इस्लाम में ‘अल’ की विशेषता के बीच जिहाद और आतंकवाद
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इस्लाम में ‘अल’ की विशेषता के बीच जिहाद और आतंकवाद

दुनिया भर के जिहादी संगठनों में ‘अल’ उपसर्ग क्यों दोहराया जाता है? क्या यह पॉलिटिकल इस्लाम के वैश्विक एजेंडा का संकेत है? पढ़िए आतंकी नेटवर्क और वैचारिक कड़ियों का गहराई से विश्लेषण।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Shivam Dixit
Nov 21, 2025, 06:40 pm IST
inभारत, विश्लेषण
AIU ने अल फलाह यूनिवर्सिटी की सदस्यता रद्द की

हाल के वर्षों में भारत सहित दुनिया भर में कई आतंकी घटनाओं में ऐसे नाम बार-बार सामने आए हैं जो इस्लामी कट्टरपंथ और जिहादी नेटवर्क से जुड़े होते हैं। दिल्ली कार बम कांड में ‘अल-फलाह यूनिवर्सिटी’ से संबंधित कुछ व्यक्तियों डॉ. मुजम्मिल शकील गनाई, डॉ. अदील अहमद राथर, डॉ. शाहीन सईद, मुफ्ती इरफान अहमद वगाय और इससे पहले अहमदाबाद व दिल्ली में हुए सीरियल ब्लास्ट में शामिल मिर्जा शादाब बेग के संदिग्ध संबंध उजागर होने पर यह प्रश्न एक बार फिर चर्चा में आया कि इस्लामिक दुनिया में “अल” उपसर्ग के प्रयोग और चरमपंथी संगठनों की वैचारिकी के बीच क्या कोई गहरा रिश्ता है?

इसके साथ ही यह प्रश्न भी अनिवार्य हो गया है कि क्या इस्लाम के भाषायी और वैचारिक ढाँचे में ‘अल’ जैसी विशिष्टता उसे लगातार जिहाद, हिंसा और गैर-मुसलमानों के विरुद्ध आतंक के रास्ते पर धकेल नहीं रही? क्या यह मात्र संयोग है कि दुनिया के अधिकतर जिहादी, आतंकी और इस्लामिक चरमपंथी संगठनों के नामों में यह ‘अल’ शब्द सबसे प्रमुखता से दिखाई देता है? या ये कोई प्रयोग है!

अरबी भाषा में “अल” एक निश्चित उपपद है जिसका अर्थ होता है, “वह” या “विशेष”। भाषिक रूप से यह सामान्य शब्द को पहचान और अधिकार देता है। परंतु आतंकवादी संगठनों के नामों में “अल” का व्यापक उपयोग एक संकेत देता है; अपने उद्देश्य, प्रकल्पना और लक्ष्य को ‘अनिवार्य’, ‘उच्‍च’ और ‘सर्वोच्च’ सिद्ध करने का प्रयास। वस्‍तुत: यदि सिर्फ भाषिक अर्थ तक ही इसे सीमित मान लिया जाए, तो भी यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि वैश्विक इस्लामिक आतंकवाद की ज्यादातर पहचान इसी उपसर्ग के सहारे रची गई है। दुनिया के किसी भी कोने में इस्लामिक हिंसा देखिए, अधिकाधिक मामलों में हमलावर तथा उन्हें समर्थन देने वाले संगठन अपने नामों के आगे “अल” को गर्व और अधिकार की तरह लगाते हैं। यह बिल्कुल भी संयोग नहीं हो सकता।

उदाहरण के लिए अल-कायदा, 1988 में ओसामा बिन लादेन द्वारा स्थापित एक ऐसा वैश्विक आतंकवादी नेटवर्क है जिसका घोषित लक्ष्य है जिहाद के बल पर पूरी दुनिया को इस्लामी शासन के अधीन करना। इसकी शाखाएँ– अल-कायदा इन द इंडियन सबकॉन्टिनेंट (एक्‍यूआईएस) विशेष रूप से भारत सहित दक्षिण एशिया में हिंसात्मक जिहाद की साजि‍शों में सक्रिय है। यह पाकिस्तान की जमीन और सपोर्ट से भारत के खिलाफ आतंक फैलाने में जुटा रहता है। लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, हिजबुल मुजाहिद्दीन इन सबके तार इसी विचारधारा से जुड़े हैं।

इसीलिए जब ‘अल फलाह यूनिवर्सिटी’ से आतंकी मॉड्यूल पकड़े जाते हैं, जिनमें शिक्षक और छात्र तक शामिल होते हैं, और वे जैश जैसे संगठनों से जुड़े मिलते हैं, तो यह साफ समझ में आता है कि इस ‘अल’ शब्द की वैचारिक धारा में कहीं न कहीं जिहादी प्रशिक्षण, ब्रेनवाश, और वैश्विक इस्लामिक वर्चस्व की सोच समाहित है। ‘अल-कायदा’ का अर्थ ही है—‘द बेस’ या ‘नींव’। अर्थात यह आतंकवाद का वैचारिक आधार है जिससे अन्य शाखाएँ तैयार होती जाती हैं। यही पैटर्न अन्य खतरनाक संगठनों में भी दिखता है, अल-इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस), अल-बद्र, अल-उमर मुजाहिदीन, अल-मुराबितून, अल-नुजाबा, अल-जमात-उल-मुजाहिदीन। ये सभी एशिया, अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका तक जिहाद की आग फैला रहे हैं।

