पश्चिम बंगाल की सीमा पर एसआईआर के चलते अजीब सा माहौल है। बांग्लादेश से सटी उत्तर 24 परगना जिले के हकीमपुर बॉर्डर पर रोजाना सैकड़ों लोग जमा हो रहे हैं। ये ज्यादातर बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं, जो अवैध तरीके से देश में घुसे थे। अब चुनाव आयोग के एक कदम के बाद ये वापस बांग्लादेश लौट रहे हैं। बात ये है कि अगले साल बंगाल में विधानसभा चुनाव हैं, और बीच में SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिविजन का नाम आते ही सबकी सांसे थम सी गई हैं। ममता बनर्जी इसे मुद्दा बनाकर केंद्र और चुनाव आयोग पर हमलावर हैं।
हकीमपुर बॉर्डर पर उमड़ी भीड़
टीवी 9 भारतवर्ष की रिपोर्ट के अनुसार, हकीमपुर बॉर्डर आउटपोस्ट पर ये सिलसिला पिछले कुछ दिनों से चल रहा है। अवैध तरीके से भारत घुसे इन लोगों में भगदड़ मची हुई है। एक महिला ने बताया, “हम 15-20 साल से यहां हैं, लेकिन SIR के नाम से रूह कांप रही है। वोटर लिस्ट से नाम कटेगा तो देश से बाहर कर दिया जाएगा।” ज्यादातर ये मुस्लिम समुदाय के लोग हैं, जो 2002-03 की SIR लिस्ट में नाम न होने की वजह से घबरा गए हैं। वे कहते हैं, “बच्चों का भविष्य सोचिए, हम खुद चले जाएंगे लेकिन गिरफ्तार न हों।”
इसकी खबर फैलते ही पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस खुद हकीमपुर पहुंचे। 27 नवंबर को उन्होंने हालात का जायजा लिया और ‘रिवर्स माइग्रेशन’ की रिपोर्ट्स पढ़ीं। लेकिन मजेदार बात ये कि उनके आने के ठीक पहले वो सारी भीड़ गायब! न कतारें, न शोर-शराबा। राज्यपाल लौटे तो फिर वही तमाशा शुरू। अब सवाल ये है कि ये सब कितना सच्चा है? बीएसएफ के मुताबिक, ये लोग खुद ही आकर आवेदन दे रहे हैं, लेकिन नंबर्स बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए जा रहे हैं।
SIR मतदाता सूची को साफ सुथरा करने का है तरीका
SIR प्रक्रिया मतदाता सूची को साफ-सुथरा बनाने का तरीका है। चुनाव आयोग ने इसे चलाया ताकि फर्जी वोटरों का सफाया हो। लेकिन बंगाल में ये घुसपैठियों के लिए आफत लग रही है। कई परिवारों के पास आधार, पैन, यहां तक कि जमीन के कागजात हैं, लेकिन पुरानी SIR लिस्ट में नाम न होने से वे असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। एक बुजुर्ग ने कहा, “1971 के बाद आए शरणार्थी तो अलग हैं, लेकिन हम जैसे नए घुसे तो क्या करेंगे?”
राजनीतिक जानकार पार्थ मुखोपाध्याय जैसे एक्सपर्ट इसे सीधा नहीं मानते। उनका कहना है, “SIR से नाम कटने का डर ठीक है, लेकिन 12 वैध दस्तावेज जैसे पासपोर्ट या डोमिसाइल से कोई भी नाम जोड़ सकता है। ये पलायन की बातें बढ़ा-चढ़ाकर कही जा रही हैं।” वाकई, 1971 के बांग्लादेश युद्ध के बाद लाखों शरणार्थी यहां बसे, कॉलोनियां बनीं। उसके बाद भी घुसपैठ जारी रही। केंद्र और राज्य दोनों मानते हैं कि बंगाल से होकर देशभर में ये फैल गए। लेकिन SIR का असर इतना घातक क्यों लग रहा?
झूठ की राजनीति कर रहीं ममता बनर्जी
ममता बनर्जी SIR को एनआरसी से जोड़कर देख रही हैं। वे कहती हैं, “ये मुसलमानों को डराने का हथकंडा है।” 2021 के चुनाव में CAA-NRC पर उन्होंने मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण किया था, और कामयाब रहीं। बंगाल में मुस्लिम आबादी 32% है, ज्यादातर बांग्ला भाषी। अब SIR को वे सियासी हथियार बना रही हैं। बीएलओ की मौत का भी जिक्र कर रही हैं। वे एक झूठ फैला रही हैं कि केंद्र के कारण बंगाल में अशांति है।
विपक्षी बीजेपी का कहना है कि ममता भ्रम फैला रही हैं। नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी बोले, “ममता को डर है कि उनके वोट बैंक के अवैध नाम कट जाएंगे। वे चुनाव आयोग को गालियां दे रही हैं, लेकिन जनता उन्हें उड़ा देगी।” बीजेपी का आरोप है कि तृणमूल SIR का विरोध कर मुसलमानों में डर पैदा कर रही, ताकि वोट सोलिड हो जाएं। बिहार में ये मुद्दा फिसला, लेकिन बंगाल में ममता इसे भुनाने पर तुली हैं।

















