संघ की सौ वर्ष की यात्रा दर्शाती है कि किसी भी नए विचार या संगठन को सामाजिक स्वीकृति पाने में समय लगता है। 1925 में परमपूज्य डॉ. हेडगेवार जी द्वारा स्थापित संघ भी इसी क्रम में धीरे-धीरे समाज में अपनी जड़ें मजबूत करता गया। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा के संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि यह किसी राजनीतिक विचार का परिणाम नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा की अभिव्यक्ति है। आज दुनिया भर में ‘नैरेटिव’ के संघर्ष का दौर है। हर संस्था और संगठन अपने दृष्टिकोण के अनुरूप कथानक प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहा है। ऐसे समय में भारत का सबसे सशक्त नैरेटिव वही है जो डॉ. हेडगेवार ने दिया था। उन्होंने स्पष्ट कहा था, “भारत हिंदू राष्ट्र था, है और जब तक इस धरती पर हिंदू रक्त की एक भी बूंद है, तब तक यह हिंदू राष्ट्र रहेगा।” यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक अस्मिता का शाश्वत सत्य है, जो संघ की स्थापना से भी सदियों पहले से विद्यमान है।
संघ के अनुसार हिंदू होने का अर्थ किसी विशेष उपासना-पद्धति, वेशभूषा या धार्मिक आचरण से जुड़ा होना नहीं है। हिंदू वह है, जो इस देश को अपना मानता है, इसकी परंपराओं, मूल्यों, संस्कृति, इतिहास और पूर्वजों से अपने को जुड़ा महसूस करता है। जो भारत का हित चाहता है, वही उसका हितैषी है, चाहे उसका पंथ या मजहब कुछ भी हो। यही दृष्टि हिंदुत्व का सार है। संघ की यह अवधारणा राजनीतिक नहीं, बल्कि मूल्याधारित सांस्कृतिक दृष्टिकोण है। राष्ट्र कोई केवल भौगोलिक या प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक चेतना है और यही भारत की पहचान का मूल है। एक सांस्कृतिक राष्ट्र में अनेक राजनीतिक या प्रशासनिक इकाइयां हो सकती हैं, पर उन्हें जोड़ने वाली आधारशक्ति साझा मूल्य और परंपराएं होती हैं।

प्राचीन भारत में चक्रवर्ती सम्राटों की संकल्पना इसी सांस्कृतिक एकता पर आधारित थी। वे शासन नहीं, बल्कि समरसता का विस्तार करते थे। संविधान की भूमिका में भी ‘वी द पीपल ऑफ इंडिया’ लिखकर यही बताया गया है कि राष्ट्र की आधारशिला जनता की सामूहिक चेतना है, न कि केवल राज्यसत्ता। हमारे ऋ षियों ने राष्ट्र की कल्पना भद्र इच्छाओं से की-सर्वजन सुख, कल्याण और एकात्मता की भावना से। इसलिए राष्ट्र की जड़ें आध्यात्मिक मूल्यों में हैं, जो उसे जीवंत और स्थायी बनाए रखती हैं। ऋ षियों की भद्र इच्छाओं-सर्वे सुखिनः संतु और कल्याण की कामना-से राष्ट्र की संकल्पना का उद्भव हुआ। उनके तप से उत्पन्न तेज ही इस राष्ट्र की आत्मा बना। इसलिए भारत का मूल स्वभाव सांस्कृतिक और आध्यात्मिक है।
कौन-सा दृष्टिकोण अपनाना है, यह व्यक्ति का अधिकार है। यदि समाज की दृष्टि बदली है, तो यह संघ का नहीं, बल्कि समाज का जागरण है। जब लोगों ने बाहरी दृष्टि से आगे बढ़कर अपनी अंतर्दृष्टि से देखना शुरू किया, तब उन्हें स्वयं सत्य का बोध हुआ। संघ का उद्देश्य समाज को संगठित करना है, न कि अलग संगठन बने रहना। हमारी इच्छा है कि समाज इतना सशक्त हो जाए कि संघ उसमें विलीन हो सके। जहां तक आरोपों की बात है, लोकतंत्र में हर किसी को अपनी बात रखने का अधिकार है। कुछ लोग संघ के बढ़ते कार्य और समाज में मिल रहे समर्थन को देखकर असहज होते हैं, जिससे उनके मन में विरोध की भावना उत्पन्न होती है। पर संघ किसी के खिलाफ नहीं है। हमारा कार्य सकारात्मक भाव से सबके हित में है। हमारा उद्देश्य सबको जोड़ना है, क्योंकि भारत का परम वैभव तभी संभव है, जब हर व्यक्ति इस भावना से जुड़ जाए।
