उत्तर भारत इस समय जिस असाधारण मौसमीय घटना का सामना कर रहा है, वह पृथ्वी-विज्ञान, वायुमंडल, वैश्विक जलवायु, जेट स्ट्रीम और भूगर्भीय प्रक्रियाओं की परस्पर-निर्भरता का दुर्लभ और जीवंत उदाहरण है। दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हिमालयी राज्यों का आसमान अचानक गहरा और असामान्य रूप से धुंधला दिखाई देने लगा और इसका कारण था करीब 12 हजार वर्ष के लंबे मौन के बाद अफ्रीका के उत्तरी पूर्वी देश इथियोपिया में फटा हैली गुब्बी ज्वालामुखी। इथियोपिया का यह ज्वालामुखी 10-12 हजार वर्षों से शांत पड़ा हुआ था, जो 23 नवंबर को अचानक फट गया और इस दौरान काफी जोरदार विस्फोट भी हुआ, जिसकी राख अरब सागर को पार करके 120-130 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से भारत में दाखिल हो चुकी है। यह भूगर्भीय इतिहास और मौसम विज्ञान की दृष्टि से अत्यंत चौंकाने वाली घटना है, जिसने यह साबित किया है कि पृथ्वी की प्राकृतिक घटनाएं अब भौगोलिक सीमाओं में बंधी नहीं रही।
हैली गुब्बी का जागना और भारत का धुंधलाना
यह पहली बार है, जब पूर्वी अफ्रीका में हुई किसी भूगर्भीय हलचल का वायुमंडलीय प्रभाव भारत के इतने व्यापक हिस्से पर स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है। यह घटना केवल मौसम में असामान्य बदलाव का संकेत नहीं देती बल्कि वैश्विक जलवायु तंत्र, पर्यावरणीय सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और विमानन सुरक्षा के लिए गंभीर प्रश्न भी खड़े करती है। यह केवल किसी दूर देश की प्राकृतिक घटना नहीं थी बल्कि यह वायुमंडल के सबसे ऊंचे स्तरों पर होने वाली उन प्रक्रियाओं का ‘रीयल-टाइम प्रदर्शन’ है, जिनसे पृथ्वी के महाद्वीप एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं। यह घटना इस विचार को और सुदृढ़ करती है कि आज के समय में पर्यावरणीय जोखिम और भूगर्भीय हलचलें स्थानीय नहीं बल्कि पूर्णतः वैश्विक होती जा रही हैं। इथियोपिया में पृथ्वी के गर्भ में दबी मैग्मा की उथल-पुथल ने भारत के आसमान, विमानन व्यवस्था, तापमान और दृश्यता तक को प्रभावित किया है।
टेक्टोनिक प्लेटों की टकराहट और ज्वालामुखीय विस्फोट
हैली गुब्बी ज्वालामुखी 10-12 हजार वर्षों से निष्क्रिय था। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह पूर्वी अफ्रीका की रिफ्ट वैली में स्थित है, जहां टेक्टोनिक प्लेटों की सक्रियता विश्व में सबसे अधिक मानी जाती है। इस टेक्टोनिक बेल्ट में अरेबियन प्लेट, सोमालियन प्लेट और नूबियन प्लेट के अलगाव के कारण लगातार भू-प्रक्रियाएं जारी रहती हैं। विस्फोट के बाद लाखों टन ज्वालामुखीय राख वायुमंडल में उछली, जो तुरंत ही ट्रॉपोस्फियर के ऊपर के स्तरों में फैलने लगी। इसके कणों में ज्वालामुखीय कांच, प्यूमिस, सल्फर डाइऑक्साइड और अत्यंत महीन सिलिकेट कण शामिल हैं, जो हवा में अत्यंत हल्के होते हैं और जेट स्ट्रीम द्वारा लंबी दूरी तक ले जाए जा सकते हैं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, ज्वालामुखी विस्फोट के समय ऐसा लगा, जैसे धुएं और राख के साथ अचानक कोई बम फैंका गया हो। विस्फोट के बाद अफदेरा और आसपास के गांव राख की मोटी परत से ढ़क गए। भूकंपीय झटके और तेज विस्फोटक आवाज ने लोगों को दहशत में डाल दिया। स्थानीय पशुपालक समुदायों पर इसका आर्थिक प्रभाव लंबे समय तक रहेगा क्योंकि यह राख मिट्टी की उर्वरता से लेकर जल स्रोतों तक को प्रभावित करती है लेकिन इस घटना का प्रभाव केवल अफ्रीका तक नहीं रहा बल्कि यह भूगर्भीय विस्फोट कुछ ही घंटों में भारत के आसमान पर भी अपनी छाप छोड़ने लगा।
दृश्यता और तापमान पर असर
