इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ गुरु तेग बहादुर के प्रतिरोध की मुखर आवाज
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इस्लामिक कट्टरता के खिलाफ गुरु तेग बहादुर के प्रतिरोध की मुखर आवाज

नवें सिख गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी को ‘हिन्द की चादर’ क्यों कहा जाता है? जानिए उनके जीवन, गुरुगद्दी प्राप्ति, मुगलों से संघर्ष और कश्मीरी पंडितों की रक्षा हेतु दिए गए महान बलिदान की पूरी कहानी।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by कुलदीप सिंह
Nov 21, 2025, 11:59 am IST
inविश्लेषण

चादर प्रतीक है सम्मान, चरित्र और रक्षा की। ‘हिन्द की चादर’ कहे जाने वाले सिख पंथ परम्परा के नवें गुरु श्री गुरु तेगबहादुर जी ने अपने जीवन के पुण्य क्रियाकलापों व बलिदान से इस देश व देशवासियों की इन तीनों तरह से रक्षा की। उस समय पूरे देश में मुगलों के खिलाफ विभिन्न विधियों से संघर्ष चल रहे थे। क्षात्रधर्मियों ने धर्मरक्षा के लिए हथियार उठाए तो संत शक्ति धर्मजागरण के माध्यम से इन अत्याचारों का प्रतिशोध कर रहे थे। गुरु तेगबहादुर जी ने ऐसे समय में धर्मजागरण करने के साथ-साथ आत्मबलिदान दे कर भारत के इन दोनों संघर्षों को मुखर वाणी दी।

निजी जीवन

सिखों के नवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी का जन्म बैसाख बदी 5, संवत् 1678 (सन् 1621 ई.) को अमृतसर में हुआ। गुरूजी का जन्म जिस परिवार में हुआ, वह गुरु परंपरा में न केवल विशेष, बल्कि अत्यंत पवित्र और गौरवशाली स्थान रखता है। गुरु हरगोबिन्द साहिब जी की और माता नानकी जी के घर श्री त्यागमल जी का जन्म हुआ, जिन्हें मुगलों से करतारपुर के युद्ध में अद्वितीय युद्ध कौशल के प्रदर्शन के बाद तेग बहादुर नाम दिया गया। गुरु हरकिशन जी के स्वर्गवास पश्चात बकाला ग्राम में गुरु परंपरा में नौवें गुरु तेग बहादुर जी बने। गुरु तेग बहादुर जी का विवाह माता गुजरी जी से हुआ। उनके पुत्र गोबिन्द राय जी जो बाद में गुरु गोबिन्द सिंह जी के नाम से सिख धर्म के दसवें गुरु हुए।

गुरुगद्दी की प्राप्ति

श्री गुरु हरकिशन जी ने चैत्र सुदी चौदस, वैशाख 3, संवत् 1721 (सन् 1664 ईस्वी)को दिल्ली में ज्योति जोत (देहत्याग) के समय कहा कि सिखों का अगला गुरु बाबा बकाला में मिलेगा। गुरु तेगबहादुर जी अपनी माता नानकी जी के साथ अपने ननिहाल गांव ‘बकाला’ में रहते थे। एक गुजराती व्यापारी भाई मक्खन शाह का जहाज समुंद्र में फंस गया था उस समय भाई जी ने गुरू का ध्यान कर दसवंद अर्पित करने की अरदास की। जिसके बाद उनका जहाज किनारे लग गया। जब वह कमाई का दसवंद (दसवां हिस्सा) लेकर दिल्ली पहुंचे तो उन्हें पता चला कि अष्टम गुरू ज्योति-ज्योत समा गए हैं, और नवम् नानक गांव बकाला में प्रकट होंगे। ऐसे में वह बकाले गांव पहुंचे जहां पहले ही 22 मंजियों (मंचों) के साथ कुछ लोभी लोग खुद को गुरु बता रहे थे। भाई जी ने गुरू का नाम लेकर सभी के आगे दो-दो सोने के सिक्के रखे, लेकिन जैसे ही उन्होंने श्री गुरू तेग बहादुर जी के आगे दो सोने के सिक्के रखे तो गुरू जी बोले, ‘भाई जी! आपने तो दसवंद देने की बात कही थी।’ इतना सुनते ही भाई जी की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। खुशी से झूमते हुए जोर-जोर से गाने लगे। ‘गुरु लाधो रे, गुरु लाधो रे’ यानी सच्चा गुरु मिल गया है। इसके बाद सभी ने गुरूजी के दर्शन किए और उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया।

