क्या 16 वर्ष में सहमति से संबंध कानूनी होना चाहिए?
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क्या 16 वर्ष में सहमति से संबंध कानूनी होना चाहिए?

सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ 12 नवंबर को उस मामले पर सुनवाई करेगी, जिसमें किशोरों के लिए सहमति से यौन संबंध की कानूनी उम्र 18 से घटाकर 16 वर्ष करने की मांग की गई है। यह विषय गंभीर सामाजिक चर्चा का मुद्दा है।

Written byडॉ कृपाशंकर चौबेडॉ कृपाशंकर चौबे — edited by Mahak Singh
Nov 12, 2025, 01:45 pm IST
inभारत
Suprime Court

Suprime Court

सर्वोच्च न्यायालय की तीन सदस्यीय पीठ किशोरों के लिए सहमति से यौन संबंधों के लिए कानूनी आयु 18 वर्ष से घटाकर 16 वर्ष करने के विषय पर 12 नवंबर को सुनवाई करने जा रही है जिस पर एक गंभीर सामाजिक विमर्श की आवश्यकता निर्विवाद है।

इस संदर्भ में यह जानना आवश्यक है कि सबसे पहले यह बहस वर्ष 1860 में प्रारंभ हुई थी और वर्ष 2012 तक सहमति से यौन संबंधों की उम्र 16 वर्ष निर्धारित थी किंतु वर्ष 2012 में बालकों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम पारित होने पर अधिनियम की धारा की धारा 2(e)में बालक को पुर्नपरिभाषित करते हुए करते हुए 18 वर्ष तक के किशोर को बालक की श्रेणी में रखा गया । साथ ही बालकों की सुरक्षा हेतु बनाए गए एक अन्य अधिनियम ” किशोर न्याय ( बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम 2015 की धारा 2 (12) के अनुसार भी बालकों की आयु 18 वर्ष मानी गई , तदनुसार सहमति से यौन संबंधों की आयु 18 वर्ष तय की गयी।

नैतिक और सामाजिक मूल्य

भारतीय सामाजिक परिदृश्य में संयम और नैतिक आचरण जीवन के आधार भाव रहे हैं, ऐसे में निरंतर परिवर्तनशील सामाजिक मान्यताओं मूल्यों और विचारधाराओं के दृष्टिगत व्यक्तिगत स्वतंत्रता और लैंगिक समानता की चर्चा के बीच यह प्रश्न और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या 18 वर्ष से कम वय के किसी किशोर के द्वारा शारीरिक संबंधों के लिए दी गई सहमति को कानूनी मान्यता दी जाना चाहिए? क्या यह विषय केवल कानून की परिधि में है अथवा इसका भावनात्मक नैतिक और सामाजिक मूल्य भी है?

इस विषय के समर्थक यह तर्क देते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने शरीर और जीवन पर अधिकार है तथा संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अर्थ यही है कि व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने जीवन का निर्णय ले सके। आधुनिक समय में किशोर शिक्षित आत्मनिर्भर और जागरूक होकर अपने अधिकारों को समझते हैं ऐसे में उनकी शारीरिक संबंध बनाने की सहमति को केवल उम्र के आधार पर नकारना उनके संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण है। एक तर्क यह भी यह भी दिया जाता है कि प्रेम और शारीरिक संबंध प्राकृतिक और भावनात्मक आधार पर निर्मित होते हैं ऐसे में उन्हें कानूनी मान्यता मिलना चाहिए।

किशोरों की सुरक्षा से समझौता

इस विमर्श के दूसरे पहलू को देखा जाए तो ऐसी सहमति को कानूनी मान्यता देना वस्तुत: किशोरों की सुरक्षा के साथ समझौता करना है। किशोरावस्था एक मनोवैज्ञानिक उथल-पुथल की अवस्था है, जहां तर्क और समझ के स्थान पर भावनाएं प्रधान होती हैं, अतः ऐसी अवस्था में शारीरिक संबंध हेतु दी गई सहमति वास्तव में सजग निर्णय के आधार पर न होकर भावनात्मक और हार्मोनल दबाव का परिणाम होती है। इसलिए विचारपूर्वक किशोरों को शारीरिक शोषण और मानसिक आघात से सुरक्षित रखने के लिए सहमति की न्यूनतम आयु 18 वर्ष निर्धारित की गई है। यदि यह सुरक्षा कवच हट गया तो अपराधी वर्ग द्वारा सहमति का सहारा लेकर उनके दुरुपयोग की आशंकाएं बढ़ जाएंगी।