ज्वालामुखी विस्फोट के तुरंत बाद राख का गुबार जेट स्ट्रीम में घुस गया, ये वही तेज हवाएं हैं, जो 30,000-45,000 फीट की ऊंचाई पर 100 से 250 किमी/घंटा की रफ्तार से चलती हैं। इस स्ट्रीम ने राख के गुबार को अद्भुत गति प्रदान की, जिसके कारण यह केवल 12 घंटे में 3500 किलोमीटर और 20 घंटे में लगभग 4500 किलोमीटर दूर भारत पहुंच गया। सामान्य परिस्थितियों में इतनी दूरी तय करने में कई दिन लग सकते थे लेकिन जेट स्ट्रीम की गति और दिशा ने इस राख के गुबार को सीधे पश्चिमी भारत की ओर धकेल दिया। मौसम संस्थानों के उपग्रह चित्रों में यह परत इतनी साफ दिखाई दे रही थी, मानो किसी ने अफ्रीका से भारत तक एक धूसर पट्टी खींच दी हो। यह परत धरती की सतह से बहुत ऊपर 25,000 से 45,000 फीट पर तैर रही थी, इसलिए इसका प्रत्यक्ष प्रभाव हवा की गुणवत्ता पर नहीं पड़ा लेकिन आसमान के रंग, सूर्य के प्रकाश के फैलाव, तापमान और दृश्यता पर इसका स्पष्ट असर देखा गया। दिल्ली-एनसीआर में 24 नवंबर को रात 11 बजे के आसपास यह राख पहुंची। मौसम विभाग के अनुसार, इससे न्यूनतम तापमान में हल्की वृद्धि हो सकती है क्योंकि राख रात की ऊष्मा को बाहर जाने से रोक लेती है।
ज्वालामुखी की राख ने बढ़ाया संकट
दिल्ली में प्रदूषण पहले ही संकट के स्तर पर था। ज्वालामुखी की यह राख भले ही सीधे हवा में घुलकर एक्यूआई न बढ़ाए लेकिन इसने मौजूदा प्रदूषकों की दृश्यता को और बढ़ा दिया। प्रदूषण विशेषज्ञों के अनुसार, ऊंचाई पर तैरती राख वातावरण में बहुस्तरीय परतें बनाती है। इससे हवा में मौजूद स्थानीय प्रदूषक (पीएम2.5, पीएम10) नीचे ही फंसे रहते हैं, जिससे सतह के प्रदूषण का असर कुछ घंटों के लिए और गंभीर महसूस होता है, हालांकि इसका वास्तविक एक्यूआई पर बड़ा असर नहीं देखा गया लेकिन विमानन क्षेत्र में यह एक बड़ा खतरा बनकर उभरा। ज्वालामुखीय राख विमान इंजनों के लिए विशेष रूप से खतरनाक मानी जाती है। इस राख के महीन कण इंजन के उच्च ताप के दौरान पिघलकर कांच जैसी परत बना सकते हैं, जिससे ब्लेड पर जमा, थ्रस्ट में कमी या इग्निशन-संबंधी गड़बड़ियां उत्पन्न होने की संभावना बढ़ जाती है। इससे इंजन फेल होने का जोखिम बढ़ जाता है। इसी जोखिम के मद्देनजर डीजीसीए ने तुरंत सभी एयरलाइंस को एडवाइजरी जारी करते हुए नोटम और एस्टम्स (एश वार्निंग) पर विशेष नजर रखने के निर्देश दिए, जिसके चलते कई अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों को रद्द और डायवर्ट करना पड़ा। अकासा एयर ने जेद्दा, कुवैत और अबू धाबी की अपनी उड़ानें रद्द कर दीं। केएलएम, इंडिगो और अन्य एयरलाइनों ने भी एहतियाती कदम उठाए। कोच्चि एयरपोर्ट से दो अंतर्राष्ट्रीय उड़ानें सुरक्षा कारणों से नहीं उड़ी। एयरलाइनों को अपने रूटों को बदलना पड़ा ताकि विमान इस ऊंचाई पर तैरती राख के गुबार में न फंसें। पायलटों को इंजन के किसी भी असामान्य शोर, कंपन या केबिन की गंध की तुरंत रिपोर्ट करने को कहा गया। दरअसल विमानन इतिहास में कई बड़े हादसे ज्वालामुखीय राख के कारण हुए हैं, इसलिए भारत ने तुरंत सतर्कता अपनाकर बड़ा नुकसान टलने दिया।
ग्लेशियरों की अल्बीडो क्षमता पर मंडराता नया खतरा
