छत्तीसगढ़ के नवा रायपुर में मेफेयर लेक रिज़ॉर्ट , अटल नगर में पाञ्चजन्य के ‘दंतेश्वरी डायलॉग’ में राष्ट्रीय कथावाचक आचार्य पं. युवराज पांडे ने समरसता विषय पर अपने विचार रखे।
आचार्य पं. युवराज पांडे ने कहा- समरसता कोई विषय नहीं है, मेरे दृष्टिकोण में समरसता जीवन है। हमें जीवन को जीना है। समरसता को सिर्फ़ रास्ता कहने का तात्पर्य यह नहीं कि मैं किसी का सम्मान करूं या कोई मेरा सम्मान करे। समरसता का अर्थ है कि मेरे साथ बैठने वाला व्यक्ति अपने बारे में ‘मैं छोटा हूं’ ऐसा महसूस न करे।
बड़ा कौन है? यदि इस प्रश्न का सीधा उत्तर दें तो बड़ा वह है जिसके साथ बैठने वाला कोई भी व्यक्ति अपने आप को छोटा न समझे। धर्म और अध्यात्म में हमारे सभी शास्त्र, पुराण, महर्षि वेदव्यास जी द्वारा रचित ग्रंथ और भगवान के अवतार- चाहे राम हों या कृष्ण- सभी ने समरसता का ही संदेश दिया है। रामचरितमानस में तुलसीदास जी लिखते हैं कि प्रभु कहते हैं- “सब मम प्रिय, मैं सबमें व्याप्त हूं।” भगवान सबको समान प्रेम करते हैं- चाहे वनांचल में रहने वाली जनजाति हो, ब्राह्मण हों, ऋषि हों, क्षत्रिय हों या राजा।
भगवान राम के जीवन में समरसता के उदाहरण
राम जी का जन्म केवल रावण-वध उद्देश्य से नहीं था। उनके जन्म के अनेक कारण थे- “राम जन्म के हेतु अनेक, परम विचित्र एक ते एका।” वनवास काल में भगवान ने सबसे पहले ऋषि भारद्वाज से भेंट की, फिर वाल्मीकि जी के चरणवंदन किए। बाद में जब वे श्रृंगवेरपुर में निषादराज से मिले तो उन्हें ‘मित्र’ बनाया। निषादराज को भगवान ने अपने समकक्ष स्थान दिया। रामजी के छोटे भाई भरत ने भी निषादराज को ‘बड़े भैया’ कहकर सम्मान दिया।
वनांचल में रहने वाले कोल-भीलों के साथ भी भगवान ने समय बिताया, उनके यहाँ कंद-मूल-फल खाए, माता शबरी के झूठे बेर स्वीकार किए। इससे बड़ा समरसता का उदाहरण क्या होगा?
