों और वामियों को महान् क्रांतिकारी राजगुरु के स्वयंसेवक होने पर इतना दर्द क्यों होना चाहिए? क्यों हो रहा है? कहीं ऐसा तो नहीं कि राष्ट्र निर्माण और स्वतंत्रता संग्राम में संघ के योगदान को रेखांकित करने से कांग्रेस और वामियों के पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक जाएगी? ये तो समय ही बताएगा, परन्तु राजगुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कर्मठ स्वयंसेवक थे, इस बात के संदर्भ और पुख्ता साक्ष्य उपलब्ध हैं,अपनों और विघ्न संतोषियों के लिए भी प्रस्तुत करना आवश्यक है।

केशव ने जब अंग्रेज के सामने वंदे मातरम का उद्घोष किया

जन्म से बालक केशव के मन में देश भक्ति और समाज के प्रति संवेदनशीलता भरी थी। बचपन से ही क्रांतिकारी प्रवृति के थे। 8 वर्ष की आयु में देशभक्ति की झलक समाज को मिली जब बालक ने इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के शासन के 60 वर्ष होने पर बांटी मिठाई न खाकर कूड़े में फेंक दी। स्कूल में पढ़ते हुए निरीक्षण के लिए आए अंग्रेज इंस्पेक्टर के सामने “वन्दे मातरम” का जयघोष किया। इस पर अंग्रेज इंस्पेक्टर बिफर गया और उसके आदेश पर केशव राव को स्कूल से निकाल दिया गया। जिसके बाद इन्होंने मैट्रिक तक अपनी पढाई पूना के नेशनल स्कूल में पूरी की |

डॉ हेडगेवार ने बालाघाट में स्वाधीनता संग्राम का बिगुल फूंका

डॉ. हेडगेवार बचपन से ही क्रांतिकारी विचारधारा के थे और उन्होंने महाकौशल प्रान्त में बालाघाट जिले से स्वाधीनता संग्राम का श्रीगणेश किया था। सन् 1908 में बालाघाट में आपने रामपायली में युवाओं का सशक्त संगठन बना लिया था और अगस्त माह में आपने बालाघाट की एक पुलिस चौकी के ऊपर बम फेंका जो निकट के तालाब के पास फटा परंतु ठोस प्रमाण न होने के कारण आपको हिरासत में नहीं लिया जा सका।

रामपायली में विजयदशमी के उत्सव पर आपने वंदे मातरम का उद्घोष करते हुए अंग्रेजों को भारत से भगाने का आह्वान किया, परिणाम स्वरुप आपकी गिरफ्तारी हुई और ‘राजद्रोह भाषण’ के आरोप में आप पर रामपायली में भाषण देने के लिए एक वर्ष का प्रतिबंध लग गया।

असहयोग आंदोलन में जेल भी गए

डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार, कोलकाता में मेडिकल की पढ़ाई के दौरान अनुशीलन समिति से जुड़े, जिनका उल्लेख त्रिलोक्यनाथ चक्रवर्ती और रासबिहारी बोस की पुस्तकों में आता है। प्रारंभ से ही आपके क्रांतिकारियों से घनिष्ठ संबंध रहे और आपने उन्हें संरक्षण भी प्रदान किया। आपने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण एक वर्ष का कारावास की सजा भी काटी। सविनय अवज्ञा आंदोलन में सहभागिता करते हुए जंगल सत्याग्रह में उल्लेखनीय योगदान दिया। परंतु बरतानिया सरकार के हिन्दू समाज को जाति – पांति के नाम पर बांटने के षडयंत्र, ईसाई मिशनरीज के प्रकोप और बरतानिया सरकार के साथ कांग्रेस की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के चलते हिन्दूओं और हिंदुत्व के साथ राष्ट्र के अस्तित्व को बचाने के लिए संघ कार्य में सर्वस्व अर्पित किया।

