राजनीति में लहर क्या होती है, वह 14 नवंबर को बिहार विधानसभा चुनाव के परिणामों में देखने को मिला। मतदाताओं ने राष्ट्रीय जनतात्रिक गठबंधन (राजग) को ऐसी जीत दी कि बड़े—बड़े चुनावी विश्लेषक दंग रह गए। राजग में भाजपा, जदयू, चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) और जीतनराम माझी के नेतृत्व वाली ‘हम’ पार्टी शामिल है। 243 सीट वाली बिहार विधानसभा में राजग को 202 सीट पर जीत मिली। 89 सीटों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी, तो जदयू 85 सीटों के साथ दूसरी सबसे बड़ी पार्टी रही। लोजपा (रामविलास) ने 19 सीटों पर जीत दर्ज कर कांग्रेस और राजद जैसे स्थापित दलों को भी आईना दिखा दिया है।

टूटा राजद का भ्रम
राजद, कांग्रेस, विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) और वामपंथी दलों से बने महागठबंधन को मतदाताओं ने पूरी तरह से खारिज कर दिया। महागठबंधन की हालत यह है कि खुद इसके नेता तेजस्वी यादव किसी तरह चुनाव जीत पाए। तेजस्वी के बड़े भाई तेजप्रताप यादव, जिन्होंने नई पार्टी बनाई है, भी चुनाव हार गए। तेजस्वी यादव की कुछ गलतियों ने उन्हें इस हालत में पहुंचाया। मुसलमान वोट के लिए उन्होंने चुनावी मंच से ‘शहाबुद्दीन जिंदाबाद’ के नारे लगवाए। यही नहीं उन्होंने शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब को टिकट तक दे दिया और वे जीत भी गए। यह वही शहाबुद्दीन है, जिसे जंगलराज का प्रतीक माना जाता था। इस कारण आम लोगों में यह संदेश गया कि राजग के जीतने से फिर से एक बार जंगलराज वापस हो सकता है। तेजस्वी की दूसरी गलती यह रही कि वे अपने नेताओं को नियंत्रण में नहीं रख पाए। राजद के कई नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मां के साथ ही प्रधानमंत्री के लिए भी अपशब्द कहे।
तीसरी गलती यह रही कि उन्होंने अपने बड़े भाई तेजप्रताप यादव को परिवार के साथ ही पार्टी से भी निकलवाया। विरोधी दलों के नेताओं ने इसे मुद्दा बनाया और कहा कि जो तेजस्वी अपने बड़े भाई के नहीं हुए, वे आम लोगों का हित कैसे कर सकते हैं। तेजस्वी की चौथी गलती यह रही कि वे खुद कई बार अहंकार में दिखे। उन्होंने यह दिखाने का प्रयास किया कि वही बिहार के असली ‘वारिस’ हैं, बाकी तो बाहरी हैं।
उन्होंने नारा भी दिया—’एक बिहारी, सब पर भारी।’ इस नारे के जरिए वे प्रधानमंत्री के साथ ही भाजपा के उन नेताओं को बाहरी बताने का प्रयास किया, जो अलग—अलग राज्यों से चुनाव प्रचार के लिए बिहार गए। तेजस्वी शायद धरातल की ओर नहीं देख पा रहे थे। उन्होेंने उन प्रधानमंत्री को ‘बाहरी’ सिद्ध करने की कोशिश की, जिन्होंने अपने कार्यों से गांव—गांव में अपनी पैठ बना ली है, खासकर महिलाओं के बीच। ऐसी महिलाओं ने खुलकर राजग का समर्थन किया। उनकी पांचवीं गलती यह रही कि तेजस्वी यह मान कर चल रहे थे कि यादव और मुसलमान उनके साथ हैं। उनका यह भ्रम टूट गया।
नहीं चला एम-वाई समीकरण
यादव और मुस्लिम—बहुल सीटों में भी महागठबंधन की बुरी तरह हार हुई। दानापुर यादव—बहुल सीट है। यहां भाजपा के रामकृपाल यादव ने राजद के रीतलाल राय को हराया। रातलाल अभी जेल में हैं। उनका चुनाव प्रचार स्वास्थ्य के आधार पर जमानत लेकर जेल से बाहर रहने वाले लालू यादव ने खुद किया था, लेकिन लालू की भावनात्मक अपील भी काम नहीं आई। राजद से यादवों को दूर करने के लिए भाजपा ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को प्रचार में उतारा। इसका असर भी दिखा। मुसलमानों ने भी राजद का साथ छोड़ दिया है। पिछली बार की तरह इस बार भी सीमांचल के मुसलमानों ने ओवैसी की पार्टी एएमआईएम के साथ जाना पसंद किया। कोचाधामन, बहादुरगंज, अमौर और बायसी जैसी मुस्लिम—बहुल सीटों पर एएमआईएम को जीत मिली।

सिमटी कांग्रेस
