जब से डिजिटल मीडिया का प्रसार हुआ है, तेजी से असली-नकली, सब तरह के कंटेंट बेहिसाब फैल रहे हैं। इसका सबसे ताजा उदाहरण बिहार चुनाव का परिणाम है। चुनाव परिणाम आने के बाद अगले 24 घंटे में करीब 25 ऐसे वीडियो आए, जिनमें से एक भी बिहार से संबंधित नहीं था। नेपाल की तर्ज पर उन वीडियो को बिहार के चुनाव परिणाम से जोड़कर ऐसे दिखाया गया, मानो चुनाव आयोग के खिलाफ बिहार के नौजवान सड़कों पर आ गए हैं।
ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि ‘फेक न्यूज’ की समस्या कितनी गंभीर है। तकनीक जैसा ब्रह्मास्त्र ऐसे लोगों के हाथ में चला गया है जो इसके उपयोग की कोई मर्यादा नहीं रखते हैं। वे नहीं समझते हैं कि इसका देश और समाज पर क्या असर पड़ेगा। ऐसे में बड़े मीडिया संस्थानों को यदि अपनी विश्वसनीयता बनाए रखनी है तो उन्हें सावधानी से खबरों की विश्वसनीयता की पड़ताल करनी होगी।
मैंने अखबार से करियर शुरू किया था। वहां जितनी संख्या शहर संवाददाताओं की थी, उससे ज्यादा लोग प्रूफ रीडिंग करते थे, ताकि मात्रा की भी गलती न चली जाए। हमारा अखबार पढ़कर लोग हिंदी सीखते हैं। लेकिन अखबार में यह चेक पॉइंट नहीं रहा। जब टेलीविजन न्यूज चैनल आए तो चीजें एकदम से बदल गईं। अब सोशल मीडिया के आने के बाद जिस तरह हर दिन नई-नई तकनीक आ रही है, उससे खतरा और बढ़ गया है। ऐसे में एक विभाग या एक यूनिट हर मीडिया संस्थान को बनानी होगी जो खबरों की सत्यता को परखे। उसके अलावा कोई चारा नहीं है।
हालांकि हमारे विश्वविद्यालय ने इस तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। पिछले महीने हमने एक बड़ी वर्कशॉप की थी। एक राष्ट्रीय न्यूज एजेंसी की टीम हमारे यहां आई थी। उसने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान लगभग 350 वीडियो, जो सभी बड़े चैनलों पर चल चुके थे, उनकी जांच की। उसमें बड़ी संख्या में ऐसे वीडियो मिले जो दूसरे देश के थे।
वे किसी दूसरे युद्ध के थे। ऑपरेशन सिंदूर से उनका संबंध नहीं था, लेकिन उन्हें इसी नाम से प्रसारित किया गया। उस टीम ने हमारे विद्यार्थियों को बताया कि फैक्ट चेक कैसे करना है। राजनीतिक, स्वास्थ्य व अर्थतंत्र, ये तीन विषय ऐसे हैं जिनसे संबंधित फेक कंटेंट डिजिटल मीडिया पर बाढ़ की तरह छाया हुआ है। 2018 में बच्चों के अपहरण को लेकर बहुत सारी फेक न्यूज जारी हुई थी। 2019 में कोविड-19 के समय बहुत सारा फेक कंटेंट फैलाया गया। 2020 में भारत में सीएए के खिलाफ झूठी खबरें फैलाई गईं।
ऐसे में खबरों की जांच के लिए 2019 में पत्र सूचना कार्यालय को एक फैक्ट चेक यूनिट अलग से बनानी पड़ी। कुछ महीनों बाद जब उन्होंने आंकड़े जारी किए तो पता चला कि 1200 खबरें देश भर में झूठी फैलाई गईं।
उन्होंने एक ऑनलाइन पोर्टल बनाया है जिसमें कोई भी फेक न्यूज के बारे में शिकायत दर्ज कर सकता है।
टीवी मीडिया की जो नंबर-वन की होड़ है, यह बेहद चिंताजनक है। आखिरी क्षणों में यदि कोई खबर आपके पास आई है और उसको जांचने लायक समय भी अगर आपके पास नहीं है तो उस समय संपादक की यह जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह निर्णय लें कि जब तक इसकी विश्वसनीयता की परख नहीं हो जाएगी तब तक इसको ऑन-एयर नहीं करना है, क्योंकि समाज और देश के प्रति हमारी जिम्मेदारी है। हमें नंबर-वन की होड़ में नहीं पड़ना है बल्कि विश्वनीय सूचना लोगों तक पहुंचानी है।

