कई बार चीजें देखने की दृष्टि पर निर्भर करती हैं। जैसे एक शिक्षक ने बच्चों को प्रयोग द्वारा सिखाया कि हर व्यक्ति अपनी सोच के अनुसार परिणाम देखता है। उसी तरह शाखा को लेकर भी अनेक भ्रांतियां हैं। कुछ लोग बिना समझे उसे केवल व्यायाम या शोरगुल मान लेते हैं, जबकि उसके पीछे अनुशासन, सामूहिकता और चरित्र निर्माण की गहरी सोच है। हाल ही में एक प्रसंग में भी ऐसा हुआ, जब संचालन अभ्यास के दौरान घोष की ध्वनि से कोई असहज हुआ, पर असल में वह अभ्यास समाज में एकता और समरसता का प्रतीक था। यह दृष्टि का फर्क ही है जो समझ को सीमित या व्यापक बनाता है।
कुछ लोग शाखा को व्यायामशाला, खेल का मैदान या गायन केंद्र समझते हैं, पर शाखा इन सबसे कहीं अधिक है। यह चरित्र निर्माण का केंद्र है, व्यक्ति निर्माण की प्रक्रिया है। श्री बालासाहब देवरस ने कहा था, “शाखा सज्जनों की सुरक्षा का आश्वासन और समाज में नैतिक बल का प्रतीक है।” शाखा का उद्देश्य वही है, जिसे स्वामी विवेकानंद ने ‘मैन विद कैपिटल एम’ कहा-गुण, साहस, करुणा व जिम्मेदारी से पूर्ण व्यक्ति का निर्माण। शाखा व्यक्ति के भीतर आत्मबल जगाती है, समाज के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती है और राष्ट्रीय चेतना को प्रखर बनाती है। यह ऐसा साधन है जो व्यक्ति के भीतर का दीप जलाता है। उसी प्रकाश से वह अपनी भूमिका, अपने समाज की वास्तविकताएं व अपनी जिम्मेदारियां स्पष्ट रूप से देख पाता है। इसलिए शाखा केवल गतिविधि नहीं, बल्कि आत्मविकास और राष्ट्रनिर्माण का माध्यम है।
संघ का उद्देश्य राष्ट्र के परम वैभव का निर्माण है-जिसमें मन, बुद्धि, बल व समाज सभी का उत्थान शामिल है। इसके मार्ग में आने वाली बाधाओं को दूर करना आवश्यक है, चाहे वह अंधकार हो या अशिक्षा। संघ की कार्यप्रणाली किसी प्रतिक्रिया या विरोध पर आधारित नहीं है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों या कठिन इलाकों में जाना कोई प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि मूल उद्देश्य का विस्तार है। भारत की आत्मा जिन मूल्यों-सहयोग, सामूहिकता और संवेदना से जीवित रही है, उन्हें जाग्रत करना ही संघ का कार्य है। इसलिए चाहे समस्याएं हों या न हों, संघ का दायित्व उन मूल्यों के पुनरुत्थान से राष्ट्र को सशक्त बनाना है।
संघ के प्रारंभिक दौर में प्रचार को महत्व नहीं दिया गया था। स्वयंसेवकों से कहा जाता था कि नाम, पद या प्रसिद्धि की अपेक्षा त्यागकर काम करें, क्योंकि प्रचार अहंकार और दिखावे की भावना ला सकता है। संघ का मानना था कि यदि भारत हमारा घर है, तो घर के कार्य का प्रदर्शन करने की आवश्यकता नहीं होती। पर समय के साथ यह समझ आया कि समाज में सकारात्मक दृष्टि बनाए रखने के लिए सही जानकारी पहुंचाना जरूरी है। जब केवल नकारात्मक बातें ही सामने आती हैं, तो लोगों में निराशा और आलोचनात्मक भाव बढ़ता है। इसलिए संघ ने प्रचार आरंभ किया, लेकिन अपने संगठन का नहीं, स्वयंसेवकों के समाजहित कार्यों का। उद्देश्य यह बताना है कि समाज में अच्छाई और सहयोग की भावना जीवित है। प्रचार संघ का साधन नहीं, सेवा कार्यों के सकारात्मक संदेश को समाज तक पहुंचाने का माध्यम है। यही कारण है कि संघ में कुछ ही लोग बोलते हैं, जबकि अधिकांश स्वयंसेवक अपने कार्य से संदेश देते हैं।
