इस चुनाव में सबसे बुरा हाल तो कांग्रेस का हुआ। कांग्रेस को किशनगंज और फारबिसगंज सीट पर जीत मिली। चुनाव से लगभग दो महीने पहले राहुल गांधी ने वोट अधिकार यात्रा निकाल कर हवा बनाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी स्तरहीन बयानबाजी उन्हें ले डूबी। रही—सही कसर चुनाव के दौरान राहुल गांधी की अनुपस्थिति ने पूरी कर दी। जब चुनाव प्रक्रिया चल रही थी, तब राहुल विदेश में घूम रहे थे। वहां से लौटकर कुछ जगहों पर रैलियां कीं, लेकिन वही घिसी—पिटी बातें ही करते रहे। फिर चुनाव के दौरान नई दिल्ली में आयोजित प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा, ”यदि वोट की चोरी नहीं होगी तो बिहार में महागठबंधन की सरकार बनेगी।” इससे संदेश गया कि चुनाव से पहले ही राहुल ने हार मान ली है। ऐसी खबरें आईं कि राहुल के बयान से तेजस्वी यादव नाराज हो गए थे। तेजस्वी यादव ने कांग्रेस आलाकमान को संदेश भेजवाया कि राहुल को प्रचार में न उतारा जाए। प्रचार के अंतिम दौर में ऐसा हुआ भी। राहुल की जगह प्रियंका गांधी वाड्रा को चुनाव प्रचार के लिए भेजा गया।
राहुल की इस राजनीतिक अपरिपक्वता के कारण बिहार में कांग्रेस लगभग साफ हो गई है। पार्टी की इस हालत से दुखी और निराश कुछ कांग्रेसी ही राहुल गांधी की राजनीतिक सूझबूझ पर सवाल उठाने लगे हैं। गांधी खानदान के करीबी दिग्विजय सिंह जैसे नेता तो दबे स्वर में राहुल गांधी को राजनीति से संन्यास लेने की सलाह दे रहे हैं। मिल्टन फाइडमैन की एक पंक्ति राहुल गांधी पर सटीक बैठती है। उन्होंने कहा था, ”मरुभूमि की जिम्मेदारी किसी सरकार को दे दीजिए पांच साल बाद वहां रेत की कमी हो जाएगी।” कह सकते है कि राहुल गांधी कांग्रेस के साथ यही कर रहे हैं।

नकारे गए प्रशांत और मुकेश
महागठबंधन से घोषित उपमुख्यमंत्री मुकेश सहनी की वीआईपी का खाता भी नहीं खुला। चुनाव से पहले राहुल गांधी और मुकेश सहनी ने जो रवैया अपनाया उससे भी महागठबंधन को नुकसान हुआ। सच तो यह है कि तेजस्वी यादव का यह हाल राहुल गांधी और मुकेश सहनी के कारण हुआ है। अपने को बड़े चुनावी रणनीतिकार मानने वाले प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी भी बुरी तरह हारी। उसका खाता भी नहीं खुला। वास्तव में बिहार के मतदाताओं ने उन्हें उसी दिन हारा हुआ मान लिया था, जिस दिन उन्होंने घोषणा की कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे, क्योंकि उनके कंधों पर पार्टी को जिताने का भार है। सच तो यह है कि प्रशांत स्थिति को जान चुके थे। उन्हें लगा कि यदि वे चुनाव लड़े और हार गए तो सदैव के लिए उनका राजनीतिक अध्याय बंद हो जाएगा। इस सिथति से बचने के लिए उन्होंने खुद चुनाव न लड़ने की घोषणा की थी। कह सकते हैं कि इस मामले में वे ‘चतुर’ निकले।

भाजपा की सटीक रणनीति
इसके उलट प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नीतियों और कार्यों ने राजग को जीत दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। डबल इंजन की सरकार में बिहार में चहुंओर विकास के कार्य हुए हैं। गांव—गांव तक सड़कें बनी हैं। 23—23 घंटे बिजली रहती है। युवाओं को रोजगार भी मिला है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पुलिस लगभग हर विभाग में युवाओं को नौकरियां मिली हैं। सबसे बड़ी बात यह हुई है कि लोगों में भय का माहौल नहीं है। कानून का राज है। अपराध होते हैं, तो अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई भी होती है। लालू—राबड़ी राज में ऐसा नहीं होता था। इन कारणों ने बिहार के लोगों को जाति से परे जाकर मतदान करने के लिए प्रेरित किया और उसका परिणाम सामने है। इस चुनाव को भाजपा ने विकास, विरासत, संस्कृति और घुसपैठ से भी जोड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ही भाजपा के स्टार प्रचारकों अमित शाह, योगी आदित्यानाथ, हिमंत बिस्व सरमा जैसे नेताओं ने बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठ के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया। इसके साथ ही भाजपा ने राम मंदिर और सीतामढ़ी में बन रहे पुनौराधाम को भी चुनावी मुद्दा बनाया।


