G-20 शिखर सम्मेलन : अफ्रीका की धरती से भारत ने दी विश्‍व को नई दिशा
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G-20 शिखर सम्मेलन : अफ्रीका की धरती से भारत ने दी विश्‍व को नई दिशा

जी-20 शिखर सम्मेलन में पीएम मोदी ने समावेशी विकास, अफ्रीका सशक्तीकरण, ड्रग–टेरर नेक्सस, स्वास्थ्य सुरक्षा और पारंपरिक ज्ञान जैसे वैश्विक मुद्दों पर निर्णायक दृष्टि रखी।

Written byडाॅ. मयंक चतुर्वेदीडाॅ. मयंक चतुर्वेदी — edited by Shivam Dixit
Nov 22, 2025, 10:40 pm IST
in भारत, विश्व, विश्लेषण

दक्षिण अफ्रीका के जोहान्सबर्ग में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन विश्‍व की आकांक्षाओं को नई पहचान देने वाला साबित हुआ है। इस मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन मुद्दों को उठाया, वे यह स्पष्ट करते हैं कि इस समय उनकी बड़ी चिंता विश्व–समाज, सुरक्षा और प्रकृति के संरक्षण को लेकर है। उन्होंने उन विषयों पर ध्यान आकृष्ट किया जो आज की मानवता के अस्तित्व और समतामूलक विकास के लिए निर्णायक हैं; जैसे समावेशी विकास, अफ्रीका की क्षमता को उभारना, स्वास्थ्य सुरक्षा, ड्रग-टेरर नेक्सस और पारंपरिक ज्ञान की रक्षा को प्रमुखता में रखना।

भारत के प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन की शुरुआत दक्षिण अफ्रीका को सफल मेजबानी के लिए बधाई देते हुए की और यह उल्लेख किया कि अफ्रीका की नेतृत्वकारी भूमिका विश्व के लिए नई दिशा तय कर सकती है। उन्होंने याद दिलाया कि अब तक वैश्विक विकास के जो पैमाने तय किए गए, उन्होंने संसाधनों के असमान वितरण और प्रकृति के अति-दोहन को बढ़ावा दिया है। अफ्रीकी राष्ट्र इसका सबसे बड़ा शिकार रहे हैं, इसलिए मोदी की चिंता यह है कि विकास की वैश्विक नीति अब भी इंसान और प्रकृति की वास्तविक आवश्यकताओं से कटी हुई है, जिसे कि मुख्‍यधारा में लाना आवश्‍यक है।

मोदी ने कहा कि हमें आर्थिक विकास की उस सोच को बदलना होगा जिसमें प्रकृति और समाज की कीमत पर धन की वृद्धि होती है। उन्होंने भारत के सभ्यागत ज्ञान पर आधारित एकात्म मानववाद को आगे बढ़ाते हुए यह प्रस्ताव रखा कि विकास का आधार मनुष्य, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन होना चाहिए। उनकी यह चिंता सिर्फ आर्थिक ही नहीं दिखी है, यह तो मानवीय और पर्यावरणीय भी है। वस्‍तुत: यह बताता है कि भारत अब किस तरह से दृढ़ता के साथ विकास की वैकल्पिक अवधारणा को वैश्विक मंच पर दृढ़ता से रख रहा है।

सस्टेनेबिलिटी के संदर्भ में मोदी ने उन समुदायों का उल्लेख किया जो आज भी प्रकृति-संतुलित जीवन जीते हैं। उन्होंने इस चिंता को रेखांकित किया कि आधुनिक विकास मॉडल ने पारंपरिक ज्ञान को हाशिये पर धकेल दिया है, जबकि यही ज्ञान भविष्य को सुरक्षित कर सकता है। इसी के समाधान के रूप में भारत ने वैश्विक पारंपरिक ज्ञान भंडार का प्रस्ताव दिया, जो दुनिया की सामूहिक विरासत को संरक्षित कर आगे की पीढ़ियों तक पहुँचाने में मदद करेगा। मोदी की यह चिंता प्रत्यक्ष है कि मानवता की जड़ों को बचाए बिना भविष्य निर्मित नहीं हो सकता।

इसके बाद उन्होंने अपना ध्यान अफ्रीका की युवा शक्ति पर केंद्रित किया। उनकी चिंता यह है कि अफ्रीका की अपार युवा क्षमता संसाधनों की कमी और प्रशिक्षण के अभाव के कारण वैश्विक विकास में पूरी तरह भाग नहीं ले पा रही। इस चिंता को दूर करने हेतु उन्होंने “जी20-अफ्रीका कौशल गुणक पहल” का प्रस्ताव रखा। लक्ष्य यह है कि अगले दस वर्षों में अफ्रीका में 10 लाख प्रमाणित ट्रेनर्स तैयार किए जाएँ, जो आगे करोड़ों युवाओं को कुशल बनाएँगे। इस योजना से उनकी यह दृष्टि स्पष्ट होती है कि विकास तभी स्थायी होगा जब हर क्षेत्र स्वयं सक्षम बने।

