भोपाल में जमीयत उलेमा-ए-हिंद के कार्यक्रम में मौलाना महमूद मदनी द्वारा दिया गया वक्तव्य, “जब-जब जुल्म होगा, तब-तब जिहाद होगा” इसे वास्तव में सिर्फ एक टिप्पणी नहीं माना जा सकता है, यह एक ऐसा कथन है जिसके सामाजिक-राजनीतिक प्रभाव दूर तक जाते हैं। खासकर इसलिए क्योंकि “जिहाद” शब्द आधुनिक समय में एक विवादित और अक्सर हिंसा से जुड़ी अवधारणा बन चुका है। मदनी मानते हैं कि “जिहाद” एक पवित्र कर्तव्य है, अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का नाम है और हिंसा अथवा आतंक से उसका कोई संबंध नहीं, किंतु सवाल यह है कि यदि “जिहाद” वास्तव में इतना ही पवित्र और नैतिक अवधारणा है तो दुनिया के अनेक इस्लामिक, मजहबी हिंसक समूह उसे हत्याओं का औजार क्यों बनाते आए हैं और अब भी बना रहे हैं?
सभी समझें कि यह प्रश्न भावनात्मक नहीं है, ऐतिहासिक और भू-राजनीतिक सच्चाइयों का परिणाम है क्योंकि इससे जुड़ा पूरा इतिहास आज मौजूद है। बीते चार दशकों में जितने बड़े अंतरराष्ट्रीय आतंकी आक्रमण हुए, न्यूयॉर्क से लेकर मुंबई, दिल्ली से लेकर पेरिस तक उनमें दोषियों ने अपने कृत्य को अक्सर “जिहाद” के नाम पर उचित ठहराया है। क्या वे सभी समूह किसी “जुल्म” का उत्तर दे रहे थे? क्या उन पर दुनिया अत्याचार कर रही थी? यदि नहीं तो फिर भारत एवं दुनिया भर में सभी इस्लामी नेतृत्व को इस पर खुलकर कहना चाहिए कि हिंसा का यह रूप इस्लाम नहीं है।
दुखद यह है कि ऐसा स्पष्ट और साहसी प्रतिरोध ‘इस्लाम समूह’ के रूप में दिखाई नहीं देता है। अब तक जितने भी इस्लामिक आतंकवादी भारत में पकड़े गए हैं, उनमें अधिकांश से स्वयं से स्वीकार किया है कि वे गैर मुसलमानों के खिलाफ “जिहाद” एक पवित्र युद्ध कर रहे हैं! अब इसे कैसे नकारा जा सकता है? यह तथ्य तो तमाम जगह पुलिस और न्यायालयो के रिकार्ड में मौजूद है।
जिहाद की अवधारणा : सर्वोच्च आदर्श से राजनीतिक हथियार तक
वस्तुत: The Legacy of Jihad जैसी पुस्तकों में दर्ज विस्तृत शोध यह दिखाता है कि जिहाद की ऐतिहासिक अवधारणा में आध्यात्मिक संघर्ष (नफ्स के खिलाफ), सामाजिक न्याय और अन्याय के विरोध का तत्व तो था, परंतु सदियों में राजसत्ता, राजनीति और कट्टरपंथी नेतृत्व ने इसे कई बार “पवित्र युद्ध” का रूप भी दिया और इस्लाम के बने रहने और उसके विस्तारवाद के लिए अब भी दे रहे हैं। पुस्तक यह आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत करती है कि इस्लाम के मजहबी आदर्श और राजनीतिक महत्वाकांक्षा के मिश्रण ने इसे हिंसक दिशा की ओर मोड़ दिया।
इसी तरह : The Trail of Political Islam आधुनिक जिहादी आंदोलनों की जड़ें समझाती है और बताती है कि कैसे राजनीतिक इस्लाम ने जिहाद को वैचारिक हथियार की तरह उपयोग किया। The Mind of Jihad और Jihad and Death जैसी पुस्तकों को भी एक बार जमीयत उलेमा-ए-हिंद के प्रमुख मौलाना महमूद मदनी को अवश्य पढ़ लेना चाहिए, जो यह विश्लेषण करती हैं कि आज की आतंकी मानसिकता जिहाद को “नैतिक कर्तव्य” बताकर आत्मघाती हिंसा का औचित्य तैयार करती है। वहीं, Salafi-Jihadism यह स्पष्ट करती है कि कट्टरपंथी समूहों ने जिहाद को धर्म से अधिक विचारधारात्मक युद्ध का रूप दे दिया है। दुनिया भर में इस्लाम का शासन और उम्मा की सोच ही इस “जिहाद” के केंद्र में है।
इन सभी अध्ययनों से यह सामान्य निष्कर्ष उभरता है कि जिहाद का आध्यात्मिक अर्थ और उसका आधुनिक राजनीतिक-हिंसक अर्थ एक-दूसरे से बहुत भिन्न हैं। यदि मदनी और उनके समर्थक “जिहाद” को शुद्ध आध्यात्मिक व नैतिक सिद्धांत के रूप में मानते हैं, तो यह स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि आतंकवाद के नाम पर किया गया “जिहाद” इस्लाम के विरुद्ध अपराध है। लेकिन प्रश्न यह है कि भारत में यह स्पष्ट विभाजन कौन करेगा?