जाति से परे मतदान
बिहार में जब भी चुनाव की बात होती है तो हमेशा से इसे राजनीतिक विश्लेषक और पार्टियां जातिगत समीकरण के चश्मे से देखने और समझने का प्रयास करती हैं। नब्बे के दशक में जातिगत समीकरण को ध्यान में रखकर राजनीतिक दलों ने कई बार चुनावी दांव चले भी हैं और इससे अपने निशाने को साधा भी है। इनसे कोई इंकार भी नहीं कर सकता। परंतु इस बार के चुनाव ने जाति की धारणा को समाप्त कर दिया है। इस चुनाव में अब तक का उच्चतम मतदान प्रतिशत एक तरफ जहां लोकतंत्र में लोगों के अटूट विश्वास को दर्शाता है, तो वहीं दूसरी तरफ महिला मतदाताओं की उच्चतम भागीदारी समाज में आधी आबादी की स्थिति और उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को भी प्रदर्शित करती है। बिहार विघानसभा में कुल 243 सीट हैं। बहुमत का जादुई आंकड़ा 122 है, जिसे छूने के लिए तमाम राजनीतिक दलों ने अपनी एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। परंतु जातिगत समीकरण के साथ सोशल इंजीनियरिंग, तर्कसंगत सीट बंटवारा, सटीक चुनावी रणनीति, क्षेत्रीय संतुलन एवं नेतृत्व के बीच सही तालमेल की बदौलत राजग ने ऐतिहासक जीत प्राप्त कर ली है।
यही नहीं, राजग ने महागठबंधन के एम-वाई (मुस्लिम—यादव) समीकरण रूपी अभेद्य किले को भी ‘ईबीसी-दलित-सवर्ण-महिला’ के बाण से ध्वस्त कर दिया। बिहार की कुल आबादी में करीब 30 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले ईबीसी मतदाता राजग के पारंपरिक आधार रहे हैं। नीतीश कुमार द्वारा पंचायत चुनावों में आरक्षण और ईबीसी समर्पित कल्याणकारी योजनाओं ने इस वर्ग में उनकी गहरी पैठ अभी भी बना रखी है। चिराग पासवान की लोजपा (रामविलास) और जीतनराम माझी के नेतृत्व वाली ‘हम’ पार्टी के राजग में होने से इस बार दलित और महादलित (लगभग 16 प्रतिशत) मतों का विभाजन काफी हद तक रुका है। आवास, राशन, स्वास्थ्य बीमा जैसी सीधी लाभ वाली सरकारी योजनाओं ने इन समुदायों में राजग के प्रति विश्वास को और मजबूती प्रदान किया है।
‘बिहार के लोगन गर्दा उड़ा देले’
बिहार चुनाव में जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय पहुंचे। वहां उन्होंने भाजपा कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि यह जीत प्रचंड है। यह अटूट विश्वास की जीत है। बिहार के लोगों ने बिल्कुल गर्दा उड़ा दिया है। हम राजग के लोग जनता जनार्दन के सेवक हैं। उन्होंने कहा कि बिहार के लोगों ने विकसित बिहार और समृद्ध बिहार के लिए मतदान किया है। मैंने चुनाव प्रचार के दौरान बिहार की जनता से भारी मतदान का आग्रह किया था और उन्होंने मेरे आग्रह को मानकर मतदान के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए।
उन्होंने कहा कि बिहार ने 2010 के बाद का सबसे बड़ा जनादेश राजग को दिया है। मैं बहुत विनम्रता से राजग के सभी दलों की ओर से बिहार की महान जनता का आभार व्यक्त करता हूं। मैं बिहार की महान जनता को आदरपूर्वक नमन करता हूं। उन्होंने कहा कि एक पुरानी कहावत है- लोहा लोहे को काटता है। बिहार की इस जीत ने नया एम—वाई फॉर्मूला दिया, जिसका मतलब है-महिला और यूथ। आज राजग उन राज्यों में सत्ता में है, जहां युवाओं की संख्या अधिक है। उन्होंने मतदाता सूची के शुद्धिकरण पर जोर देते हुए कहा कि बिहार के चुनाव ने एक और बात सिद्ध की है। अब देश का मतदाता, खासतौर पर हमारा युवा मतदाता, ‘मतदाता सूची के शुद्धिकरण’ को बहुत गंभीरता से लेता है। बिहार के युवा ने भी मतदाता सूची के शुद्धिकरण को जबरदस्त तरीके से समर्थन दिया है। अब हर दल का दायित्व बनता है कि वे पोलिंग बूथ पर अपने—अपने दलों को सक्रिय करें और मतदाता सूची के शुद्धिकरण के काम में उत्साह के साथ जुड़ें और शत प्रतिशत योगदान दें, ताकि बाकी जगहों पर भी मतदाता सूची का पूरी तरह शुद्धिकरण हो सके।
एआईएमआईएम की बढ़त के संकेत!
