ओडिशा: हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग तेज, VHP ने मुख्यमंत्री को सौंपा मसौदा विधेयक
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ओडिशा: हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग तेज, VHP ने मुख्यमंत्री को सौंपा मसौदा विधेयक

परिषद का कहना है कि मंदिर सदियों से केवल पूजा का स्थान नहीं रहे, बल्कि शिक्षा, कला, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और सामाजिक समन्वय के महत्त्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। ऐसे में सरकारी हस्तक्षेप के कारण उनके मूल स्वरूप और परंपराओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

Written byडॉ. समन्वय नंदडॉ. समन्वय नंद — edited by Lalit Fulara
Dec 8, 2025, 05:13 pm IST
inओडिशा

भुवनेश्वर। ओडिशा में हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग एक बार फिर जोर पकड़ रही है। इसी क्रम में विश्व हिंदू परिषद (VHP) की ओडिशा इकाई ने मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को एक विस्तृत ज्ञापन और एक मसौदा विधेयक सौंपकर राज्य में सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों को समाज के प्रबंधन में वापस सौंपने की मांग की है। विहिप के ओडिशा (पूर्व) और ओडिशा (पश्चिम) प्रांतों के पदाधिकारियों का एक प्रतिनिधि मंडल रविवार को मुख्यमंत्री से मिला और इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा की।

विहिप ने अपने ज्ञापन में कहा है कि देश के कई हिस्सों में दशकों से जारी सरकारी नियंत्रण ने मंदिरों के पारंपरिक प्रबंधन, धार्मिक दान-पुण्य और सांस्कृतिक-सामाजिक गतिविधियों पर गंभीर प्रभाव डाला है। परिषद का कहना है कि मंदिर सदियों से केवल पूजा का स्थान नहीं रहे, बल्कि शिक्षा, कला, संगीत, नृत्य, मूर्तिकला और सामाजिक समन्वय के महत्त्वपूर्ण केंद्र रहे हैं। ऐसे में सरकारी हस्तक्षेप के कारण उनके मूल स्वरूप और परंपराओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख
ज्ञापन में 1925 से लागू विभिन्न कानूनों और स्वतंत्रता के बाद बने राज्यस्तरीय मंदिर प्रशासन अधिनियमों का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इन प्रावधानों ने हिंदू समुदाय के अपने मंदिरों पर प्रशासनिक अधिकार को सीमित कर दिया है। परिषद का तर्क है कि सरकारी नियंत्रण के चलते मंदिरों की संपत्ति-सुरक्षा, धार्मिक परंपराओं के संरक्षण और सांस्कृतिक गतिविधियों के संचालन में अवरोध उत्पन्न हुए हैं। विहिप द्वारा सौंपे गए दस्तावेज़ में मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का भी विस्तार से उल्लेख है।

परिषद ने बताया कि हिंदू मंदिरों पर संस्थागत सरकारी नियंत्रण की शुरुआत वर्ष 1817 के मद्रास रेगुलेशन के माध्यम से हुई थी, जिसे ईस्ट इंडिया कंपनी ने दक्षिण भारत के प्रमुख मंदिरों की संपत्तियों के प्रबंधन के लिए लागू किया था। यह प्रावधान 1853 में समाप्त कर दिया गया था, लेकिन 1925 में इसे नए स्वरूप में पुनः लागू किया गया। परिषद का कहना है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस नियंत्रण व्यवस्था को बरकरार रखा गया, जबकि इसका मूल उद्देश्य ‘उत्तम प्रशासन’ के नाम पर मंदिरों की संपत्तियों का सरकारी प्रबंधन था।

विहिप ने दावा किया है कि 1925 का कानून मूल रूप से मुस्लिम धार्मिक स्थलों के नियमन के लिए प्रस्तावित था, लेकिन बाद में कई प्रमुख हिंदू मंदिर—जैसे तिरुपति, मदुरै और श्रीरंगम—को भी सरकारी नियंत्रण में ले लिया गया। परिषद का कहना है कि इसी मॉडल को बाद में अन्य राज्यों में भी अपनाया गया, जिसके परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में हिंदू मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए।

दक्षिण भारत के मंदिरों की संपत्ति और आय पर सवाल
विहिप ने अपने ज्ञापन में दक्षिण भारत के मंदिरों—विशेष रूप से तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना—की विशाल संपत्ति और आय का भी हवाला दिया है। परिषद का कहना है कि इन राज्यों के लगभग 19,000 मंदिरों के पास कुल मिलाकर 10 लाख एकड़ से अधिक कृषि भूमि एवं बड़ी मात्रा में आवासीय और वाणिज्यिक संपत्तियाँ हैं, जिनकी अनुमानित कीमत 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक आंकी जाती है।

परिषद का आरोप है कि इतनी व्यापक संपत्ति होने के बावजूद मंदिरों की वास्तविक आय अपेक्षाकृत बेहद कम है। अनुमान के अनुसार मंदिरों की वार्षिक आय 10,000 करोड़ रुपये से अधिक होनी चाहिए, लेकिन वास्तविक संग्रह 400 करोड़ रुपये से भी कम बताया गया है। विहिप का कहना है कि सरकारी नियंत्रण के चलते मंदिरों की आय पर प्रशासनिक शुल्क, ऑडिट शुल्क और अन्य प्रकार के शुल्क लगाए जाते हैं, जिसके कारण मंदिरों को मिलने वाला वास्तविक लाभ काफी कम हो जाता है।

