वासुदेव बलवंत फड़के स्वाधीनता संग्राम के एक ऐसे अमर सेनानी थे, जिन्होंने देश को अंग्रेजों से मुक्त कराने के लिये अपने जीवन की बलि चढ़ा दी। गांव-गांव घूमकर इस युवक ने स्वाधीनता की लौ जलाई।अंग्रेजों से लोहा लिया।
उनकी जेल के द्वार तक तोड़ डाले। जब मृत्यु हुई तो उनकी मुट्ठी में देश की मिट्टी पुड़िया में बंधी मिली। भारत में तब अंग्रजों के अत्याचार बढ़ते जा रहे थे। वडोदरा के मल्हारराव गायकवाड़ चूंकि अंग्रजों का साथ नहीं देते थे, इसलिए उन्हें गद्दी से उतारा गया था। इस अन्याय के विरोध में जो प्रयास हुए, वे असफल रहे।
वासुदेव का क्रोध बढ़ने लगा। शस्त्र उठाये बिना विदेशियों पर नियंत्रण संभव नहीं, यह उनका दृढ़ मत बना। उन्होंने निजी व्यायाम शाला प्रारंभ की। तरुणों को शस्त्र-विद्या सिखाने लगे। उन्होंने पुणे में जोशीला भाषण देना शुरु किया। वे स्वयं ही थाली पीटकर अपने भाषण का विज्ञापन करते।
स्वातंत्र्य हेतु संघर्ष का महत्व समझाते। उनका विज्ञापन का यह ढंग अनूठा था। वह कहते, ‘भाइयों सुनो ! आज शाम को ठीक 6 बजे, आप सभी ’शनिवार वाड़े’ के सामने, मैदान में पधारें। मैं वहां व्याख्यान दूंगा। स्वराज्य प्राप्त करने के लिये, अंग्रजों को इस देश से भगाना होगा।’
















