भारत में 300 से अधिक जनजातियां हैं; भील, गोंड, मुंडा, उरांव, सहरिया, बैगा, कोरकू, संथाल, मीणा, बंजारा, खारिया, भूमिया, और कई अन्य, जिन्होंने सदियों से प्रकृति धर्म को जीवित रखा है। ये जनजातियाँ वृक्षों, नदियों, पर्वतों, पशुओं और पंचमहाभूतों की आराधना करती हैं। किंतु यही प्रकृति एवं देव धर्म संकट में है। इस संकट के पीछे सबसे बड़ा कारण है ईसाई मिशनरियों द्वारा जनजातियों के बीच बढ़ता हुआ मतांतरण (कन्वर्जन) अभियान। शिक्षा, स्वास्थ्य और सहायता के नाम पर मतांतरण की यह प्रक्रिया अब सांस्कृतिक विनाश का उपकरण बनती जा रही है। ऐसे में स्वाभाविक है कि भगवान बिरसा मुंडा के संघर्ष की याद आ जाना, जिन्होंने प्रतिरोध का रास्ता चुना, किंतु अपनी परंपराएं छोड़ना नहीं स्वीकारा।
देश आज उनका 150वीं जयंती समारोह ‘जनजातीय गौरव वर्ष’ एवं ‘दिवस’ के रूप में मना रहा है। इस अवसर पर देश भर में विभिन्न सांस्कृतिक, शैक्षिक और जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, किंतु जो उनकी सबसे बड़ी सीख समझ आती है, वह यही है कि हमें अपनी जड़ों से जुड़ा रहना है। परंपराएं ही हमारी पहचान और अस्तित्व का कारण हैं। भगवान बिरसा मुंडा एक ऐसी जनजाति से थे जो प्रकृति पूजा, धरती, जल और सूर्य के प्रति गहरी श्रद्धा रखती है, पर जब ब्रिटिश शासन झारखंड में आया, तब उसके साथ ही ईसाई मिशनरी भी यहां पहुंची। उन्होंने जनजातियों के बीच सभ्यता और धर्म सुधार के नाम पर अपना प्रचार शुरू किया। गरीब और अशिक्षित जनजातियों को स्कूल, अस्पताल और आर्थिक सहायता का लालच देकर वे ईसाई बनाने लगे।
किसी चर्च या मिशनरी की जरूरत नहीं
भगवान बिरसा ने देखा कि उनके अपने लोग स्वयं के देवी-देवताओं को छोड़कर मिशनरियों के मायाजाल में फंस रहे हैं। उन्होंने इसका विरोध करते हुए अपने आंदोलन “उलगुलान” की शुरुआत की। बिरसा ने कहा था, “ब्रिटिश अधिकारी और मिशनरी की टोपी एक ही है।” उनका विश्वास था कि दोनों का लक्ष्य एक ही है कि भारत की जनजातियों को उनकी जड़ों से काट देना। उन्होंने अपने लोगों को बताया कि “हमारा भगवान हमारे खेतों, जंगलों, नदियों और पर्वतों में बसता है। हमें उसे किसी चर्च या मिशनरी से खोजने की जरूरत नहीं।” भगवान बिरसा का यही संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 19वीं सदी में था।
मतान्तरण के आंकड़े क्या कहते हैं
भगवान बिरसा मुंडा की भूमि झारखंड में ही ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां सबसे पहले शुरू हुई थीं। ब्रिटिश काल में रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, चाईबासा, लोहरदगा जैसे जिलों में मिशनरियों ने ‘सेवा’ के नाम पर स्कूल और अस्पताल खोले और मतांतरण का खेल शुरू कर दिया। आज झारखंड की लगभग 25 प्रतिशत जनसंख्या ईसाई बताई जाती है। झारखंड की मुंडा, उरांव, हो, खड़िया और संताल जनजातियां इस मिशनरी प्रभाव की सबसे बड़ी शिकार बनी हैं। राज्य सरकार के पास ऐसे सैकड़ों मामले लंबित हैं।
मध्य प्रदेश में 30 जिले प्रभावित