मंदिरों की सांस्कृतिक भूमिका को लेकर चिंता
विहिप ने ज्ञापन में यह चिंता व्यक्त की है कि सरकारी नियंत्रण के कारण मंदिरों में परंपरागत सांस्कृतिक और धार्मिक गतिविधियाँ कम होती जा रही हैं। कई मंदिर परिसरों में अतिक्रमण की समस्या वर्षों से बनी हुई है। परिषद का आरोप है कि मंदिरों की भूमि और संपत्तियों पर अनधिकृत कब्जे बढ़ रहे हैं और कई जगहों पर लोग या संस्थाएँ नाममात्र का किराया चुकाकर बड़ी संपत्तियों का उपयोग कर रही हैं।

नई मसौदा कानून का प्रस्ताव
विहिप ने मुख्यमंत्री को सौंपे गए ज्ञापन में मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने के लिए एक विस्तृत मसौदा कानून भी प्रस्तुत किया है। यह मसौदा एक विशेष समिति द्वारा तैयार किया गया है, जिसकी अध्यक्षता अखिल भारतीय आचार्य सभा के महासचिव स्वामी परमानंद सरस्वती ने की थी। समिति में विश्व हिंदू परिषद, अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद, आचार्य सभा, वर्तमान अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि के प्रतिनिधि और अन्य विशेषज्ञ शामिल थे।

यह मसौदा मुख्य रूप से कर्नाटक सरकार द्वारा प्रस्तावित उस विधेयक के अध्ययन पर आधारित है, जिसमें मंदिरों को समाज और स्थानीय समुदायों के प्रबंधन में वापस सौंपने का प्रावधान था। समिति का मानना है कि यह मॉडल ओडिशा सहित देश के कई राज्यों द्वारा अपनाया जा सकता है।

राज्य धार्मिक परिषद और जिला धार्मिक परिषद का गठन
प्रस्तावित कानून में राज्य में एक शीर्ष संस्था—राज्य धार्मिक परिषद—के गठन का सुझाव दिया गया है। इसका उद्देश्य मंदिरों के प्रशासन को व्यवस्थित करना, सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देना, धार्मिक दानों के पारदर्शी प्रबंधन को सुनिश्चित करना और विवाद समाधान में सहायता प्रदान करना होगा। परिषद में धार्मिक विद्वानों, परंपरागत विशेषज्ञों, सेवानिवृत्त न्यायाधीशों, प्रशासनिक अधिकारियों, व्यापार क्षेत्र के प्रतिनिधियों, अनुसूचित जाति-जनजाति वर्गों के सदस्यों और महिलाओं को शामिल करने का सुझाव दिया गया है।

इसी तरह प्रत्येक जिले में जिला धार्मिक परिषद गठित की जाएगी, जिसमें स्थानीय समुदाय का व्यापक प्रतिनिधित्व होगा। इसके अतिरिक्त प्रस्ताव में प्रत्येक मंदिर में एक मंदिर धार्मिक समिति के गठन की बात कही गई है, जिसमें सभी वर्गों और स्थानीय समुदाय का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाएगा। यह समिति मंदिर के संचालन और उसकी परंपरागत धार्मिक व्यवस्थाओं का पालन कराने में स्वतंत्र होगी।

विवाद समाधान और ट्रिब्यूनल का प्रावधान
मसौदा कानून में मंदिरों से जुड़े विवादों का समाधान धार्मिक शास्त्र और परंपराओं के विशेषज्ञ मध्यस्थों के पैनल के माध्यम से करने का प्रस्ताव है। यदि विवाद मध्यस्थता से न सुलझे तो मामला राज्य धार्मिक ट्रिब्यूनल के पास जाएगा और उसके निर्णय के विरुद्ध अपील राज्य उच्च न्यायालय में की जा सकेगी।

संपत्ति संरक्षण के लिए विशेष आयोग और दान कोष
विहिप ने मंदिर संपत्तियों की सुरक्षा के लिए एक मंदिर संपत्ति संरक्षण आयोग गठित करने की भी मांग रखी है। यह आयोग मंदिरों की भूमि और संपत्तियों पर किए गए अतिक्रमण को हटाने और कब्जाई गई संपत्तियों को पुनः प्राप्त करने के लिए अधिकार सम्पन्न होगा।

इसके अलावा, “हिंदू सार्वजनिक दान कोष” के गठन का सुझाव दिया गया है, जिसमें समृद्ध मंदिरों, प्रवासी भारतीयों और कॉर्पोरेट क्षेत्र के सीएसआर दाताओं से योगदान प्राप्त किया जा सकेगा। इस कोष का उपयोग मंदिरों के पुनरुद्धार, संरक्षण और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ावा देने में किया जाएगा।

ओडिशा सरकार से अपेक्षा
विहिप ने अपने ज्ञापन में मुख्यमंत्री से अनुरोध किया है कि राज्य के सरकारी नियंत्रण वाले मंदिरों को प्राथमिकता में रखते हुए समाज के प्रबंधन के अधीन सौंपने की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएँ। परिषद ने आशा व्यक्त की है कि यदि ओडिशा इस कदम को लागू करता है, तो वह देश के अन्य राज्यों के लिए एक आदर्श मॉडल बन सकता है। प्रतिनिधि दल में विहिप के ओडिशा (पूर्व) प्रांत के अध्यक्ष डॉ. प्रफुल्ल मिश्र, ओडिशा (पश्चिम) प्रांत के अध्यक्ष राजकुमार बडपंडा तथा दोनों प्रांतों के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल थे।

विहिप ओडिशा (पूर्व) प्रांत के सह मंत्री उमाशंकर आचार्य ने बताया कि मुख्यमंत्री ने ज्ञापन प्राप्त करने के बाद इस पर सकारात्मक कदम उठाने का आश्वासन दिया है। कार्यक्रम के अंत में मुख्यमंत्री मोहन माझी ने विहिप की पत्रिका ‘हिंदू शताब्दी’ का भी विमोचन किया।

Topics: vhpHindu templesOdishaGovernment controlOdisha Chief Minister
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