पाञ्चजन्य दंतेश्वरी डायलॉग: समरसता का असली अर्थ क्या है? आचार्य युवराज ने बताया जगन्नाथ प्रभु का असली नाम
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पाञ्चजन्य दंतेश्वरी डायलॉग: समरसता का असली अर्थ क्या है? आचार्य युवराज ने बताया जगन्नाथ प्रभु का असली नाम

छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि को कैसे देखते हैं आप और समय के साथ वह कितनी बलवान या उसके लिए और क्या क्या कार्य किए जाने चाहिए..?

Written byShivam DixitShivam Dixit
Dec 2, 2025, 07:40 pm IST
inभारत, छत्तीसगढ़, पाञ्चजन्य इवेंट

छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में मेफेयर लेक रिज़ॉर्ट , अटल नगर में पाञ्चजन्य के ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ में राष्ट्रीय कथावाचक आचार्य पं. युवराज पांडे ने समरसता विषय पर अपने विचार रखे। 

आचार्य पं. युवराज पांडे ने कहा- समरसता कोई विषय नहीं है, मेरे दृष्टिकोण में समरसता जीवन है। हमें जीवन को जीना है। समरसता को सिर्फ़ रास्ता कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मैं किसी का सम्मान करूं या कोई मेरा सम्मान करे। समरसता का अर्थ है कि मेरे साथ बैठने वाला व्यक्ति अपने बारे में ‘मैं छोटा हूं’ ऐसा महसूस न करे।

बड़ा कौन है? यदि इस प्रश्न का सीधा उत्तर दें तो बड़ा वह है जिसके साथ बैठने वाला कोई भी व्यक्ति अपने आप को छोटा न समझे। धर्म और अध्यात्म में हमारे सभी शास्त्र, पुराण, महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित ग्रंथ और भगवान के अवतार- चाहे राम हों या कृष्ण- सभी ने समरसता का ही संदेश दिया है। रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं कि प्रभु कहते हैं- “सब मम प्रिय, मैं सबमें व्याप्त हूं।” भगवान सबको समान प्रेम करते हैं-  चाहे वनांचल में रहने वाली जनजाति हो, ब्राह्मण हों, ऋषि हों, क्षत्रिय हों या राजा।

भगवान राम के जीवन में समरसता के उदाहरण

राम जी का जन्म केवल रावण-वध उद्देश्य से नहीं था। उनके जन्म के अनेक कारण थे- “राम जन्म के हेतु अनेक, परम विचित्र एक ते एका।” वनवास काल में भगवान ने सबसे पहले ऋषि भारद्वाज से भेंट की, फिर वाल्मीकि जी के चरणवंदन किए। बाद में जब वे श्रृंगवेरपुर में निषादराज से मिले तो उन्हें ‘मित्र’ बनाया। निषादराज को भगवान ने अपने समकक्ष स्थान दिया। रामजी के छोटे भाई भरत ने भी निषादराज को ‘बड़े भैया’ कहकर सम्मान दिया।

वनांचल में रहने वाले कोल-भीलों के साथ भी भगवान ने समय बिताया, उनके यहाँ कंद-मूल-फल खाए, माता शबरी के झूठे बेर स्वीकार किए। इससे बड़ा समरसता का उदाहरण क्या होगा?

समरसता बोलने की नहीं, जीने की चीज है

समरसता स्थापित करने के लिए सबसे पहले स्वयं को दृढ़ संकल्प लेना पड़ता है। समरसता को बोलना नहीं, उसे जीना है। जब हम समरसता को व्यवहार में लाते हैं तो लोग हमें देखकर सीखते हैं— परिवार, गांव, जिला, राज्य और देश-सब इसका अनुकरण करते हैं। “मैं अकेला अखंड भारत का निर्माण करूंगा”-  यह सोचकर अखंड भारत नहीं बनेगा। पहले स्वयं में समरसता का भाव लाना पड़ेगा।

भगवान कृष्ण के जीवन में समरसता

कृष्ण जी ने सुदामा के चरणों में झुककर सम्मान दिया। वृंदावन में ग्वालबालों के साथ 11.5 वर्ष तक रहे, अनेक लीलाएं कीं- यह दिखाता है कि भगवान का प्रेम सबके लिए समान था।

कलयुग में समरसता का सर्वोत्तम उदाहरण-  श्री जगन्नाथ

कलयुग के प्रत्यक्ष भगवान श्री जगन्नाथ समरसता के जीवंत स्वरूप हैं। जगन्नाथ पुरी आने से पहले वे नयागढ़ के कंठिलो में ब्रह्मगिरि पर्वत पर नील माधव रूप में निवास करते थे।

भगवान जगन्नाथ ने सबसे पहले पूजा किसी ब्राह्मण से नहीं, बल्कि वनांचल में रहने वाले विश्वावसु साबर के हाथ से प्राप्त की। विश्वावसु द्वारा दिए गए कंद-मूल-फल भगवान ने ग्रहण किए। इसी कारण उन्हें पहले ‘साबरनाथ’ कहा गया, बाद में ‘जगन्नाथ’।

जगन्नाथ पुरी के श्रीमंदिर में आज भी कोई जाति-भेद नहीं है। सभी लोग एक पटरी पर बैठकर भोजन करते हैं। जहां तक मैं प्रवेश कर सकता हूं, वहीं तक सभी वर्णों के लोग प्रवेश कर सकते हैं। यह समरसता की सबसे बड़ी मिसाल है।

