पहले कहा जाता था कि साहित्य समाज का दर्पण है। ऐसा इसलिए था, क्योंकि साहित्य समाज का चित्रण करता था। परंतु कालांतर में वामपंथी प्रभाव के चलते साहित्य और साथ ही कला के अन्य रूपों जैसे फिल्मों ने भी समाज की वास्तविकता का चित्रण करना बंद कर दिया। और ऐसा भी हुआ कि साहित्य ने समाज की नहीं सुनी, और यदि दृश्य मनोरजंन साधनों अर्थात फिल्मों की बात की जाए तो अजीब एजेंडा वाली फिल्में बनानी आरंभ कर दीं। परंतु समय बदला और अब ऐसी फिल्में आ रही हैं, जो चित्रण कर रही हैं, उन मामलों का जिनपर काफी पहले आवाज उठाई जानी चाहिए थी, मगर एक खास एजेंडे के कारण उन पर आवाज उठाई नहीं गईं।
उन विषयों को अछूत माना गया, उन विषयों पर बात करने से भी बचा गया। ऐसा ही एक विषय था, मुस्लिम समाज में तीन तलाक का। इस विषय पर शाह बानो के चर्चित मामले के बाद भी न ही साहित्य और न ही फिल्मों ने शाह बानो की सुध ली। मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक पर केवल एक ही फिल्म आई थी और वह थी “निकाह”। परंतु उसे लेकर भी काफी हंगामा हुआ था। एक बात गौर करने लायक है कि उस समय निकाह को मुस्लिम महिलाओं ने काफी पसंद किया था।
इस फिल्म के कई संवाद कई ऐसे प्रश्न उठाते हैं, जिनके उत्तर उस समाज में अब तक खोजे जा रहे हैं। उसके बाद तीन तलाक जैसे विषय पर न ही फिल्मों में कोई बात हुई और न ही साहित्य में। शाह बानो के मामले के बाद भी स्थिति में परिवर्तन नहीं आया। परंतु हाल ही में एक फिल्म ऐसी आई है, जिसे लेकर यह कहा जा रहा है कि यह फिल्म शाह बानो की ज़िंदगी पर बनी है। शाह बानो ने अपने हक के लिए आवाज उठाई थी और तलाक के मामले को लेकर अदालत का रुख किया था, और जब न्यायालय ने उनके पक्ष में निर्णय दिया था तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने कट्टरपंथियों के आगे झुकते हुए, मुआवजे के निर्णय को संसद में निरस्त कर दिया था।
और मुस्लिम महिलाओं की पीड़ा और कहानी एक बार फिर से ऐसे गर्त में चली गई थी, जहां से उसे छूना लगभग किसी भी कलाकार के लिए असंभव था। परंतु कहा जाता है कि जब समय आता है तो मुर्दे भी गवाही देने लगते हैं और फिर यह तो मुस्लिम महिलाओं के जीवन का महत्वपूर्ण भाग था।
मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक जैसे विषय पर बात करती हुई एक फिल्म बनी है, जिसका नाम है “हक”। जिसे लेकर विवाद भी हुआ और शाह बानो के परिजनों ने इस पर रोक के लिए न्यायालय का रुख भी किया था, जिसे न्यायालय ने ठुकरा दिया।
इस फिल्म में यामी गौतम ने शाज़िया बानो का किरदार निभाया है और कहानी यही है कि उनका शौहर उन्हें तलाक दे देता है और जिसके बाद वे एक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ती हैं। फिल्म के ट्रेलर को लेकर ही लोग विरोध कर रहे थे, जबकि इस फिल्म की जब स्क्रीनिंग हुई तो तीन तलाक की पीड़ित मुस्लिम महिलाएं भावुक हो गईं।
ऐसा ही एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। इस वीडियो में एक मुस्लिम महिला यामी गौतम के पास आकर उनसे अपनी बात कह रही है।
Here is a video of a muslim woman thanking Yami Gautam for making Haq movie.
Those women who have suffered because of Triple Talaq, Burqa and Halala laws know the importance of this movie.
People like Arfa who never faced such atrocities from Mullah Maulvis are calling this… pic.twitter.com/cijgfmlNmn
— Incognito (@Incognito_qfs) November 8, 2025
इस वीडियो में वह यामी के हाथ चूमते हुए कह रही है कि यह उनके लिए भी है, कि वे भी लड़ सकती हैं। वह महिला इससे पहले कह रही है कि “बहुत खुशी हुई। देखकर मुझे लगा कि ये हक हमको मिलना चाहिए!”
यह फिल्म उस मुख्य प्रश्न पर बात करती है, जिसे करने से लोग अभी भी बचते हैं। यह बात करती है कि “कौम या कानून!”
इस फिल्म की प्रशंसा लगभग हर आलोचक ने की है। तरन आदर्श ने इस फिल्म को लेकर कहा था कि यह केवल एक कोर्टरूम ड्रामा ही नहीं है, बल्कि यह एक ऐसे साहस की कहानी है, जिसे हर किसी को पता होना चाहिए।
इसका निर्देशन किया है सुपर्ण वर्मा ने और इसमें यामी गौतम के शौहर की भूमिका इमरान हाशमी ने निभाई है।
इमरान हाशमी ने भी इस फिल्म को लेकर हो रहे विरोध पर कहा था कि फिल्म का विरोध नहीं होना चाहिए, बल्कि फिल्म को देखना चाहिए और उसके बाद ही उसका विरोध या समर्थन करना चाहिए।
इस फिल्म में यामी गौतम और इमरान हाशमी के अभिनय की भी प्रशंसा हो रही है। और अभिनय एवं विषय की सार्थकता उस महिला की भावुक प्रतिक्रिया से भी प्रमाणित होती है, जिसने यामी गौतम को भावुक होकर गले लगा लिया था।
यह गले लगाना ही यह बताता है कि फिल्में अर्थात दृश्य साहित्य क्यों समाज का दर्पण कहलाता है क्योंकि वह उन मुद्दों पर भी बात करता है, जनता के सामने लाता है, जिन पर एजेंडा बात करने से इनकार करता है।

