संघ के स्वयंसेवक राजगुरु

अब जब से भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी ने संघ शताब्दी वर्ष में स्वाधीनता संग्राम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अवदान को रेखांकित किया है, तब से कांग्रेस और उनके समर्थकों को परेशानी हो रही है। कांग्रेस और उनके समर्थकों का वश चलता तो वो ये भी कह देते कि डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार ने स्वाधीनता संग्राम में भाग ही नहीं लिया और न ही कभी राजगुरु से उनकी मुलाक़ात हुई! भला हो अनिल वर्मा जी का जिन्होंने अपनी पुस्तक, “अजेय क्रांतिकारी राजगुरु “में पृष्ठ क्रमांक 29 में डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार और महारथी राजगुरु का अमरावती में मिलने का वृतांत लिखा है और पृष्ठ क्रमांक 106 में दोबारा नागपुर में मिलने उल्लेख किया है। ये पुस्तक अगस्त सन् 2008 में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में सूचना प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार ने प्रकाशित की है।

राजगुरु की वीरोचित गाथा

आइये प्रारम्भ,महारथी राजगुरु की वीरोचित गाथा से करते हैं। 17 दिसंबर 1928 को महारथी राजगुरु ने, पंजाब केसरी लाला लाजपत राय के हत्यारे, जे. पी. सांडर्स पर पहला फायर खोल दिया। उसके उपरांत सरदार भगत सिंह और महारथी सुखदेव ने सांडर्स का वध कर दिया। शिवराम हरि राजगुरु के 2 कोड नाम क्रमशः रघुनाथ और एम याने महाराष्ट्र थे। शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महान् क्रान्तिकारी थे। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु का बलिदान एक महत्वपूर्ण घटना थी।

शिवराम हरि राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, सन् 1908 में पुणे जिला के खेड़ा गाँव (अब राजगुरु नगर) में हुआ था।6 वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे। इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदों का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे। वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ।

चंद्रशेखर आजाद से जुड़े

चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं चन्द्रशेखर आज़ाद,सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु, हिदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी में सबसे बेहतरीन निशानेबाज माने जाते थे।

साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।23 मार्च सन् 1931 को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को भारत के अमर बलिदानियों में अपना नाम को प्रमुखता से साथ दर्ज करा दिया।

डॉ हेडगेवार और राजगुरु की मुलाकात

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्व प्रचारक एवं पत्रकार नरेंद्र सहगल जी ने प्रामाणिक स्रोतों के आधार पर ‘भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ पुस्तक लिखी है, जिसके अनुसार, ‘सरदार भगत सिंह और राजगुरु ने अंग्रेज अफसर सांडर्स को लाहौर की मालरोड पर गोलियों से उड़ा दिया। फिर दोनों लाहौर से निकल गए। राजगुरु नागपुर आकर डॉ. हेडगेवार से मिले। राजगुरु संघ के स्वयंसेवक थे’। नरेंद्र सहगल की पुस्तक में प्रमाणित किया गया है कि राजगुरु संघ की मोहिते के बाड़े की शाखा के स्वयंसेवक थे। सहगल की लिखी पुस्तक के अनुसार नागपुर के भोंसले वेदशाला के छात्र रहते हुए राजगुरु, संघ संस्थापक हेडगेवार के बेहद करीबी रहे। पुस्तक में यह भी दावा किया गया है कि सुभाष चंद्र बोस भी संघ से काफी प्रभावित थे। भारतवर्ष की सर्वांग स्वतंत्रता’ की भूमिका सर संघ चालक मोहन भागवत जी ने लिखी है।

अनुशीलन समिति के अंतरंग समिति के सदस्य हेडगेवार

यह इसलिए भी प्रमाणित है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आद्य संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार, कलकत्ता में अपने अध्ययन कल से ही क्रांतिकारी संगठन अनुशीलन समिति के अंतरंग समिति के सदस्य थे, और विभिन्न क्रांतिकारी संगठनों के क्रान्तिकारी ,बरतानिया सरकार की पकड़ से दूर रहकर गुप्त प्रवास हेतु बुंदेलखंड,महाकौशल और नागपुर आते थे। नागपुर उस समय मध्य प्रांत और बरार की राजधानी था, तथा भौगोलिक दृष्टि से गुप्त प्रवास के लिए अत्यंत सुरक्षित था और डॉ. हेडगेवार ने भी नागपुर आकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना कर ली थी, इसलिए क्रांतिकारियों का बरतानिया सरकार की पकड़ से दूर रहने के लिए,डॉ. हेडगेवार के पास गुप्त प्रवास पर आना स्वाभाविक था, साथ ही शाखाओं में स्वयंसेवक के रुप भाग लेना, गुप्त प्रवास का ही एक हिस्सा रहा होगा। राजगुरु निश्चित ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे और इसलिए उन्होंने संघ में प्रचलित काली टोपी सदैव धारण की।