मध्य प्रदेश में कन्वर्जन सबसे गंभीर रूप में सामने आया है। कैथोलिक चर्च और प्रोटेस्टेंट मिशनरियों की रिपोर्ट के अनुसार, राज्य के 52 में से लगभग 30 जिले ऐसे हैं जहाँ व्यापक मतांतरण हुआ है। झाबुआ में लगभग 46,000, मंडला में 18,000, धार में 3,000, बुरहानपुर में 1,800, रतलाम में 5,400, डिंडोरी में 5,900, और बालाघाट में 7,000 से अधिक लोग हाल ही के दिनों में ईसाई बनाए गए हैं। इनमें मुख्य रूप से भील, गोंड, बैगा, सहरिया, मीणा, और उरांव जनजातियां शामिल हैं। असल में ये वे आंकड़े हैं जो मान चुके हैं कि वे ईसाई हैं। इससे दोगुने लोग ऐसे हैं जो धर्म (रिलीजन) बदल चुके हैं, लेकिन पहचान छिपा रहे हैं ताकि आरक्षण के लाभ भी लेते रहें।
छत्तीसगढ़ में फैला जाल
छत्तीसगढ़ में भी कन्वर्जन का जाल तेजी से फैला है। विशेषकर बस्तर, कांकेर, रायगढ़, जशपुर और सरगुजा जैसे जिलों में मिशनरी गतिविधियाँ बहुत सक्रिय हैं। सरकारी और सामाजिक रिपोर्टों के अनुसार, पिछले एक दशक में यहाँ 2 लाख से अधिक लोगों ने ईसाई धर्म अपनाया है। जशपुर जिला तो अब “मिनी क्रिश्चियन बेल्ट” कहा जाने लगा है। यहाँ की उरांव जनजाति बड़ी संख्या में ईसाई बन चुकी है। कई गाँवों में पारंपरिक देवी-देवताओं की पूजा पूरी तरह से बंद हो गई है और रविवार की प्रार्थना चर्च में अनिवार्य मानी जाती है।
ओडिशा भी निशाने पर
ओडिशा की जनजातियां कंध, सांबर, गोंड, भुइयाँ, पारजा भी लंबे समय से मिशनरी गतिविधियों के निशाने पर रही हैं। कंधमाल, रायकल, कालाहांडी, मलकानगिरी और सुंदरगढ़ जैसे जिलों में बड़े पैमाने पर धर्मांतरण हुआ है। 2008 में कंधमाल जिले में हुए दंगों की जड़ भी यही थी, जब हजारों हिंदू आदिवासी ईसाई बनाए जा रहे थे और स्थानीय समाज में तनाव बढ़ा। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, आज ओडिशा की लगभग सात लाख जनजातियाँ ईसाई रूप में मतान्तरित की जा चुकी हैं।
महाराष्ट्र और गुजरात में भील जनजाति निशाने पर
विदर्भ और गोंडवाना क्षेत्र, जहां गोंड, कोरकू और भील जनजातियां रहती हैं, अब मिशनरी गतिविधियों का नया केंद्र बन चुके हैं। अमरावती, यवतमाल, गडचिरोली और चंद्रपुर जिलों में ईसाई मिशनरी “सेवा” के नाम पर गाँव-गाँव घूम रहे हैं। अमरावती के मेलघाट क्षेत्र में गोंड और कोरकू जनजातियों में 25,000 से अधिक लोगों का धर्मांतरण हो चुका है। गडचिरोली में चर्च की संख्या पिछले 15 वर्षों में दोगुनी हो गई है।
गुजरात के डांग, नवसारी, तापी, भरूच और वलसाड जिलों की भील और डांग जनजातियाँ ईसाई मिशनरियों के प्रभाव में आ चुकी हैं। डांग जिला तो “भारत का छोटा ईसाई राज्य” कहा जाने लगा है, जहाँ लगभग 70 प्रतिशत जनजातीय आबादी ईसाई बन चुकी है। हर वर्ष क्रिसमस से पहले वहाँ विदेशी मिशनरी “विशेष कैंप” आयोजित करते हैं, जहाँ सामूहिक धर्मांतरण (मतान्तरण) होता है।
भारत का दक्षिण क्षेत्र, बढ़ गए लाखों ईसाई