स्वास्थ्य सुरक्षा भी मोदी की प्राथमिक चिंताओं में रही। कोविड-19 महामारी ने दुनिया को बताया कि एक वायरस की मार से कोई भी सुरक्षित नहीं। अतः उन्होंने “जी-20 वैश्विक स्वास्थ्य सेवा प्रतिक्रिया टीम”के गठन की बात रखी, जिसमें प्रशिक्षित स्वास्थ्य विशेषज्ञ किसी भी वैश्विक आपातस्थिति में तुरंत सहायता पहुँचा सकें। यह चिंता मानवता की रक्षा और वैश्विक आपदा प्रबंधन को मजबूत करने की दिशा में है। यहां दिखा कि प्रधानमंत्री मोदी की चिंता का एक महत्वपूर्ण आयाम ड्रग-टेरर नेक्सस भी है। उन्होंने चिंता जताई कि फेंटेनिल जैसे घातक नशे न केवल युवा पीढ़ी को तबाह कर रहे हैं, बल्कि आतंकवाद को आर्थिक मदद भी पहुँचा रहे हैं। इसी खतरे को कमजोर करने के लिए भारत ने “ड्रग-आतंकवाद गठजोड़ का मुकाबला करने पर जी-20” पहल का प्रस्ताव रखा। यह स्पष्ट करता है कि भारत वैश्विक सुरक्षा को लेकर गंभीर है और इस अवैध अर्थव्यवस्था को खत्म करना चाहता है, जो सामाजिक स्थिरता और शांति का बड़ा दुश्मन बन चुकी है।

कहना होगा कि अफ्रीका और ग्लोबल साउथ की आवाज़ को मजबूत बनाए रखना भी मोदी की गहरी चिंता के रूप में सामने आया। भारत की अध्यक्षता में अफ्रीकन यूनियन को जी-20 की सदस्यता मिली, यह कूटनीतिक उपलब्धि के साथ ही शक्ति संतुलन को नया स्वरूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। मोदी ने यह जोर देकर कहा कि अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की आवाज़ को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए। उनकी यह चिंता वैश्विक न्याय और सहभागिता को सुनिश्चित करने से जुड़ी है।

कुल मिलाकर यदि हम अपने प्रधानमंत्री मोदी के पूरे संबोधन को समग्र रूप में देखें तो यह स्पष्ट होता है कि वे विकास की असमानताओं को लेकर चिंतित हैं। वे प्रकृति और पारंपरिक ज्ञान की अवहेलना पर गंभीर प्रश्न उठा रहे हैं। वे अफ्रीकी युवाओं के भविष्य और क्षमताओं के दोहन को लेकर सजग हैं। वे वैश्विक स्वास्थ्य संकटों के प्रति संवेदनशील और सावधान हैं। वे ड्रग्स और आतंकवाद के गठजोड़ को मानवता का बड़ा दुश्मन मानते हैं। वे वैश्विक दक्षिण की भागीदारी को नई ऊँचाई देना चाहते हैं। निश्‍चित ही ये सभी चिंताएँ किसी एक राष्ट्र के हित तक सीमित नहीं हो सकती हैं, कहना होगा कि पूरी दुनिया के हित से जुड़ी हैं। यह मोदी की कूटनीतिक सोच का विस्तार भी है और भारत के उभरते वैश्विक नेतृत्व का संकेत भी इसे आप मान सकते हैं।

अत: आज जोहान्सबर्ग में पीएम मोदी का संबोधन बताता है कि भारत अब अपनी बात रखने तक सीमित देश नहीं रहा है, यह उससे बहुत आगे समाधान प्रस्तुत करने वाला राष्ट्र है। उनकी चिंताएँ विश्व व्यवस्था की उन दरारों की ओर इशारा करती हैं, जिन पर समय रहते ध्यान न दिया गया तो भविष्य और कठिन हो सकता है। विकसित और विकासशील देशों के बीच संतुलन, स्वास्थ्य सुरक्षा, पर्यावरणीय संरक्षण, युवा सशक्तीकरण और आतंक मुक्त समाज इन मूलभूत विषयों को उन्होंने वैश्विक प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखा है। आज अफ्रीका की धरती से दिया भारत का यह संदेश आशा का नया मार्ग खोलता है, साथ ही यह भी दिखाता है कि मानवता की भलाई के लिए भारत एक जिम्मेदार नेतृत्व धारण करने को तैयार है।

Topics: Global SouthAfrica EmpowermentDrug Terror NexusHealth SecurityG20 SummitTraditional knowledgeSustainable developmentpm modi speech
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
डाॅ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और हिंदुस्थान समाचार से संबद्ध हैं। [Read more]
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