“अजेय क्रांतिकारी राजगुरु” पुस्तक

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में अगस्त 2008 को अनिल वर्मा की पुस्तक “अजेय क्रांतिकारी राजगुरु” प्रशासन विभाग, सूचना और प्रसारण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा प्रकाशित की गई, जिसमें डॉ. हेडगेवार और राजगुरु के मिलन के संबंध में प्रकाश डाला गया है। इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमांक 28 में अनिल वर्मा लिखते हैं कि ” राजगुरु बनारस से अमरावती पहुंचे। उन्होंने अमरावती जाकर हनुमान प्रसारक मंडल की ग्रीष्मकालीन शिविर में प्रशिक्षण हेतु अपना नाम दर्ज करवा लिया। पृष्ठ क्रमांक 29 में लिखते हैं कि ” यहां राजगुरु ने युवकों से चर्चा करते हुए अंग्रेजों को देश के बाहर निकालने एवं मातृभूमि को स्वतंत्र कराने की इच्छा जाहिर की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आर.एस.एस.) के संस्थापक सरकार्यवाहक डॉ.केशव बलिराम हेडगेवार इस शिविर में पधारे, एक वर्ष पूर्व ही उन्होंने सन् 1925 में इस संगठन की नींव रखी थी। फिर राजगुरु करीब एक वर्ष तक अमरावती में सामाजिक एवं देशभक्ति से संबंधित कार्यों में संलग्न रहे।”

सांडर्स वध के उपरांत राजगुरु अमरावती आए

पुस्तक के हवाले से स्पष्ट है कि सन् 1926 में ही डॉ. हेडगेवार और महारथी राजगुरु की अमरावती में भेंट हो गई थी और लेखक महोदय ने एक वर्ष तक साथ कार्य करने का संकेत भी दिया है। इन बातों से स्पष्ट है कि महारथी राजगुरु का संघ से गहरा नाता था। यह भी गौरतलब है कि सांडर्स के वध के उपरांत राजगुरु अमरावती आ गए। यहाँ से अकोला गए और राजराजेश्वर मंदिर के समीप एक किराए के घर में रहने लगे, जिसका इंतजाम बापू साहब सहस्त्रबुद्धे ने किया था। इसी दौरान, 1929 में जब राजगुरु नागपुर में थे, तब उनकी मुलाकात पुनः डॉ. हेडगेवार से हुई। सरसंघचालक ने उन्हें सलाह दी कि वे पुणे न जाएं। ब्रिटिश सरकार से बचाने के लिए उन्होंने राजगुरु के रहने की व्यवस्था भैयाजी दाणी के उमरेड स्थित एक स्थान पर कर दी थी। हालांकि, राजगुरु ने इस सलाह को नहीं माना और पुणे चले गए, जहां 30 सितंबर 1929 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।सन्दर्भ के लिए देखें पुस्‍तक- द फाउंडर ऑफ आर. एस. एस. : डॉ. हेडगेवार (ची. प. भिशीकर, केशव संघ निर्माता, सुरुचि प्रकाशन: नई दिल्ली, 1979, पृष्ठ 70)

राजगुरु स्वयंसेवक के घर रहे

डॉ. हेडगेवार से राजगुरु के दोबारा नागपुर में मिलने की पुष्टि अनिल वर्मा ने अपनी पुस्तक ‘अजेय क्रन्तिकारी राजगुरु’ के पृष्ठ क्रमांक 106 में लिखा है कि ” राजगुरु ने फरारी के इस दौर में नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता के यहां शरण ली थी और आर.एस.एस. के संस्थापक अध्यक्ष डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार से भी मुलाकात की थी।”