इस बार भी असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने बिहार के सीमांचल की पांच सीटों पर जीत दर्ज की है। जोकीहाट, बहादुरगंज, बायसी, कोचाधामन और अमौर में उसके प्रत्याशी जीते। बांग्लादेशी मुस्लिम घुसपैठियों से प्रभावित इस क्षेत्र में एआईएमआईएम की जीत को रक्षा क्षेत्र के लोग ठीक नहीं मान रहे हैं। उनका कहना है कि इससे घुसपैठियों का दुस्साहस बढ़ेगा। ये घुसपैठिए पुलिस पर भी आक्रमण करते रहे हैं। अब उन्हें एआईएमआईएम का संरक्षण मिलने से उनकी हरकतें बढ़ सकती हैं।
सवर्ण और ओबीसी मतदाता भाजपा के मजबूत स्तंभ रहे। सवर्णों (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कायस्थ) ने एकजुट होकर राजग के पक्ष में मतदान किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता ने भी इस चुनाव में बड़ी भूमिका निभाई। यह देखा गया कि जो किसी भी राजनीतिक दल से नहीं जुड़ा है, उसने प्रधानमंत्री के नाम पर वोट किया।
राजग ने सत्ता विरोधी लहर की नब्ज को ध्यान में रखते हुए कई वर्तमान विधायकों को टिकट नहीं दिया। इससे जनता में सरकार के प्रति असंतोष का भाव कम हुआ। राजग ने केंद्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं, जैसे— हर घर नल जल योजना, शौचालय, बिजली, गैस कनेक्शन, किसान सम्मान निधि को भी भुनाया।
इन कारणों से ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बिहार में प्रचंड जीत मिली है। इस जीत का असर पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के चुनावों में भी पड़ना तय माना जा रहा है।
वापमंथी दलों का बुरा हाल
इस चुनाव में सभी वामपंथी दल महागठबंधन के साथ थे। सदैव गठबंधन के सहारे आगे बढ़ने वाले वामपंथी इस बार लगभग खत्म हो गए हैं। 2025 में भाकपा माले ने 12, भाकपा और
माकपा ने 2-2 सीटों पर दर्ज की थी। यानी कुल 16 सीट उनके पास थी। इस बार वामपंथी तीन सीट पर सिमट गए हैं।
हम जो कहते हैं, वही होता है

पाञ्चजन्य सदैव से चुनाव को लेकर न केवल जमीनी रिपोर्ट प्रकाशित करता है, बल्कि चुनाव पूर्व की हवा को भी स्पष्ट रूप से बताता हैै। 2024 में दिल्ली विधानसभा चुनाव पर एक अंक ‘चोट गहरी, कराह बाकी’ प्रकाशित हुआ था, जिसमें बताया गया था कि आम आदमी पार्टी चुनाव हारने जा रही है। ऐसे ही 2022 में उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव पर ‘धमक केसरिया’ शीर्षक से अंक निकला था। 2017 में भी उत्तर प्रदेश चुनाव पर ‘होम वर्क हो चुका, अब बस निर्णय’ अंक प्रकाशित हुआ था।
इन दोनों अंकों में भाजपा की जीत का ठोस अनुमान लगाया गया था। 2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व प्रकाशित अंक ‘जन के मन की बात’ में सटीक विश्लेषण किया गया था। 2014 के लोकसभा चुनाव के समय ‘लहर पर सवार’ शीर्षक से अंक प्रकाशित हुआ था। इसमें बताया गया था कि कांग्रेस के कुशासन से लोग तंग आ चुके हैं और इस कारण भाजपा की सरकार बनने जा रही है।


















