इंग्लैंड और वेल्स में शरिया अदालतों के नाम पर हिंसा का जाल : क्या महिलाएं वास्तव में हैं विवश ?
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इंग्लैंड और वेल्स में शरिया अदालतों के नाम पर हिंसा का जाल : क्या महिलाएं वास्तव में हैं विवश ?

मुस्लिम महिलाओं को लेकर इज्जत के नाम पर हिंसा के भी उदाहरण सामने आ रहे हैं। और इंग्लैंड के उदारवादी लोग इस बात को उठा रहे हैं कि आखिर जब एक लोकतान्त्रिक देश में सेक्युलर कानून है, तो फिर अलग से शरिया अदालतों की जरूरत क्या है?

Written byसोनाली मिश्रासोनाली मिश्रा
Mar 18, 2026, 09:05 pm IST
in विश्व

जब भी इंग्लैंड की तस्वीर सामने आती है तो कल्पना में आजाद ख्याल वाली लड़कियां सामने आती हैं। एक आजाद ख्याल वाले समाज की छवि बनती है, वह बात दूसरी है कि इसके पीछे समाज की जो कलुषता है, वह कहीं न कहीं छिप जाती है। अब जो खबरें सामने आ रही हैं, उनमें इंग्लैंड की छवि ऐसी उभरकर आती है, जैसे कि वह पश्चिम का कथित आधुनिक
देश न होकर पाकिस्तान जैसा मुस्लिम देश हो।

दरअसल इंग्लैंड और वेल्स सहित पूरे यूरोप में इस्लामिक कट्टरता के किस्से लगातार सामने आ रहे हैं। मजहब का पालन करने के नाम पर शरिया अदालतों का विस्तार हो रहा है।

मुस्लिम महिलाओं को लेकर इज्जत के नाम पर हिंसा के भी उदाहरण सामने आ रहे हैं। और इंग्लैंड के उदारवादी लोग इस बात को उठा रहे हैं कि आखिर जब एक लोकतान्त्रिक देश में सेक्युलर कानून है, तो फिर अलग से शरिया अदालतों की जरूरत क्या है? और शरिया अदालतों में जिस प्रकार से मुस्लिम महिलाओं के प्रति हिंसा को नकारा जाता है, वह और भी खतरनाक है।

वर्ष 2025 में उत्पीड़न के 2949 मामले

spiked में Stephen Sidney ने एक रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें यही प्रश्न किया गया है कि हमें अब शरिया अदालतों के बारे में बात करने की जरूरत है। उन्होंने इंग्लैंड और वेल्स में इज्जत के नाम पर होने वाली हिंसा के आंकड़े देते हुए लिखा कि वर्ष 2025 में पुलिस ने 2,949 मामले ऐसे दर्ज किया गए जो इज्जत आधारित उत्पीड़न के थे। यह अधिकतर उन महिलाओं और लड़कियों के साथ किये गए थे, जिन्होंने कथित रूप से अपने कुनबे या समुदाय की इज्जत को नुकसान पहुंचाया था।

ये हैं प्रमुख कारण

इसमें लिखा है कि हालांकि इसके कई कारण हो सकते हैं, मगर अधिकतर इसमें घरवालों की मर्जी से शादी से इनकार करना, अपना जीवनसाथी खुद से खोजना, तलाक चाहना या फिर आजादी चाहना जैसी बातें शामिल हैं। इसमें यह भी लिखा है कि अधिकतर घरवाले ही ऐसी लड़कियों को सजा देते हैं, और जिनमें उत्पीड़न वाली शादी में लड़कियों को बने रहना, उनके बाहर निकलने पर प्रतिबंध या फिर कई बार इज्जत के नाम पर हत्या भी शामिल होती है।

लड़कियों की शिकायत नहीं सुनी जाती

यह कल्पना ही नहीं की जा सकती है कि किसी कथित विकसित या आधुनिक देश में पंथ को आजादी के नाम पर उस पंथ की लड़कियों की आजादी ही छीन ली जाएगी? उनकी पीड़ाओं को न ही समझा जाएगा और न ही उन पर बात होगी? उन्हें पूरी तरह से उनके समुदाय की क्रूर रिवाजों के हवाले कर दिया जाएगा? और इंग्लैंड को लेकर तो और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि कहीं न कहीं अधिकारियों पर भी यह आरोप है कि लड़कियों की शिकायत सुनी ही नहीं जाती है।

