नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण और समाजिक रूप से संवेदनशील फैसला सुनाया है। अदालत ने कहा कि शादी के दौरान महिलाओं को उनके माता-पिता या घरवालों द्वारा दिए गए कैश, सोना और अन्य सामग्री उनकी निजी संपत्ति मानी जाएगी और तलाक के बाद उन्हें यह वापस लेने का पूरा कानूनी अधिकार है। यह फैसला मंगलवार, 2 नवंबर को सुनाया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) एक्ट, 1986 की व्याख्या की। अदालत ने स्पष्ट किया कि इस कानून का उद्देश्य केवल सिविल विवादों का निपटारा करना नहीं है, बल्कि यह महिलाओं को आर्थिक और वित्तीय सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है। कोर्ट ने कहा कि कानून और सामाजिक वास्तविकता को अलग नहीं किया जा सकता, और यह न्यायपालिका की जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करे। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने अपने फैसले में जोर दिया कि महिलाओं के साथ भेदभाव आज भी समाज के कई हिस्सों में मौजूद है, विशेषकर गांव और ग्रामीण क्षेत्रों में। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संविधान द्वारा महिलाओं को बराबरी और स्वायत्तता का अधिकार दिया गया है, और कानून का यही मतलब निकालना चाहिए।
यह फैसला कलकत्ता हाईकोर्ट के 2022 के निर्णय को खारिज करते हुए आया है। हाईकोर्ट ने पहले तलाकशुदा महिला के शादी में मिले सामान को वापस लेने के मामले को केवल एक दिवानी विवाद के रूप में देखा था और पति को कुछ राहत दी थी। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि शादी के समय महिला के घर की ओर से दिए गए सभी सामान उसकी व्यक्तिगत संपत्ति हैं और तलाक के बाद उन्हें लौटाया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने यह संदेश भी दिया है कि न्यायपालिका संवैधानिक संस्था होने के नाते महिलाओं के अधिकारों और जेंडर जस्टिस को सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है।
