उपरोक्त साक्ष्यों के आलोक में यह प्रमाणित हो जाता है कि महान् क्रांतिकारी महारथी राजगुरु राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का भारत के स्वाधीनता संग्राम में अविस्मरणीय योगदान रहा है। संघ अपने को बड़ा बनाने में विश्वास नहीं रखता है, श्रेय लेना नहीं वरन् देना चाहता है और भारत को परम वैभव पर आसीन करना उद्देश्य है।

Topics: स्वतंत्रता संग्रामकांग्रेस का झूठवंदे मातरम और RSSसंघ और कांग्रेस
डॉ. आनंद सिंह राणा
डॉ. आनंद सिंह राणा
'स्व ' के आलोक में भारत के निर्माण और और स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में उपेक्षित महान् जनजातीय नायकों,महारथियों और वीरांगनाओं का इतिहास लेखन। प्रकाशन एवं वृत्तचित्र - महाकौशल में स्वाधीनता आंदोलन तथा क्षेत्र की सामाजिक एवं आर्थिक संरचना,म. प्र. में समाज सुधार के विकास का एक विवेचनात्मक अध्ययन : समाचार पत्रों के योगदान के विशेष संदर्भ में, महाकौशल की जनजातियों का सामाजिक , सांस्कृतिक एवं वैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य, सामाजिक समरसता सूत्र, महाकौशल में स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास, चित्रोत्पला त्रैमासिक शोध पत्रिका, भारत का स्वाधीनता संग्राम : महाकौशल, बुंदेलखंड और बघेलखंड प्रांत के संदर्भ में (संदृश्य प्रलेख), म. प्र. शासन जन संपर्क विभाग, स्वदेश समाचार पत्र समूह, विश्व संवाद केंद्र, नई दुनिया, पत्रिका दैनिक भास्कर,पद्मावती एक्सप्रेस आदि समाचार पत्रों में शोध आलेखों का अनवरत प्रकाशन। शोध पत्रिकाओं के साथ सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से शोध आलेखों का प्रकाशन एवं प्रसारण। स्वातंत्र्य समर में महाकौशल की जनजातियों का अवदान और जबलपुर समग्र प्रकाशनाधीन हैं।भारतीय ऐतिहासिक और पौराणिक महत्व के विषयों के साथ स्वाधीनता संग्राम के जनजातीय महारथियों पर विविध चैनलों के माध्यम से 20 से भी अधिक दस्तावेजी वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री फिल्म) का निर्माण। शोध उपागम - अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के मार्गदर्शन में 500 से भी अधिक मौलिक शोध आलेख। भारतीय इतिहास, धर्म - दर्शन और संस्कृति के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक तथा मनोसामाजिक पहलुओं के प्रति वामियों, मिशनरियों, पश्चिमी विद्वानों, मुस्लिम लेखकों, और तथाकथित सेक्यूलरों के पूर्वाग्रही मत प्रवाह को प्रामाणिकता के आधार खंडित कर वास्तविक मत प्रवाह को प्रस्तुत करने हेतु विविध आयामों में शोधपरक लेखन। भारतीय स्वाधीनता संग्राम और उसके उपरांत 'स्व' के आलोक शोधपरक लेखन। भारतीय संस्कृति के मूलाधार जनजाति कुटुम्ब के विरुद्ध वामियों,मिशनरियों तथाकथित सेक्यूलरों और मुस्लिम लेखकों के द्वारा फैलाए गए वितंडावाद और मंतातरण के कुत्सित षड्यंत्र के विरुद्ध शोधपरक लेखन। शिक्षा - बी. एस-सी, एम. ए.(इतिहास),पी-एच.डी., एल-एल.बी.। संप्रति - प्रो. एवं विभागाध्यक्ष, इतिहास विभाग(30वर्ष अध्यापन का अनुभव )श्रीजानकीरमण कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय एवं उपाध्यक्ष इतिहास संकलन समिति महाकौशल प्रांत। जिला संगठक राष्ट्रीय सेवा योजना, जबलपुर (म.प्र.) [Read more]
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Explainer: भारत के तेल आयात में बढ़ोतरी, जानिए क्या है कारण?

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