श्री गुरु तेग बहादुर जी के बलिदान दिवस के अवसर पर कानपुर में तीन दिवसीय कार्यक्रम आयोजित हुआ। कार्यक्रम के दूसरे दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने गुरु ग्रंथ साहिब के समक्ष मत्था टेका। इसके बाद उन्होंने कहा कि साहस, शौर्य और बलिदान के प्रतीक गुरु तेग बहादुर जी सिख पंथ के नौवें गुरु थे। मुगल शासक औरंगजेब के अत्याचार सह रहे कश्मीरी पंडितों ने गुरु महाराज की शरण ली थी।
गुरु ने उन्हें धर्म रक्षा का वचन दिया और औरंगजेब की दमनकारी नीतियों का डटकर मुकाबला किया। औरंगजेब के आदेश पर उनको यातनाएं दी गईं, कन्वर्जन का दबाव भी बनाया गया। इसके बावजूद वे अपने मार्ग से डिगे नहीं। 1675 में उन्होंने धर्म, मानवता और मानवीय मूल्यों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया था।
इस अवसर पर श्री गुरु सिंह सभा के पदाधिकारियों ने होसबाले जी को सरोपा देकर सम्मानित किया। कार्यक्रम में श्री गुरु सिंह सभा, कानपुर महानगर के अध्यक्ष सरदार कुलदीप सिंह, प्रधान सिमरनजीत सिंह, गुरविंदर सिंह छाबड़ा (विक्की) आदि उपस्थित रहे।
‘सदा राह दिखाने वाला अपूर्व बलिदानी’

गत नवंबर को बठिंडा में सामाजिक -सांस्कृतिक संस्था ‘जन चेतना’ ने श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें बलिदान दिवस पर एक गोष्ठी आयोजित की। इसके मुख्य वक्ता और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबाले ने कहा कि श्री गुरु तेग बहादुर जी महाराज का बलिदान मात्र कुछ पैराग्राफ में लिखे जाने वाला साहित्य नहीं, अपितु सदियों तक समाज का मार्ग प्रशस्त वाली घटना है।
उन्होंने कहा कि असहिष्णुता के इतिहास को हम भूल नहीं सकते। इसी असहिष्णुता के कारण गुरु अर्जन देव जी की शहादत हुई। भारत भूमि के प्रत्येक संत ने कहा कि बाहर की विविधता न देखो, अंदर की आत्मा उसी एक ईश्वर का सुंदर अंश है। भारत के सभी महापुरुषों ने सभी मत-पंथों को ईश्वर तक पंहुचने का मार्ग बताया है। उन्होंने भाई सतीदास, भाई मतिदास एवं भाई दयाल दास के बलिदान को भी नमन किया।
इस अवसर पर संत बाबा जसवीर सिंह जी (अंश बंस माई देसां जी) ने कहा कि गुरु गोविंद सिंह जी की कई निशानियां हमारे घर में सुरक्षित रखी हुई हैं। इन निशानियों के दर्शन कई स्थानों पर संगत को कराए गए हैं। हम सभी एक ही ईश्वर के अंश हैं, यही गुरु नानक जी का संदेश है। उनके लिए पराया कोई नहीं, सभी अपने हैं, सभी एक हैं। युद्धभूमि में भाई कन्हैया द्वारा शत्रु पक्ष के घायल सैनिकों को पानी पिलाना, इसी सिद्धांत का व्यावहारिक जीवन में आचरण है।
मुख्य अतिथि और हिमाचल केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलाधिपति पद्मश्री डॉ. हरमोहिंदर सिंह बेदी ने कहा कि जहां एक ओर गुरु महाराज जी ने तेग अर्थात् तलवार चलाकर रण क्षेत्र में अपना कौशल दिखाकर तेग बहादुर नाम प्राप्त किया, वहीं अपनी लेखनी से उच्च कोटि के साहित्य की रचना की। श्री गुरु ग्रंथ साहिब में 59 शबद तथा 57 श्लोकों के रूप में सम्मिलित उनकी वाणी अध्यात्म, वीरता तथा ईश्वर के प्रति निष्ठा का संदेश देती है।

















