पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) की प्रक्रिया चला रहा है। इसका मकसद मतदाता सूची को शुद्ध करना है, यानी मृत या कहीं और चले गए मतदाताओं के नाम हटाना। लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान एक ऐसा आंकड़ा सामने आया, जिसने सभी को हैरान कर दिया। स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने रिपोर्ट दी कि राज्य के 2,208 बूथों पर पिछले 20 सालों में कोई भी व्यक्ति नहीं मरा। सीधे शब्दों में कहें तो ये नामुमकिन लगता है। इसे देखकर चुनाव आयोग को शक हुआ और उसने विस्तृत रिपोर्ट मांगी।
असली स्थिति का खुलासा- जांच के बाद पता चला कि असल में केवल 29 बूथ ऐसे हैं जहां पिछले 20 सालों में मौतें दर्ज नहीं हुई थीं। बाकी 2,179 बूथों में मृत लोगों के नाम मतदाता सूची में बने हुए थे। यह सवाल उठता है कि इतने सालों में मर चुके लोग कैसे सूची में बने रहे?
सबसे ज्यादा सवाल दक्षिण 24 परगना से- सूत्रों के मुताबिक, दक्षिण 24 परगना जिले में सबसे ज्यादा “अमर मतदाता” पाए गए। शुरुआती रिपोर्ट में कुछ इलाके सबसे संदिग्ध दिखाई दिए- रायदिघी: 66 बूथ, कुलपी: 58 बूथ, पठारप्रतिमा: 20 बूथ, मगराहाट: 15 बूथ। इन आंकड़ों का मतलब था कि इन इलाकों में हजारों ऐसे नाम मतदाता सूची में मौजूद थे, जो असल में शायद ही मौजूद थे। इस खुलासे के बाद बीजेपी ने ममता बनर्जी सरकार और स्थानीय प्रशासन पर हमला किया। उनका आरोप है कि यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं, बल्कि साजिश हो सकती है। बीजेपी का कहना है कि मृत लोगों के नाम जानबूझकर मतदाता सूची में बने रहे ताकि चुनाव के दिन उनके नाम पर फर्जी वोट डाले जा सकें। बीजेपी नेताओं ने सवाल उठाया कि जब तक चुनाव आयोग ने हस्तक्षेप नहीं किया, तब तक स्थानीय अधिकारियों ने 2,208 बूथों पर “जीरो डेथ” रिपोर्ट कैसे भेज दी?
मतदाता सूची में सुधार जरूरी- महज 24 घंटे में 2,208 बूथों की रिपोर्ट 29 तक घट गई, यह साबित करता है कि मतदाता सूची में भारी लापरवाही या जानबूझकर गड़बड़ी हुई थी। अब चुनाव आयोग के सामने यह चुनौती है कि संशोधित सूची वाकई में सही है या केवल आंकड़ों की खेलबाज़ी। यह मामला बंगाल में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

