कैमरे के सामने नहीं, जीवन में समरसता

सोशल मीडिया या कैमरे के सामने समरसता की बातें कहना एक बात है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसे जीना सबसे महत्वपूर्ण है। भगवान किसी को छोटा नहीं मानते, सबको समान मानते हैं। संसार ब्रह्म में है और ब्रह्म के अनेक रूप हैं कोई उसे राम कहता है, कोई कृष्ण, कोई दुर्गा परंतु परमात्मा एक ही है।

संसार में भेदभाव मनुष्य की संकीर्ण सोच का परिणाम

परमपिता परमेश्वर एक ही हैं, जैसे मैं एक हूं लेकिन सभी लोग मुझे अलग-अलग कोण से देखते हैं। उसी प्रकार परमात्मा एक हैं, नाम अनेक हैं। जगन्नाथ जी के भक्ति-पथ में समरसता अनिवार्य है क्योंकि वे ‘समरसता के मूर्त रूप’ हैं।

जगन्नाथ कथा में नारी-सम्मान और समरसता

मार्गशीर्ष माह में महालक्ष्मी जी की विशेष पूजा की जाती है। महालक्ष्मी जी के अपमान के कारण वे श्रीमंदिर से बाहर चली गई थीं। 12 वर्ष तक भगवान जगन्नाथ दर-दर भटकते रहे। अंत में जब महालक्ष्मी जी ने शर्त रखी कि “श्री मंदिर में किसी भी प्रकार की छुआछूत या जातिभेद नहीं रहेगा” तब भगवान उन्हें सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर वापस लाए। तब से मंदिर में सभी के लिए समान व्यवस्था है।

सबसे बड़ा धर्म — इंसानियत और प्रेम

सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है। किसी के दुख को देखकर हमारे भीतर दुख होना चाहिए, और किसी के सुख को देखकर खुशी। यदि कोई 400 रुपये का शर्ट पहने है तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि इसे मैं फाड़ दूं, बल्कि सोचना चाहिए “मैं ऐसा क्या करूं कि मैं 800 रुपये का शर्ट पहन सकूं।” किसी का नुकसान नहीं करना है कर्मप्रधान विश्व में सभी का विकास होना चाहिए।

क्यों होता है कन्वर्जन.?

मेरे व्यक्तिगत अनुभव में कन्वर्जन का सबसे बड़ा कारण “सम्मान की कमी” है। यदि किसी को एक जगह अपमान मिलता है और दूसरी जगह सम्मान मिलता है, तो वह वहीं जाएगा जहां सम्मान मिलता है। मनुष्य सम्मान-भूखा है। यदि हम अपने समाज में सबको प्रेम, सम्मान और अपनापन देंगे तो कोई कहीं और नहीं जाएगा।

समापन : समरसता को बोलना नहीं, जीना है

समरसता को सिर्फ़ कहना नहीं है, उसे जीना है। भगवान स्पष्ट कहते हैं “सबके भीतर मैं ही व्याप्त हूं।” जब राम सबमें हैं और मुझमें भी हैं, तो फिर भेद कैसा? भगवान के विराट शरीर से ही चारों वर्ण उत्पन्न हुए इसलिए सब भगवान के ही अंग हैं। इसलिए किसी को अपमान की दृष्टि से मत देखिए। सभी को प्रेम दीजिए। क्योंकि संसार का सबसे बड़ा मंत्र है ‘प्रेम’।

Topics: Nava RaipurDanteshwari SamvadConversion Issue IndiaSamrasta MessageYuvraj Pandey SpeechJagannath SamrastaRam Krishan SamrastaSocial Harmony IndiaChhattisgarh EventPanchjanya Event
Shivam Dixit
Shivam Dixit
अनुभवी भारतीय पत्रकार, मीडिया एवं सोशल मीडिया विशेषज्ञ, राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कार विजेता, और डिजिटल रणनीतिकार। वर्ष 2015 में पत्रकारिता की शुरुआत। प्रिंट, TV और डिजिटल मीडिया संस्थानों में विभिन्न भूमिकाओं में कार्य किया। भारत की प्रथम SMS समाचार एजेंसी "न्यूज़ नेटवर्क ऑफ इंडिया" (NNI) में रिपोर्टर कोऑर्डिनेटर के रूप में काम किया, डिजिटल मीडिया के अनोखे प्रोजेक्ट "इंडियाज़ पेपर" का नेतृत्व करते हुए 500 समाचार वेबसाइटों का प्रबंधन किया। भारत के अलग अलग राज्यों के लगभग 1000 स्थानीय पत्रकारों से जुड़ा यह प्रोजेक्ट "लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड्स" में दर्ज है। वर्ष 2022 से राष्ट्रीय साप्ताहिक पत्रिका पाञ्चजन्य (1948 में स्थापित) में उपसंपादक के रूप में कार्यरत हैं। शिवम् की पत्रकारिता में राष्ट्रीयता, सामाजिक मुद्दों और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर रहा है। उनकी कई रिपोर्ट्स, जैसे- नूंह (मेवात) हिंसा, हल्द्वानी वनभूलपुरा हिंसा, जम्मू-कश्मीर पर "बदलता कश्मीर", "नए भारत का नया कश्मीर", "370 के बाद कश्मीर", "टेररिज्म से टूरिज्म", और अयोध्या राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा से पहले के बदलाव जैसे "कितनी बदली अयोध्या", "अयोध्या का विकास", और "अयोध्या का अर्थ चक्र", कई राष्ट्रीय मंचों पर सराही गई हैं। उपलब्धियों में देवऋषि नारद पत्रकार सम्मान (2023) शामिल है, जिसे उन्होंने जहांगीरपुरी हिंसा के मुख्य आरोपी "अंसार खान" की साजिश को उजागर करने के लिए प्राप्त किया। [Read more]
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