जैवलिन मिसाइल को अमेरिकी कंपनियां लॉकहीड मार्टिन और RTX (पहले रेथियन) ने मिलकर बनाया है। ये एक पोर्टेबल, कंधे पर लादकर चलने वाली एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल है। भारत के पास पहले से कुछ जैवलिन मिसाइल्स हैं, लेकिन ये नई डील स्टॉक बढ़ाने और रिजनल बैलेंस बनाए रखने के लिए है। बहरहाल, अब इसे अमेरिकी कांग्रेस के पास 30 दिनों के लिए भेजा गया है, अगर कोई आपत्ति न आई तो डील फाइनल हो जाएगी। ऊपर से, भारत इसमें को-प्रोडक्शन की प्लानिंग भी कर रहा है, मतलब भविष्य में खुद बनाएंगे।
डील में क्या-क्या है: डिटेल्स एक नजर में
ये डील सिर्फ मिसाइल्स तक सीमित नहीं। इसमें शामिल हैं:
- 100 जैवलिन मिसाइल्स (FGM-148 मॉडल)।
- 25 लाइटवेट कमांड लॉन्च यूनिट्स।
- ट्रेनिंग के लिए एक सिमुलेटर और एक टेस्ट मिसाइल।
- स्पेयर पार्ट्स, मेंटेनेंस सपोर्ट और ट्रेनिंग प्रोग्राम।
- एक्स्ट्रा 216 एक्सकैलिबर शेल्स, जो GPS से गाइडेड हैं और आर्टिलरी के लिए सटीक टारगेटिंग देते हैं।
जैवलिन की विशेषता
जैवलिन को ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ कहते हैं, यानी सिपाही मिसाइल छोड़कर तुरंत छिप सकता है – ये खुद-ब-खुद टारगेट ढूंढ लेती है। इसका टॉप-अटैक मोड सबसे खतरनाक है, जो टैंक की ऊपरी सतह पर हमला करता है, जहां आर्मर कमजोर होता है। एक ही हिट में टैंक को नेस्तनाबूद। रेंज करीब 4 किलोमीटर, नई वैरिएंट्स और ज्यादा। वजन सिर्फ 22 किलो, तो पहाड़ों में सैनिक आसानी से कैरी कर सकेंगे। ये बंकर, हेलीकॉप्टर या सीधे हमले के लिए भी इस्तेमाल की जा सकती है। लद्दाख जैसे हाई-एल्टीट्यूड एरिया में ये इन्फैंट्री को बिना डर के दुश्मन के आर्मर्ड व्हीकल्स से लड़ने की ताकत देगी।
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यूक्रेन में कमाल: रूसी टैंकों का काल
2022 से यूक्रेन को अमेरिका ने हजारों जेवलिन मिसाइल्स दीं। यूक्रेनी सैनिकों ने इन मिसाइलों से सैकड़ों रूसी टैंक उड़ा दिए, खासकर T-72 और T-90 मॉडल्स के। रूस की डिफेंस सिस्टम्स इनके टॉप-अटैक से हिल गईं। दुनिया भर में इसे ‘टैंक किलर’ का खिताब मिला। वॉर जोन में इसकी परफॉर्मेंस ने साबित कर दिया कि ये मॉडर्न वॉरफेयर में कितनी घातक है। भारत के लिए ये एक रियल-वर्ल्ड टेस्टेड वेपन है।