तमिलनाडु भारत का वह राज्य है जहां 16वीं शताब्दी से ईसाई मिशनरी सक्रिय रही हैं। राज्य की लगभग 6–7 प्रतिशत जनसंख्या (45–50 लाख) ईसाई है। मदुरै, नागपट्टिनम, रामनाथपुरम, कन्याकुमारी, तिरुनेलवेली, तूतुकुड़ी प्रमुख प्रभावित जिले हैं। कन्याकुमारी में पिछले दशक में 30,000 से अधिक दलित और आदिवासी परिवार धर्मांतरित हुए। मछुआरा समुदाय को “समुद्र के ईश्वर यीशु” की कथा सुनाकर धर्म बदलवाना मिशनरियों का सामान्य तरीका बन चुका है।
केरल बना गढ़
तमिलनाडु की तरह ही केरल में कन्वर्जन के लिए अथक प्रयास किए जाते रहे, इसलिए ये भारत में ईसाई मत का ऐतिहासिक गढ़ कहलाता है। आज केरल में ईसाई आबादी 18–20 प्रतिशत (55 लाख से अधिक) है। कोट्टायम, इडुक्की, पथानामथिट्टा, एर्नाकुलम और त्रिशूर प्रमुख केंद्र हैं। यहाँ मुथुवन, कुरिच्चा, इरुला और पनिया जनजातियों में बड़ा धर्मांतरण हुआ है। इडुक्की और वायनाड में लगभग 30 प्रतिशत जनजाति परिवार ईसाई बन चुके हैं।
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का हाल
भारत के दक्षिणी राज्य आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में पिछले तीन दशकों में सबसे तेज वृद्धि ईसाई कन्वर्जन में देखी गई है। जिसमें कि आज आंध्र प्रदेश की 8–9 प्रतिशत जनसंख्या करीब करीब 70 लाख लोग ईसाई है; गुंटूर, कृष्णा, गोदावरी, विशाखापट्टनम, चित्तूर और कडप्पा मुख्य क्षेत्र हैं। “गुड न्यूज इंडिया”, “जायन मिनिस्ट्री”, “गॉस्पेल फॉर एशिया” जैसे संगठन यहाँ “चमत्कारी इलाज”, आर्थिक सहायता और शिक्षा के नाम पर धर्मांतरण कर रहे हैं।
तेलंगाना में लांबाडी (बंजारा) समाज मुख्य लक्ष्य के रूप में चिन्हित किया गया, जिसके फलस्वरूप तेलंगाना की चार से पांच प्रतिशत जनसंख्या आबादी ईसाई हो चुकी है। हैदराबाद, नलगोंडा, खम्मम और महबूबनगर में “फेथ हीलिंग” और “दिव्य चमत्कार” कैम्प आयोजित किए जा रहे हैं। हालांकि दक्षिण भारत में सबसे तीखा विरोध आज भी कहीं इस कन्वर्जन का हो रहा है तो वह कर्नाटक राज्य है। वर्तमान में राज्य की लगभग 3–4 प्रतिशत आबादी (30 लाख) ईसाई है। मंगलुरु, उडुपी, चिकमगलूर, कोडागु और बेलगावी प्रमुख केंद्र हैं। चिकमगलूर के 150 गाँवों में सक्रिय मिशनरी गतिविधियों पर सामाजिक संगठनों ने रिपोर्ट दी है।
पूर्वोत्तर भारत: सबसे गंभीर स्थिति
यहां सबसे बड़ी बात और चिंता ये है कि कन्वर्जन या मतान्तरण सिर्फ एक प्रक्रिया नहीं है, यह स्वयं को भारत से काटलेना जैसा है। जब एक व्यक्ति भारत के देव, दर्शन एवं प्रकृति पूजन के प्रति आस्थावान नहीं रहता तो उसके आस्था केंद्र कहीं विदेश में हो जाते हैं, जैसे वैटिकन सिटी, मक्का मदीना आदि इसलिए भी भारत का भारत बने रहने के लिए जरूरी है कि भारत की अधिकांश जनसंख्या सभ्यतामूलक विमर्शों और सत्य के लिए भारत के मूल यानी उसकी धरती से जुड़ा रहे।