देह व्यापार का खतरा

कोमल उम्र में भावनाओं और आकर्षण के प्रभाव में बालिकाएं देह व्यापार जैसी गलत दिशा में ले जाई सकती हैं। अपनी वास्तविक सामाजिक प्रस्थिति छिपाकर ,छलपूर्वक अन्य सामाजिक पहचान के जरिए किए जाने वाले संगठित सामाजिक अपराधों जैसे “लव जिहाद” में बढ़ावा होना निश्चित है। ऐसे योजनाबद्ध अपराध न केवल वैयक्तिक रूप से बल्कि सामाजिक ढांचे और परिवार व्यवस्था पर भी सीधा आघात हैं। अतः सहमति की आयु घटाना प्रकारांतर से उन नकारात्मक शक्तियों को बल प्रदान करना है, जो किसी भी प्रकार से सामाजिक स्थिरता को भंग करने का प्रयास करती हैं। यह निश्चित करना अत्यंत कठिन होता है कि किसी बालिका ने सहमति स्वतंत्र इच्छा से दी थी या किसी भावनात्मक दबाव,प्रेम प्रवंचना अथवा छल के तहत ।अपराधी इस अस्पष्टता का आसानी से अपने बचाव में उपयोग करते हैं और इसका फायदा उठाकर समाज में अस्थिरता फैलाते हैं। इस प्रकार वस्तुतः यह संरक्षण और स्वतंत्रता के स्थान पर शोषण का माध्यम बन जाता है।

भविष्य के सपने की जगह मानसिक पीड़ा

कम उम्र में स्थापित यौन संबंध चाहे वे सहमति के आधार पर बने हों अथवा बलात, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक रूप से विनाशकारी प्रभाव ही छोड़ते हैं। अवांछित गर्भ, विभिन्न प्रकार के संक्रमण, अपराध बोध और सामाजिक अपमान जैसी स्थितियां किशोर के भविष्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं। अवांछित संतानों को झाड़ियों में फेंक देने, उन्हें कुत्तों और चूहों द्वारा कुतर दिए जाने की न जाने कितनी घटनाएँ हमारे मनुष्य होने की पात्रता पर प्रश्नचिन्ह हैं, क्या इन घटनाओं में बढ़ोत्तरी नहीं होगी? इस उम्र में बालक कक्षा आठ या नौ का विद्यार्थी होता है। जिस वय में उसे शिक्षा,भविष्य और आत्मविकास के स्वप्न देखना चाहिए, वह भावनात्मक बोझ और मानसिक पीड़ा में उलझ जाता है।

सामाजिक संतुलन केवल अधिकार नहीं बल्कि जवाबदेही कर्तव्य और नैतिकता से सधता है। यदि स्वतंत्रता की परिभाषा इतनी व्यापक हो जाए कि वह बच्चों की मासूमियत के साथ छेड़छाड़ करने लगे तो वह स्वतंत्रता नहीं अनैतिक स्वच्छंदता है और ऐसा समाज संतुलित नहीं रह जाता, अराजक बन जाता है।

आत्मघाती कदम की ओर इशारा

यह बात सुनने में साहसिक, विचारोत्तेजक और प्रगतिशील लग सकती है,परंतु वस्तुतः यह कदम बालक को असुरक्षा, मानसिक तनाव और शोषण में धकेलने का कारण बनेगा।समय से पूर्व स्वतंत्रता और उसे कानूनी मान्यता देने की जल्दबाज़ी एक अनुत्तरदायी और आत्मघाती कदम है। समाज और कानून दोनों का ही यह दायित्व है कि वह केवल दैहिक रूप से नहीं बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से भी बालकों की सुरक्षा की संपूर्ण व्यवस्था सुनिश्चित करे। इस तौर पर उनकी उचित शिक्षा,उत्तम स्वास्थ्य और भविष्य की आकांक्षाओं के अनुरूप योजनाएं बनाना और उन्हें पूरा करने के अवसर उपलब्ध कराना इस खोखले विमर्श की तुलना में अधिक आवश्यक कार्य है।

(लेखक, किशोर न्याय बोर्ड भोपाल के सदस्य एवं बाल कानून विशेषज्ञ हैं)

Topics: सुप्रीम कोर्टPOCSO Actsupreme court on age of consent18 से 16 वर्ष कानूनी आयु विवादSupreme Court on consensual sex age IndiaJuvenile Justice Act 2015किशोर न्याय अधिनियम 2015Supreme Court
डॉ कृपाशंकर चौबे
डॉ कृपाशंकर चौबे
(लेखक किशोर न्याय बोर्ड भोपाल के सदस्य एवं बाल कानून विशेषज्ञ हैं) [Read more]
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