बॉम्बे हाई कोर्ट ने मस्जिद द्वारा लाउडस्पीकर के उपयोग की मांग वाली याचिका को खारिज करते हुए दोहराया कि कोई भी धर्म यह नहीं कहता कि प्रार्थना दूसरों की शांति भंग करके की जाए, और न ही यह सिखाता है कि प्रार्थना ध्वनि-वर्धक यंत्रों या ढोल-नगाड़ों के माध्यम से ही होनी चाहिए।
नागपुर में बढ़ते शोर प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान
कोर्ट ने नागपुर शहर में बार-बार होने वाले शोर प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान भी लिया। न्यायमूर्ति अनिल एल. पंसारे और न्यायमूर्ति राज डी. वाकोड़े की खंडपीठ ने कहा कि दूसरे नागरिकों को उचित शांति का अधिकार है, खासकर बच्चों, बुजुर्गों, बीमार लोगों और मानसिक विकार से पीड़ित व्यक्तियों को।
याचिका की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता मस्जिद (मस्जिद ए. गौसिया, गोंदिया) ने अदालत से लाउडस्पीकर के उपयोग को बहाल करने का निर्देश देने की मांग की थी। मुख्य प्रश्न यह था कि क्या धर्म का पालन करने के लिए लाउडस्पीकर का उपयोग अनिवार्य/आवश्यक है। मस्जिद की ओर से अधिवक्ता संकते भांडेकर पेश हुए, जबकि दूसरी ओर से एपीपी के.आर. लुले उपस्थित थे।
लाउडस्पीकर धार्मिक आवश्यकता नहीं
पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता यह दिखाने में असफल रहा कि धर्म का पालन करने के लिए लाउडस्पीकर का उपयोग आवश्यक है। इसलिए याचिकाकर्ता इस आधार पर राहत पाने का हकदार नहीं है। इसी कारण याचिका को खारिज कर दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के 2005 के फैसले का उल्लेख
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले (In Re Noise Pollution – 2005) का हवाला देते हुए कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन का अधिकार केवल जीवित रहने का अधिकार नहीं है, बल्कि गरिमा के साथ जीवन का अधिकार भी है। साथ ही यह भी कहा गया कि जैसे बोलने का अधिकार है, वैसे ही सुनने या न सुनने का भी अधिकार है। किसी को बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह अनचाही आवाज सुने।
शोर प्रदूषण के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव
कोर्ट ने शोर प्रदूषण को सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बताया। कोर्ट ने कहा कि यह ‘फाइट टू फ्लाइट’ सिंड्रोम उत्पन्न करता है, जिससे शरीर में हानिकारक रसायन बढ़ते हैं और हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, मानसिक तनाव, आक्रामकता, थकान तथा अन्य बीमारियां उत्पन्न होती हैं।
80 से 110 डेसिबल शोर सुनने की क्षमता को नुकसान पहुंचा सकता है, 120 डेसिबल दर्द की सीमा से पार है और 140–160 डेसिबल पर ईयरड्रम फट सकता है।
नागपुर में समारोह स्थलों की गतिविधियों पर टिप्पणी
अदालत ने कहा कि नागपुर के सिविल लाइंस क्षेत्र में कई क्लब और विवाह हॉल अत्यधिक शोर कर रहे हैं, जो रात 10 बजे के बाद भी जारी रहता है और नियमों का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने कहा कि इन स्थलों को शोर नियंत्रण नियमों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए और संबंधित अधिकारियों को यह भी देखना चाहिए कि भूमि उपयोग परिवर्तन की अनुमति कैसे दी गई।
धार्मिक स्थलों में नियम उल्लंघन पर चिंता
अदालत ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर भजन, अजान आदि गतिविधियां भी लाउडस्पीकरों पर नियमों का उल्लंघन करते हुए की जा रही हैं। यह कानून का सीधा उल्लंघन है और इसे नियंत्रित करने की आवश्यकता है।
राज्य सरकार को प्रभावी समाधान लाने का निर्देश
कोर्ट ने राज्य सरकार को सुप्रीम कोर्ट के Noise Pollution (V) IN RE (2005) के दिशा-निर्देशों का पालन करते हुए एक प्रभावी समाधान प्रस्तुत करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि नियम केवल कागजों पर रह गए हैं और इनके पालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान किया जाना चाहिए।
सुओ मोटू पीआईएल दर्ज करने का आदेश
अदालत ने नागपुर में बढ़ते शोर प्रदूषण पर स्वतः संज्ञान लेते हुए रजिस्ट्री को सुओ मोटू जनहित याचिका के रूप में इसे दर्ज करने का निर्देश दिया। साथ ही मस्जिद की याचिका को खारिज कर दिया गया।

