भारतीय मुसलमान, जिहाद का दुरुपयोग और मजहबी नेतृत्व की जिम्मेदारी
भारत का मुसलमान समुदाय बहुसंख्यक रूप से शांतिप्रिय, लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था रखने वाला और सामाजिक ताने-बाने का अभिन्न हिस्सा है, पर कट्टरपंथियों द्वारा “जिहाद” शब्द के दुरुपयोग की जिम्मेदारी भी किसी न किसी को लेनी होगी। क्या यह जिम्मेदारी मौलाना मदनी जैसे प्रभावशाली धार्मिक नेताओं की नहीं है कि वे खुलकर, बिना किसी अस्पष्टता के, यह कहें कि भारतीय उपमहाद्वीप और विश्व स्तर पर सक्रिय कई इस्लामिक आतंकवादी संगठनों में प्रमुख रूप से इंडियन मुजाहिदीन, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हरकत-उल-मुजाहिदीन, हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी, जमात-उद-दावा, अल-बदर, हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन और लश्कर-ए-झँगवी, हक्कानी नेटवर्क, अल-कायदा, अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट, आईएसआईएस, दाएश, अल-नुसरा फ्रंट और अंसार अल-शरिआ, अल-शबाब, बोको हराम और अंसार अल-इस्लाम जैसे संगठनों द्वारा किया गया कोई भी हिंसक ‘जिहाद’ इस्लाम विरोधी अपराध है।
क्या इन जैसे इस्लामिक नेताओं को सभी आतंकवादी संगठनों से भारत के मुसलमानों को दूर रहने का आह्वान नहीं करना चाहिए? लेकिन जब एक बड़ा मजहबी (धार्मिक) नेता सार्वजनिक मंच से कहता है कि “जुल्म होगा तो जिहाद होगा”, तब यह कथन सहसा ही उन कट्टरपंथी समूहों के नैरेटिव से टकराने के बजाय, जाने-अनजाने, उससे मिलता-जुलता प्रतीत होने लगता है, उनका समर्थन करता दिखता है। यह बात अपने-आप में खतरनाक है, क्योंकि समाज में भय, संदेह और विभाजन की जमीन ऐसे ही बयानों से तैयार होती है।
जुल्म की परिभाषा कौन तय करेगा.?
मदनी यह नहीं बताते कि “जुल्म” क्या है और इसका निर्धारण कौन करेगा। क्या किसी नीति से असहमति “जुल्म” है? क्या न्यायिक प्रक्रिया की आलोचना या समर्थन “जुल्म” है? क्या किसी राजनीतिक दल की बयानबाजी को “जुल्म” कहकर उसके विरुद्ध संघर्ष को “जिहाद” नाम दिया जा सकता है? इन मजहबी मौलानाओं द्वारा ‘जुल्म’ की परिभाषा अस्पष्ट छोड़ दी जाती है और यही अस्पष्टता कट्टरपंथियों द्वारा हिंसक नैरेटिव तैयार करने का औजार बनती है। यदि “जिहाद” केवल आत्म-सुधार, नैतिकता और अन्याय के खिलाफ शांतिपूर्ण संघर्ष है तो क्या कारण है कि पिछले कई वर्षों में दुनिया का सबसे बड़ा हिस्सा उसे आतंक, हिंसा और हत्या से जोड़कर देखता है? यह छवि किसने और कैसे बनाई और इसे बदलने की जिम्मेदारी सबसे पहले किस पर आती है?
भारत में जिहाद की राजनीति : विभाजन का रास्ता
भारत में जब कोई भी नेता चाहे वह धार्मिक, मजहबी हो या राजनीतिक इस तरह की भाषा इस्तेमाल करता है जो समाज के एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करती है तो अनायास ही सामाजिक अविश्वास बढ़ता है। मदनी का बयान इसी संदर्भ में चिंताजनक है, क्योंकि भारत में “जिहाद” का आधुनिक अर्थ उस ऐतिहासिक-आध्यात्मिक अर्थ से बहुत भिन्न नहीं समझा जाता जो किताबों में दर्ज है। यह वही अर्थ है जो आतंकी समूहों ने प्रचारित किया और कर रहे हैं। ऐसे में किसी भी जिम्मेदार नेता का प्राथमिक दायित्व यही होना चाहिए कि वह इस शब्द के दुरुपयोग को पहचाने, न कि उसे पुनः “पवित्रता” का आवरण देकर सार्वजनिक विमर्श में पुनर्जीवित करते हुए ये कहे कि “जब जब जुल्म होगा, तब तब जिहाद होगा”
वास्तव में यदि “जिहाद” का अर्थ मदनी की दृष्टि में हिंसा नहीं है, तो उन्हें यह भी भरोसा देना चाहिए कि जो लोग “जिहाद” के नाम पर हिंसा करते हैं, वे इस्लाम और भारतीय मुसलमानों दोनों के दुश्मन हैं। अब से वे ये सुनिश्चित करेंगे कि भारत में “जिहाद” शब्द का इस्तेमाल किसी भी राजनीतिक या मजहबी हिंसक आंदोलन में नहीं होगा। वस्तुत: तभी माना जा सकता है कि “जिहाद” वाकई इस्लाम की एक पवित्र अवधारणा है, अन्यथा तो सभी को पता है कि “जिहाद” के मायने गैर मुसलमान के प्रति हिंसा और अत्याचार है, ये अपनी इस्लामिक हुकूमत को कायम करने का सबसे बड़ा औजार है और यही सच है! फिलहाल तो यही दिखाई देता है।

