भारत के मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि यह राख हिमालय की ऊपरी पर्वत श्रृंखलाओं (हिमाचल, उत्तराखंड और नेपाल के ऊंचे हिस्सों) से टकरा सकती है। ऐसा होने पर यह बर्फ की सतह पर जम सकती है, जिससे ग्लेशियरों की अल्बीडो (प्रतिबिंब क्षमता) प्रभावित हो सकती है। बर्फ पर राख गिरने से वह सूर्य का प्रकाश अधिक अवशोषित करने लगती है, जिससे हिमनद तेजी से पिघल सकते हैं। हालांकि यह प्रभाव अभी बहुत छोटा और अल्पकालिक माना जा रहा है लेकिन यह भविष्य के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है। जल वैज्ञानिकों के अनुसार, राख के सूक्ष्म कण जहां भी बैठेंगे, वहां के पानी को वे रासायनिक रूप से बदल सकते हैं। सल्फर डाइऑक्साइड का जल में घुलना अम्लीयता बढ़ाता है, जो स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र के लिए हानिकारक होता है। भारत में यह राख भले ही जमीन तक न पहुंचे लेकिन हिमालय के ऊंचे इलाकों पर गिरने की स्थिति में यह एक महत्वपूर्ण पर्यावरणीय जोखिम बन सकता है।
स्थानीय विस्फोट, वैश्विक असर
हैली गुब्बी का विस्फोट हालांकि आकार में माउंट पिनातुबो से छोटा है, फिर भी इससे उत्पन्न राख का गुबार भारत की जलवायु पर अस्थायी लेकिन महत्वपूर्ण असर डाल रहा है। यह पूरा घटनाक्रम पृथ्वी विज्ञान के उस सिद्धांत को दोहराता है कि भू-महाद्वीपीय प्लेटों की गतिविधियां और वायुमंडलीय प्रक्रियाएं अब एक-दूसरे से कटकर नहीं देखी जा सकती। 1991 के पिनातुबो विस्फोट ने वैश्विक तापमान एक वर्ष के लिए लगभग 0.5 डिग्री सेल्सियस तक कम कर दिया था। हालांकि इथियोपिया का यह विस्फोट उससे छोटा है लेकिन इसने वैश्विक मौसमीय संतुलन पर अपनी अस्थायी छाप अवश्य छोड़ी है। इस घटना ने यह भी संकेत दिया है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में पृथ्वी के भीतर की भूगर्भीय प्रक्रियाएं भी अधिक सक्रिय और अनिश्चित हो सकती हैं। कई अध्ययन बताते हैं कि ग्लेशियरों के पिघलने से पृथ्वी की पपड़ी पर भार-संतुलन बदलता है, जिसके कारण कुछ क्षेत्रों में ज्वालामुखीय सक्रियता बढ़ सकती है। पूर्वी अफ्रीका का क्षेत्र पहले ही ‘ज्वालामुखीय हॉटस्पॉट’ माना जाता है और हैली गुब्बी का 10 हजार साल बाद फटना इस बात का संकेत है कि पृथ्वी अभी भी गहराई में लगातार बदल रही है।
ट्रांस-बाउंड्री जोखिमों का नया युग
यह संपूर्ण घटना पूरी दुनिया के लिए एक संदेश है कि वैश्विक जलवायु और वातावरण की घटनाएं अब सीमाओं से बंधी नहीं रही। एक महाद्वीप पर घटने वाली गतिविधि दूसरे महाद्वीप की हवा, आसमान, तापमान और यातायात को प्रभावित कर देती है। आने वाले समय में ऐसे ‘ट्रांस-बाउंड्री पर्यावरणीय जोखिम- और भी बढ़ सकते हैं, चाहे वे ज्वालामुखी हों, जंगलों की आग हो, धूल भरी आंधियां हों या समुद्रों के उत्थान। दिल्ली-एनसीआर और उत्तर भारत के आसमान पर इथियोपिया की राख का असर कुछ घंटों या कुछ दिनों का हो सकता है, जल्द ही हवा के पैटर्न बदलने पर राख पूर्व की ओर बहकर बंगाल की खाड़ी और दक्षिण-पूर्व एशिया की दिशा में आगे निकल जाएगी लेकिन यह घटना स्मरण कराती है कि धरती एक इकाई है और उसका हर कंपन, हर विस्फोट, हर बदलाव कहीं न कहीं दुनिया के किसी दूसरे हिस्से को प्रभावित करता है। इसलिए दुनिया के तमाम देशों को अब पर्यावरण की सुरक्षा, मौसम की निगरानी और वायुमंडलीय विज्ञान को स्थानीय नहीं बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। भारत ने इस घटना के दौरान जिस तेजी से वैज्ञानिक विश्लेषण, उपग्रह निगरानी, विमानन सुरक्षा और मौसम चेतावनियों पर कदम उठाए, वह इस बात का संकेत है कि देश अब वैश्विक पर्यावरणीय खतरों से निपटने के लिए अधिक सक्षम हो रहा है। बहरहाल, इथियोपिया के ज्वालामुखी का यह विस्फोट केवल एक भू-वैज्ञानिक घटना नहीं था, यह पृथ्वी के विज्ञान का वह दुर्लभ अध्याय है, जिसने हमें दिखाया कि वातावरण, हवा, कण और ऊर्जा की इस दुनिया में कोई दूरी वास्तव में दूरी नहीं है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार और चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ के लेखक हैं)
