समरसता बोलने की नहीं, जीने की चीज है
समरसता स्थापित करने के लिए सबसे पहले स्वयं को दृढ़ संकल्प लेना पड़ता है। समरसता को बोलना नहीं, उसे जीना है। जब हम समरसता को व्यवहार में लाते हैं तो लोग हमें देखकर सीखते हैं— परिवार, गांव, जिला, राज्य और देश-सब इसका अनुकरण करते हैं। “मैं अकेला अखंड भारत का निर्माण करूंगा”- यह सोचकर अखंड भारत नहीं बनेगा। पहले स्वयं में समरसता का भाव लाना पड़ेगा।
भगवान कृष्ण के जीवन में समरसता
कृष्ण जी ने सुदामा के चरणों में झुककर सम्मान दिया। वृंदावन में ग्वालबालों के साथ 11.5 वर्ष तक रहे, अनेक लीलाएं कीं- यह दिखाता है कि भगवान का प्रेम सबके लिए समान था।
कलयुग में समरसता का सर्वोत्तम उदाहरण- श्री जगन्नाथ
कलयुग के प्रत्यक्ष भगवान श्री जगन्नाथ समरसता के जीवंत स्वरूप हैं। जगन्नाथ पुरी आने से पहले वे नयागढ़ के कंठिलो में ब्रह्मगिरि पर्वत पर नील माधव रूप में निवास करते थे।
भगवान जगन्नाथ ने सबसे पहले पूजा किसी ब्राह्मण से नहीं, बल्कि वनांचल में रहने वाले विश्वावसु साबर के हाथ से प्राप्त की। विश्वावसु द्वारा दिए गए कंद-मूल-फल भगवान ने ग्रहण किए। इसी कारण उन्हें पहले ‘साबरनाथ’ कहा गया, बाद में ‘जगन्नाथ’।
जगन्नाथ पुरी के श्रीमंदिर में आज भी कोई जाति-भेद नहीं है। सभी लोग एक पटरी पर बैठकर भोजन करते हैं। जहां तक मैं प्रवेश कर सकता हूं, वहीं तक सभी वर्णों के लोग प्रवेश कर सकते हैं। यह समरसता की सबसे बड़ी मिसाल है।
कैमरे के सामने नहीं, जीवन में समरसता
सोशल मीडिया या कैमरे के सामने समरसता की बातें कहना एक बात है, लेकिन वास्तविक जीवन में उसे जीना सबसे महत्वपूर्ण है। भगवान किसी को छोटा नहीं मानते, सबको समान मानते हैं। संसार ब्रह्म में है और ब्रह्म के अनेक रूप हैं कोई उसे राम कहता है, कोई कृष्ण, कोई दुर्गा परंतु परमात्मा एक ही है।
संसार में भेदभाव मनुष्य की संकीर्ण सोच का परिणाम
परमपिता परमेश्वर एक ही हैं, जैसे मैं एक हूं लेकिन सभी लोग मुझे अलग-अलग कोण से देखते हैं। उसी प्रकार परमात्मा एक हैं, नाम अनेक हैं। जगन्नाथ जी के भक्ति-पथ में समरसता अनिवार्य है क्योंकि वे ‘समरसता के मूर्त रूप’ हैं।
जगन्नाथ कथा में नारी-सम्मान और समरसता
मार्गशीर्ष माह में महालक्ष्मी जी की विशेष पूजा की जाती है। महालक्ष्मी जी के अपमान के कारण वे श्रीमंदिर से बाहर चली गई थीं। 12 वर्ष तक भगवान जगन्नाथ दर-दर भटकते रहे। अंत में जब महालक्ष्मी जी ने शर्त रखी कि “श्री मंदिर में किसी भी प्रकार की छुआछूत या जातिभेद नहीं रहेगा” तब भगवान उन्हें सम्मानपूर्वक श्रीमंदिर वापस लाए। तब से मंदिर में सभी के लिए समान व्यवस्था है।
सबसे बड़ा धर्म — इंसानियत और प्रेम
सबसे बड़ा धर्म इंसानियत है। किसी के दुख को देखकर हमारे भीतर दुख होना चाहिए, और किसी के सुख को देखकर खुशी। यदि कोई 400 रुपये का शर्ट पहने है तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि इसे मैं फाड़ दूं, बल्कि सोचना चाहिए “मैं ऐसा क्या करूं कि मैं 800 रुपये का शर्ट पहन सकूं।” किसी का नुकसान नहीं करना है कर्मप्रधान विश्व में सभी का विकास होना चाहिए।
क्यों होता है कन्वर्जन.?
मेरे व्यक्तिगत अनुभव में कन्वर्जन का सबसे बड़ा कारण “सम्मान की कमी” है। यदि किसी को एक जगह अपमान मिलता है और दूसरी जगह सम्मान मिलता है, तो वह वहीं जाएगा जहां सम्मान मिलता है। मनुष्य सम्मान-भूखा है। यदि हम अपने समाज में सबको प्रेम, सम्मान और अपनापन देंगे तो कोई कहीं और नहीं जाएगा।

