कई संगठन जो नाम के प्रारम्भ में ‘अल’ नहीं लगाते, वे भी किसी न किसी रूप में इसे अपनी पहचान में शामिल करते हैं, जैसे कि अंसार-अल-इस्लाम, अंसार-अल-शरिया, अंसार गज़वत-उल-हिंद… इस तरह के 200 से अधिक सक्रिय संगठन दुनिया भर में इस्लामिक चरमपंथ और हिंसक जिहाद फैला रहे हैं। इन सभी की एक ही हेडलाइन सोच है, वह है पूरी दुनिया इस्लामिक हो जाए यानी बाकी सब या तो हमारे साथ हों या हमारे अधीन।

वास्‍तव में यही वह सोच है जो इस दुनिया की नैसर्गिकता, विविधता और सुंदरता पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष हमला करती है और सतत कर रही है। यह मानवता की स्वतंत्रता, पहचान और खुशबू को मिटाकर एकरूप कुरानिक शासन थोपने का एजेंडा है। शरिया लागू करने की जिद है। अवलोकन करें तो यह बात पूर्णरूपेण स्पष्ट होती है कि इस्लामिक दुनिया के भीतर एक विशेष विचार “पॉलिटिकल इस्लाम” अपनी जड़ें मजबूत कर चुका है। इसका उद्देश्य किसी खास क्षेत्र तक सीमित नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी पर इस्लामी राज स्थापित करना है। आज 57 इस्लामी देश दुनिया में मौजूद हैं, किंतु लक्ष्य इससे संतुष्ट होना नहीं है, इसीलिए पूरी दुनिया को उम्माह की छतरी तले कर देना है। इस सोच का पोषण मस्जिदों, मदरसों, इस्लामिक विश्वविद्यालयों, एनजीओ व मानवीय कार्यों की आड़ में भी लगातार होता देखा जा रहा है।

इस पर भी कहना होगा कि जिन्हें इस्लाम को शांति मजहब बताने का शौक है, वे इस वैश्विक जिहादी परियोजना पर प्राय: मौन दिखते हैं। इस आतंक के विरोध में न सड़क पर उतरते हैं, न सोशल मीडिया पर कोई हैशटैग चलाते हैं, न ही जिहादी चरमपंथ के खिलाफ सामूहिक प्रतिरोध व्‍यक्‍त करते हैं। इसके विपरीत आतंकियों को नई पहचान देने, उनकी आतंकी गतिविधियों को छुपाने, उन्हें पीड़ित दिखाने की कोशिशें होती रहती हैं। आज हमें यह स्‍वीकारना चाहिए कि यह मौन ही तो पॉलिटिकल इस्लाम के विस्तार की सबसे बड़ी शक्ति है!

हकीकत यह है कि इस्लामी जगत में ऐसे प्रयासों का विरोध करने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई देती। यदि यह स्वीकार्य नहीं तो इसका स्पष्ट और संयुक्त विरोध मुस्लिम दुनिया को स्वयं करना चाहिए। लेकिन चूँकि वास्तविकता इसके उलट है; तमाम इस्लामी देश और समूह खुलकर न सही, पर मौन आशीर्वाद प्रदान करते दिखाई देते हैं, इसलिए यह कहना बिल्कुल उचित प्रतीत होता है कि जिहादी आतंकवाद इस्लाम के भीतर स्थापित राजनीतिक एजेंडा का ही हिस्सा है।

आज एशिया, अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका कहीं भी इस्लामिक चरमपंथ पैर जमाता है तो वहाँ सबसे पहले विविधता पर प्रहार होता है, जो उनकी विचारधारा में फिट नहीं, वह शत्रु घोषित कर दिया जाता है। संस्कृतियाँ मिटाई जाती हैं, मंदिर-गिरजाघर ध्वस्त किए जाते हैं। महिलाओं की स्वतंत्रता खत्म होती है और असहमति की कोई जगह नहीं छोड़ी जाती। यह प्रकृति के उस सिद्धांत के विरुद्ध है जिसमें विविधता ही जीवन का मूल स्वरूप है।

अब जिन्हें लगता है कि जिहादी आतंकवाद केवल सुरक्षा का प्रश्न है, उन्‍हें ये जरूर याद रखना चाहिए कि यह मनुष्य की निजी स्वतंत्रता, सभ्यता और अस्तित्व का संकट है। यदि यह परियोजना (पॉलिटिकल इस्‍लाम) सफल होने दी गई तो धरती पर एक ही रंग, एक ही स्वर, एक ही जीवन पद्धति थोप दी जाएगी और जोकि यह मानव जाति के अंत की शुरुआत होगी।

अतः आज इस बात को स्पष्ट तौर पर कहा जाना चाहिए कि राजनीतिक इस्लाम और हिंसक जिहाद मानवता के लिए सबसे घातक विचार है। इसके लक्ष्य में शांति नहीं, वर्चस्व है। इसका मार्ग प्रेम नहीं, आतंक है। इसका परिणाम विविधता का अंत और गुलामी की शुरुआत है। ऐसे में ये आज के समय की मांग है कि विश्व इस खतरे को पहचाने और इस वैश्विक जिहादी मशीनरी के विरुद्ध निर्णायक कदम उठाए। अन्यथा भविष्य अंधकारमय है।

Topics: Terrorism Research IndiaIslamist Violence DebateGlobal Security ThreatPolitical Islam AnalysisAl Prefix Terror GroupsIslamic Extremism FactsGlobal Jihad NetworkAl Qaeda IdeologyJihadi Organizations StudyRadicalization Pattern
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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