मुगलों से संघर्ष

गुरु तेग बहादुर जी के जन्म से लगभग पंद्रह वर्ष पूर्व, उनके पितामह गुरु अर्जुन देव जी को मुगल बादशाह जहाँगीर ने मृत्युदंड दिया। यह सिख गुरु परंपरा में प्रथम बलिदान माना जाता है। जहाँगीर को यह बात अस्वीकार्य लगी कि गुरु अर्जुन देव जी ने उसके विद्रोही पुत्र खुसरो को शरण और आशीर्वाद दिया। इसके अतिरिक्त, गुरु जी का तेजी से बढ़ता प्रभाव और जनसमर्थन भी उसे खटकने लगा था। जहाँगीर ने गुरु अर्जुन देव जी पर भारी जुर्माना लगाया और उनसे उनके पवित्र ग्रंथ (आदि ग्रंथ) में संशोधन करने की मांग की, परंतु गुरु जी ने इसे अस्वीकार कर दिया। फलस्वरूप, उन्हें लाहौर किले में बंद कर यातनाएँ दी गईं और 1606 ईसवी में उन्होंने धर्म और सत्य की रक्षा हेतु बलिदान स्वीकार किया। इसी तरह उनके पिता श्री गुरु हरिगोबिन्द साहिब को कुछ समय तक जहांगीर द्वारा ग्वालियर के किले में बंदी बना दिया गया था। ग्वालियर किले से जहांगीर के कारावास से मुक्त होते समय 52 राजाओं-युवराजों की भी मुक्ति इन्होंने करवाई जिसके बाद गुरु परंपरा में दिवाली का उत्सव ‘बंदी छोड़ दिहाड़ा’ के नाम से प्रख्यात हुआ।

शाहजहां के शासनकाल में श्री गुरु हरिगोबिंद जी को मुगलों से कई बार युद्ध करना पड़ा था। शाही सेनाओं ने मुखलिस खान के नेतृत्व में सन् 1628 में अमृतसर पर आक्रमण किया था। उस समय तेग बहादुर जी की आयु मात्र सात वर्ष की थी। करतारपुर में जब पैदेखान और कालेखान ने गुरु हरिगोबिंद पर आक्रमण किया तो उस समय तेग बहादुर जी की आयु चौदह वर्ष की थी।

गुरु हर राय जी के समय में औरंगजेब ने मुगल सल्तनत की गद्दी हड़प ली। उन्होंने अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बनाकर सन् 1658 ईस्वी में शासन संभाला। गुरु हर राय जी ने कभी भी मुगलों की अधीनता को स्वीकार नहीं किया। औरंगजेब द्वारा जब उन्हें दरबार में बुलाने का आदेश भेजा गया, तो गुरु हर राय जी ने उस आदेश को अस्वीकार कर दिया।

गुरु जी के समय संघर्षशील भारत

जिस समय पंजाब में सिख धर्म परम्परा सशक्त हो रही थी उन दिनों देश में मुगलों के अत्याचार चरम पर थे। इसके खिलाफ देश के विभिन्न हिस्सों में सशस्त्र संघर्ष जारी थे। वो इस प्रकार हैं-

1. दक्षिण भारत में छत्रपति शिवाजी महाराज के नेतृत्व में मराठा शक्ति संगठित होकर मुगल सेनाओं से टक्कर ले रही थी।

2. मथुरा के जमींदार गोकुल जाट के नेतृत्व में उस प्रदेश के जाटों ने 1669 में मुगलों के फौजदार और उसके सिपाहियों को मार डाला था, जिन्होंने मथुरा के मंदिरों को तोड़ा था।

3. साल 1672 में बुंदेलखंड के बुंदेलों ने छत्रसाल के नेतृत्व में मुगल सल्तनत से टक्कर लेनी शुरू कर दी थी।

4. साल 1672 में ही दिल्ली के निकट नारनौल के सतनामी सम्प्रदाय के अनुयायियों ने मुगल शासन के विरुद्ध इतना बड़ा विद्रोह किया कि उनके अद्भुत साहस को देखकर मुगल सैनिक उनमें दैवी शक्तियों का संदेह करने लगे और स्वयं औरंगजेब को, जो मुसलमानों का जिंदा पीर समझा जाता था। अपने हाथों से दुआएं और आयतें लिखकर शाही झंडों में टांकनी पड़ी थीं।

Topics: Islamic fanaticismSikh historyसिख इतिहासमुगलों की क्रूरताCruelty of Mughalsहिन्द की चादरगुरु तेग बहादुर बलिदानChadar of Indiaगुरु तेग बहादुरGuru Teg Bahadur SacrificeGuru Teg Bahadurइस्लामिक कट्टरता
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