पूर्वोत्तर भारत की स्थिति इस नजरिए से कितनी संकटग्रस्त हो चुकी है। यह आंकड़ा वास्तव में चौंकाता है, नागालैंड– 87.93%, एक अन्य आंकड़ों एवं रिपोर्ट के अनुसार नागालैंड में अनुसूचित जनजाति लगभग 98% तक ईसाई है। मिजोरम– 87.16%, मेघालय– 74.59%, मणिपुर – 41.29% ईसाई हो चुके हें। देखने में आया है कि यहाँ जनजातीय परंपराएँ तीसरी-चौथी पीढ़ी से लगभग समाप्त हो चुकी हैं।पारंपरिक धर्म, माता–पिता पूजा, प्रकृति पूजा जैसे तत्व अब गौण हो गए हैं। आज देश का कोई राज्य नहीं जहां ईसाई कन्वर्जन नहीं हो रहा है, पंजाब के हालात भी भयंकर खराब हैं। यह स्थिति भारतीय जनजातीय संस्कृति के लिए गंभीर चेतावनी है। झाबुआ, जशपुर और डांग जैसे इलाकों में मिशनरियाँ “भूत भगाने”, “बीमारियों को ठीक करने” और “चमत्कार दिखाने” के दावे करती हैं। यह भावनात्मक और मानसिक ब्रेनवॉशिंग की प्रक्रिया है।
समाप्त हो रही जनजाति संस्कृति
मतांतरण का सबसे बड़ा नुकसान जनजातीय संस्कृति को हुआ है। भगौरिया, राई, मटकी, करमा, बधाईं, गणगौर जैसे लोकनृत्य अब विलुप्ति की कगार पर हैं। कई गांवों में अब करमा पर्व नहीं मनाया जाता, क्योंकि चर्च इसे “पैगन” कहकर निषिद्ध करता है। गाय, जो आदिवासी संस्कृति में माँ समान पूजनीय थी, अब उसका मांस खाना सामान्य कहा जाने लगा है। यह वही “संस्कृति विनाश” है, जिसकी चेतावनी भगवान बिरसा मुंडा ने बहुत पहले दी थी।
कानून बने, क्रियान्वयन कमजोर
कई राज्यों ने मतांतरण रोकने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम बनाए हैं, जिनमें छल, लालच या जबरन धर्मांतरण पर 10 वर्ष तक की सजा का प्रावधान है, परंतु जमीनी हकीकत यह है कि इन कानूनों का पालन कमजोर है। विदेशी फंडिंग आज भी जारी है, और चर्च विभिन्न “एनजीओ नेटवर्क” के जरिए अपना काम सहजता से चला रहा है। आज जब कन्वर्जन की लहर फिर से जनजातियों की पहचान मिटाने पर तुली है, तब भगवान बिरसा मुंडा की चेतना को पुनर्जीवित करना अत्यंत आवश्यक हो गया है। उन्होंने कहा था, “अपनी धरती, अपनी संस्कृति और अपने देवताओं को बचाओ, यही सच्चा धर्म है।” इसलिए भगवान बिरसा मुंडा को सिर्फ स्मरण करने भर से काम नहीं चलेगा ; हमें वही करना होगा जो उन्होंने किया; अपनी परंपराओं की रक्षा, अपनी जड़ों से जुड़ाव, और सांस्कृतिक अस्तित्व के लिए संघर्ष।
भारत की जनजातीय पहचान पर उभरता संकट
भारत की 300 से अधिक जनजातियां अपनी समृद्ध परंपरा, सामाजिक संरचना और प्रकृति आधारित जीवनशैली के कारण विश्व में अलग पहचान रखती हैं। गोंड, भील, मुंडा, कोरकू, बैगा, सहरिया, मीणा, संथाल सभी ने सदियों तक बाहरी हस्तक्षेपों के विरुद्ध संघर्ष किया है। आज उनका सबसे बड़ा संकट धर्मांतरण (मतान्तरण) के रूप में सामने है। उनकी संस्कृति, उनके पर्व, उनके देवस्थल, उनकी भाषा, उनका संगीत सब कुछ खतरे में है।
बिरसा मुंडा की चेतावनी आज भी प्रासंगिक
भगवान बिरसा मुंडा ने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि सांस्कृतिक अस्तित्व की रक्षा ही जनजातीय समाज का सबसे बड़ा संघर्ष है। अत: आज आवश्यकता है कि अपनी संस्कृति को पुनर्जीवित करने की, जनजातियों में जागरूकता लाने की, मतान्तरण के छल को समझने की, कानूनों का सख्ती से पालन कराने की। कहना होगा कि भगवान बिरसा मुंडा को केवल याद मत कीजिए; उनकी तरह खड़े होइए, अपनी संस्कृति की रक्षा कीजिए। तभी बचेगा भारत, तभी बचेगा प्रकृति धर्म।
