केवल 98 मामलों में दिया दंड

इस रिपोर्ट में लिखा है कि प्रश्न यह नहीं है कि ये क्रूर रिवाज यूनाइटेड किंगडम में हो रहे हैं, बल्कि अधिकारी उन्हें दंड देने में नाकाम हो रहे हैं या फिर वह यह काम करना नहीं चाहते हैं। सरकार ने एक तरह से इनकी ओर से आंखें मूंद ली हैं। लगभग 3000 ऐसे मामलों में से केवल और केवल 98 ही ऐसे मामले आए हैं, जिनमें दंड दिया गया हो। अर्थात केवल ये ही मामले ऐसे थे, जो न्यायालय तक गए। इसमें लिखा है कि कर्म निर्वाण नामक संगठन के अनुसार इज्जत के नाम पर होने वाली हत्याओं में इंग्लैंड और वेल्स में सबसे कम सजा मिलती है।

इसके कारण क्या हैं?

आम तौर पर यह माना जाता है कि सरकार इस्लामी समूहों के आगे झुक जाती हैं और पंथ के आंतरिक मामलों में दखल न देने के नाम पर वह उन्हें कई मामलों में खुली छूट दे देती है। परंतु इस रिपोर्ट में लिखा है कि यह ध्यान दिया जाए कि पुलिस का ही कदम न उठाना इतने कम मामलों में सजा का कारण नहीं है, इन मामलों में कम सजा का सबसे बड़ा कारण है कि पीड़िताएं अपने बयान वापस ले लेती हैं या फिर पुलिस के साथ सहयोग करने से इनकार कर देती हैं। ऐसा नहीं है कि वे अपने आप अपना मन बदलती हैं, अक्सर ऐसा होता है कि वे धमकियों के डरकर अपने कदम पीछे खींचती हैं।

तीन चौथाई पीड़िताएं मुस्लिम समाज की

इस रिपोर्ट में लिखा है कि इज्जत के नाम पर उत्पीड़न की पीड़ित अधिकांश लड़कियां मुस्लिम समाज की होती हैं, तो यह मानने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि शरिया महिलाओं को न्याय न देने में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है। ये शरिया अदालतें ब्रिटेन के न्यायालयों एवं धर्मनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक कानूनों से काफी दूर होते हैं और शरिया अदालतें ही उत्पीड़न करने वाले जीवनसाथी के साथ दोबारा रहने के लिए बाध्य करती हैं और साथ ही पुलिस के पास जाने को लेकर उन्हें शर्मिंदा किया जाता है या फिर पुलिस में जाना अंतिम उपाय माना जाता है।

ये शरिया अदालतें हर व्यक्तिगत मामलों जैसे शादी, तलाक, उत्तराधिकार और बच्चों की कस्टडी जैसे मामलों पर ध्यान केंद्रित करती हैं। इसके बाद लड़कियों को लेकर शरिया में जो कानून हैं, उन्हें लिखा गया है कि कैसे एक महिला की गवाही आमतौर पर पुरुष की गवाही की तुलना में आधी मानी जाती है। पुरुष तीन तलाक दे सकते हैं, और लड़कियों के सामने कई प्रकार की बाधाएं आती हैं।

इस रिपोर्ट में एक और चौंकाने वाला मामला दिया गया है, जो वर्ष 2026 में घटा था। इसमें एक मुस्लिम महिला, जिसे ब्रिटेन के कोर्ट ने कानूनी रूप से तलाक दे दिया था, उसे अपने शौहर के पास दोबारा जाने के लिए मजबूर कर दिया था। उसने शरिया के जज के बारे में लिखा था कि उन्होनें उसकी एक भी बात नहीं सुनी थी।
भारत में शाहबानो जैसी महिलाएं हुईं जिन्होंने कम से कम आवाज तो उठाई, मगर इंग्लैंड जैसे देश में ऐसी आवाज का न उठना, निराशाजनक है।

अपनी राजनीतिक निष्पक्षता दिखाने के लिए क्या यह आवश्यक है कि महिलाओं पर अत्याचार होने दिया जाए, फिर चाहे वह ग्रूमिंग गैंग्स के नाम पर श्वेत लड़कियों के साथ किया गया जघन्य अपराध हो या फिर इज्जत के नाम पर किये जा रहे उत्पीड़न हों? क्या कथित राजनीतिक निष्पक्षता को महिलाओं के शोषण के आधार पर विकसित किया जाएगा, यह एक सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है!

 

Topics: महिला हिंसा और मजहबमुस्लिम महिला अधिकारब्रिटेन शरिया अदालतइंग्लैंड में इस्लामिक कट्टरताऑनर किलिंग यूकेशरिया कानून वेल्सस्टीफन सिडनी रिपोर्टयूके पुलिस डेटा 2025
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