छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में पाञ्चजन्य के ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ में इंदिरा गांधी और नरसिंह राव सरकार के मंत्रिमंडल में केंद्रीय मंत्री रहे जनजातीय नेता और समाज सेवी अरविंद नेताम ने अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि माननीय राम दत्त जी सहित सभी अतिथि गणों, भाइयों और बहनों, पाञ्चजन्य परिवार ने मुझे इस कार्यक्रम के लिए बुलाया, उसके लिए मैं उनका आभार प्रकट करता हूं। मैं कुछ विषयों पर अपने मन की बात और जीवन के अनुभव रखने का प्रयास करूंगा।
श्री अरविंद नेताम ने कहा कि संघ का शताब्दी वर्ष है, और मुझे भी जून में नागपुर के वार्षिक कार्यक्रम में प्रमुख अतिथि बनने का अवसर मिला। वह अवसर मेरे जीवन में अद्भुत है। इसलिए भी अद्भुत है कि मेरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से बहुत गहरा रिश्ता नहीं रहा, पर राजनीति में रहने के कारण भारतीय जनता पार्टी और जनसंघ से जरूर जुड़ा रहा हूं। मैं पूर्व में पहली बार नागपुर गया था, वहीं मेरी सरसंघचालक डॉक्टर मोहन भागवत जी से भेंट हुई। तब मैंने उनसे एक ही बात कही कि डॉक्टर साहब, इस देश में एक कहावत है, उसे आपने झूठा साबित कर दिया।
कहावत यह है कि “उगते सूरज को हर कोई सलाम करता है, डूबते सूरज को कोई नहीं करता।” मैं तो डूबता सूरज भी नहीं हूं मैं तो डूब चुका हूं, राजनीति से संन्यास ले चुका हूं, समाज में छोटा-मोटा काम करता रहता हूं। तो डूबते हुए आदमी को भी प्रमुख अतिथि बनाकर संघ ने जो किया, वह मेरे जीवन का अद्भुत अनुभव है। दो दिन के प्रवास में संघ को जानने का प्रयास किया और एक बहुत अच्छा अनुभव लेकर नागपुर से लौटा।
कन्वर्जन और नक्सलवाद दो सबसे महत्वपूर्ण विषय
आज का विषय दो प्रमुख बातों से जुड़ा है—एक कन्वर्जन, जो मेरे जीवन का सबसे प्रमुख विषय है कि धर्मांतरण के खिलाफ समाज को कैसे जागृत किया जाए। दूसरा नक्सलवाद, क्योंकि मैं बस्तर से आता हूं और नक्सलवाद को शुरू से देखा है। ये दोनों विषय आज भी बस्तर के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
भारत में नक्सलवाद
इस देश में नक्सलवाद या लेफ्ट मूवमेंट कोई नई बात नहीं है। आज़ादी से पहले भी भूमि आंदोलन निजाम-शाही में हुआ, बाद में नक्सलबाड़ी क्षेत्र में बड़ा आंदोलन हुआ। उस समय मैं संसद में था और इंदिरा जी की तरफ से नक्सलवाद पर अध्ययन करने को कहा गया था। तब इस आंदोलन को समझने का अवसर मिला। मैंने कभी नहीं सोचा था कि बस्तर में वैसी स्थिति आएगी, जैसी एक समय में नक्सलबाड़ी में थी।
संविधान-विरोधी रवैये से असहमति
नक्सलवाद की एक बात से मैं सहमत नहीं था कि आप संविधान नहीं मानेंगे, कानून नहीं मानेंगे। राजनीति में रहते हुए हम कहते थे कि नक्सलियों को भी देश के निर्माण में संविधान और कानून के दायरे में रहकर काम करना चाहिए और गरीब समाज, विशेषकर आदिवासी समाज का भला करना चाहिए। पर नक्सलवाद बाहर से आई पॉलिटिकल थ्योरी पर टिका था, और उसका प्रभाव देश ने बहुत झेला। यदि शुरुआत से इनकी सोच सकारात्मक होती, तो देश और आदिवासी समाज के लिए बहुत कुछ हो सकता था, पर नहीं हुआ।
सरकारों की उदासीनता और भ्रमित जिम्मेदारियाँ
संसद और मंत्रालय में रहते हुए मैं नौकरशाहों और नेताओं से पूछता था—नक्सलवाद की जड़ क्या है? मूल कारण क्या है? पर सही जवाब कभी नहीं मिला। मामला बढ़ने पर सरकारें जागती थीं, पर जिम्मेदारी को लेकर भ्रम हमेशा रहा। केंद्र कहता था राज्य निपटे, हम मदद को तैयार हैं। राज्य कहते थे- हम सक्षम नहीं, केंद्र से मदद चाहिए। इस चक्कर में समस्या पर गंभीरता से चर्चा ही नहीं हुई।
राजनीतिक सच्चाई :शंकर चव्हाण और एनटीआर
जब शंकर चव्हाण गृह मंत्री थे, मैं कैबिनेट में था। उनसे कहता था—साहब, इसका राजनीतिक समाधान निकालिए। सरकार चली गई तो एक दिन मैंने उनसे पूछा आप प्रतिक्रिया क्यों नहीं देते थे? उन्होंने कहा- एक बार एनटीआर (उस समय आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री) दिल्ली आए। मैंने उनसे पूछा—नक्सलवाद पर गंभीरता से काम करते हैं? तो एनटीआर ने कहा- चौहान साहब, मेरे विधानसभा चुनाव में 6 महीने बचे हैं, अभी कोई छेड़छाड़ मत कीजिए, बाद में देखेंगे। यह सुनकर मैंने समझ लिया कि समस्या हल क्यों नहीं हुई क्योंकि जिस देश में कुछ राजनीतिक दल नक्सलियों की “पूंछ पकड़कर वैतरणी पार” करना चाहते हों, वहां समाधान कैसे मिलेगा?
मोदी सरकार द्वारा निर्णायक समाधान
जो कमी उस जमाने में थी, उसे आज के प्रधानमंत्री माननीय नरेंद्र मोदी जी ने लगभग सुलझा दिया। कई राज्य ऐसे रहे, जिन्होंने नक्सलियों के प्रभाव का राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिश की। कांग्रेस पार्टी हमेशा सॉफ्ट रही। बीजेपी आने के बाद नीति सख्त हुई। मैं मजाक में कहता हूं- नक्सलवाद और बीजेपी का रिश्ता नेवले-सांप जैसा है। खैर, देर आए दुरुस्त आए मोदी जी ने अमित शाह जी के साथ मिलकर दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ समाधान निकाला, जो अब सार्थक हो रहा है।

















