सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए सूचना और प्रसारण मंत्रालय को निर्देश दिया है कि सोशल मीडिया पर यूजर-जनरेटेड कंटेंट को अपलोड करने से पहले स्क्रीनिंग का एक ड्राफ्ट मैकेनिज्म तैयार करे। इसका मकसद है कि हानिकारक पोस्ट वायरल होने से पहले ही रुक जाएं, ताकि समाज में किसी भी तरह का वैमनस्य फैलने से पहले ही रोका जा सके। कोर्ट ने कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी जरूरी है, लेकिन वो बिल्कुल असीमित नहीं। अमेरिका के फर्स्ट अमेंडमेंट जैसी आजादी यहां लागू नहीं होती।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमल्या बाघची की बेंच ने की।’एंटी-नेशनल’ शब्द पर गर्म बहसकोर्ट में ‘एंटी-नेशनल’ टर्म को लेकर काफी चर्चा हुई। एडवोकेट प्रशांत भूषण ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि ये शब्द चुनिंदा और व्यक्तिपरक है। मिसाल के तौर पर, अगर कोई सिक्किम के भारत में विलय या चीन के दावों पर बात करे, तो क्या वो एंटी-नेशनल हो जाता है? सीजेआई सूर्यकांत ने जवाब दिया कि अगर कोई वीडियो पोस्ट करे जिसमें भारत का कोई हिस्सा पड़ोसी देश का बताया जाए, तो वो एंटी-नेशनल हो सकता है। लेकिन सरकार के खिलाफ बोलना डेमोक्रेटिक राइट है, ये एंटी-नेशनल नहीं।
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने जोर देकर कहा कि कोर्ट की बहस से अलगाववाद को बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए। कोर्ट ने साफ किया कि न सरकार और न ही प्लेटफॉर्म्स को ये तय करने का हक है कि क्या हानिकारक है, वरना दुरुपयोग हो सकता है।
वायरल होने से पहले रोकथाम क्यों जरूरी?
आजकल कंटेंट इतनी तेजी से फैलता है कि सरकार को पता चलने में 1-2 दिन लग जाते हैं। तब तक पोस्ट वायरल हो चुकी होती है और समाज में हंगामा मच जाता है। कोर्ट ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उदाहरण दिया। एक शख्स ने पाकिस्तान समर्थक वीडियो पोस्ट किया। कोर्ट पहुंचने से पहले ही वो डिलीट हो गया, लेकिन वायरल तो हो चुका था। मौजूदा कानून अपलोड के बाद ही एक्शन लेते हैं, पहले नहीं रोकते। सेल्फ-रेगुलेटरी कोड्स भी फेल साबित हो रहे हैं। ओटीटी और ब्रॉडकास्टर संगठनों ने कहा कि उनके पास पहले से कोड हैं, प्री-केंसर्शिप की जरूरत नहीं। लेकिन कोर्ट ने पूछा कि फिर हानिकारक कंटेंट बार-बार क्यों आता है?
स्व-नियमन की कमियां और नया मैकेनिज्म
कोर्ट ने माना कि सिस्टम में कानूनी खालीपन है, जिसे भरना पड़ेगा। एक रीजनेबल प्रिवेंटिव मैकेनिज्म चाहिए, जो अपलोड से पहले फिल्टर करे। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) इसमें बड़ी भूमिका निभा सकता है। कुछ कंटेंट एजुकेशनल हो सकता है, लेकिन अश्लील या नफरत फैलाने वाला भी। कोर्ट ने जोर दिया कि ये सिस्टम अभिव्यक्ति को दबाए नहीं, बल्कि बैलेंस्ड हो।
सरकार को चार हफ्ते का समय
अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणि और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि मंत्रालय चार हफ्तों में ड्राफ्ट तैयार करेगा। इसमें पब्लिक सजेशन्स लेंगे। एक्सपर्ट्स, लीगल स्कॉलर्स और मीडिया प्रोफेशनल्स से सलाह लेंगे। कोर्ट ड्राफ्ट और इनपुट्स रिव्यू करेगा, उसके बाद अगली सुनवाई होगी। ये कदम सोशल मीडिया को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की दिशा में है।















