'संघ की प्रचारक परंपरा को आत्मसात करें स्वयंसेवक'
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‘संघ की प्रचारक परंपरा को आत्मसात करें स्वयंसेवक’

जयपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने '... और यह जीवन समर्पित' पुस्तक का लोकार्पण

Written byPanchjanyaPanchjanya
Nov 21, 2025, 11:06 am IST
inराजस्थान
पुस्तक का लोकार्पण करते हुए श्री मोहनराव भागवत। साथ में हैं (बाएं से) श्री भगीरथ चौधरी, डॉ. मुरलीधर शर्मा, डॉ. रमेश अग्रवाल और श्री ब्रजमोहन रामदेव

पुस्तक का लोकार्पण करते हुए श्री मोहनराव भागवत। साथ में हैं (बाएं से) श्री भगीरथ चौधरी, डॉ. मुरलीधर शर्मा, डॉ. रमेश अग्रवाल और श्री ब्रजमोहन रामदेव

गत 16 नवंबर को जयपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने ‘… और यह जीवन समर्पित’ पुस्तक का लोकार्पण किया। ज्ञान गंगा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक राजस्थान के दिवंगत 24 प्रचारकों की जीवन-गाथाओं का संकलन है।

इस अवसर पर श्री भागवत ने कहा कि मानसिकता से हर स्वयंसेवक प्रचारक ही हो जाता है। संघ की यही जीवन शक्ति है। संघ यानी हम स्वयंसेवक हैं। संघ यानी स्वयंसेवकों का जीवन और उनका भाव-बल है। आज संघ बढ़ गया है। कार्य की दृष्टि से अनुकूलताएं और सुविधाएं भी बढ़ी हैं, परंतु इसमें बहुत सारे नुकसान भी हैं। हमें वैसा ही रहना है जैसा हम विरोध और उपेक्षा के समय थे, उसी भाव-बल से संघ आगे बढ़ेगा।

उन्होंने कहा कि संघ को समझने के लिए प्रत्यक्ष अनुभूति की आवश्यकता होती है, जो संघ में प्रत्यक्ष आने के बाद ही प्राप्त हो सकती है। कई लोगों ने संघ की स्पर्धा में संघ जैसी शाखाएं चलाने का उपक्रम किया। लेकिन पंद्रह दिन से ज्यादा किसी की शाखा नहीं चली। हमारी 100 साल से चल रही है और बढ़ भी रही है, क्योंकि संघ स्वंयसेवकों के भाव-बल और जीवन-बल पर चलता है।

उन्होंने कहा कि आज संघ का काम चर्चा और समाज के स्नेह का विषय बना हुआ है। संघ के स्वयंसेवकों और प्रचारकों ने क्या-क्या किया है, इसके डंके बज रहे हैं। 100 साल पहले कौन कल्पना कर सकता था कि ऐसे ही शाखा चलाकर राष्ट्र का कुछ भला होने वाला है? लोग तो कहते ही थे कि हवा में डंडे घुमा रहे हैं, ये क्या राष्ट्र की सुरक्षा करेंगे? लेकिन आज संघ शताब्दी वर्ष मना रहा है और समाज में संघ की स्वीकार्यता बढ़ी है।

उन्होंने कहा कि यह पुस्तक केवल गौरव की भावना नहीं जगाती, बल्कि कठिन रास्ते पर चलने की प्रेरणा भी देती है। उन्होंने स्वयंसेवकों का आह्वान किया कि वे इस परंपरा को न केवल पढ़ें, बल्कि अपने जीवन में भी उतारें। यदि उनके तेज का एक कण भी हमने अपने जीवन में धारण कर लिया, तो हम भी समाज और राष्ट्र को आलोकित कर सकते हैं।

कार्यक्रम के आरंभ में पुस्तक का परिचय और प्रस्तावना पुस्तक के संपादक भगीरथ चौधरी ने रखी। आभार ज्ञान गंगा प्रकाशन समिति के अध्यक्ष डॉ. मुरलीधर शर्मा ने प्रकट किया। समिति के उपाध्यक्ष जगदीश नारायण शर्मा ने सरसंघचालक श्री भागवत का अंगवस्त्र और स्मृति चिन्ह देकर स्वागत किया।

Topics: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघसरसंघचालकमोहनराव भागवतसमाज और राष्ट्रज्ञान गंगा प्रकाशन
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