वंदे मातरम् की अमर यात्रा के 150 वर्ष, राष्ट्रवाद से पर्यावरण तक
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वंदे मातरम् की अमर यात्रा के 150 वर्ष, राष्ट्रवाद से पर्यावरण तक

बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय की कलम से उपजा वह स्वर, जिसने भारत की आत्मा को स्वर दिया।

Written byडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वालडॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल — edited by Sudhir Kumar Pandey
Nov 7, 2025, 08:20 am IST
in भारत

आक्रमणकारियों ने कई संस्कृतियों को नष्ट और समाप्त किया है। केवल सनातन संस्कृति ही 200 से अधिक बर्बर आक्रमणों के बावजूद बची हुई है। सनातन संस्कृति केवल एक धारणा या विचार नहीं, बल्कि एक सच्चाई है जो व्यावहारिक रूप से कार्य करती है और प्रत्येक व्यक्ति में यह भावना विकसित करती है कि “भारत माता” सर्वोपरि है। यह संस्कृति एक राष्ट्र के रूप में भारत और भारत माता के प्रति कृतज्ञता का भाव विकसित करती है।

सबसे प्रसिद्ध और प्रेरक नारा “वंदे मातरम” है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से कई वर्ष पहले, 1767-1800 के संन्यासी-फ़कीर विद्रोह के दौरान इसके अस्तित्व के संकेत मिले थे। पूरे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान, यह देशभक्तों द्वारा भारतीय जनता को एकजुट करने और अपने देश के प्रति गौरव की भावना जगाने के लिए प्रयुक्त मुख्य नारा रहा। 1876 में, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसके बोल बांग्ला और संस्कृत में लिखे थे। बाद में 1882 में उनके उपन्यास “आनंदमठ” में शामिल किया गया।

मातृभूमि का सम्मान

यह गीत भारत को एक दिव्य मातृरूपी स्वरूप में चित्रित कर और उसकी महिमा, सौंदर्य और शक्ति का गुणगान करता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में “वंदे मातरम” की पंक्तियां राष्ट्र के प्रति गहरी देशभक्ति और सम्मान की भावना को प्रेरित करती हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर ने “वंदे मातरम” गीत को संगीतबद्ध किया। यह गीत विभिन्न शैलियों और व्याख्याओं में विकसित होकर ब्रिटिश शासन के विरोध का प्रतीक बना। इस गीत ने भारत में विभिन्न भाषाई और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के लोगों को एकजुट किया।

“वंदे मातरम” भारत के मुक्ति संग्राम के लिए महत्वपूर्ण था। यह राष्ट्रीय जनमानस में तब प्रवेश कर गया जब रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार 1886 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गाया। इस गीत ने शीघ्र ही लोकप्रियता हासिल की और यह जुलूसों, रैलियों और अन्य राष्ट्रवादी आयोजनों का मुख्य हिस्सा बना। बंगाल को विभाजित करने के ब्रिटिश निर्णय की प्रतिक्रिया में 1905 में शुरू किए गए स्वदेशी आंदोलन ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाई। इस अभियान द्वारा भारतीयों से ब्रिटिश आयात के बजाय भारत में बने उत्पादों का समर्थन करने का आग्रह किया गया। यह देशभक्ति की भावना को बढ़ावा देने और ब्रिटिश अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने के लिए किया गया था। पूरे देश के लोगों ने विरोध प्रदर्शन आयोजित करके, आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करके और केवल भारत में निर्मित उत्पादों का उपयोग करके इसमें भाग लिया।

वंदे मातरम् को जन घोष बनाया

20वीं सदी के आरंभ में स्वदेशी आंदोलन के दौरान “वंदे मातरम” ब्रिटिश आर्थिक नीतियों के विरोध का प्रतीक बना। स्वतंत्रता सेनानियों, कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों, सभी ने इस गीत का गायन किया, जिसने अन्याय के विरुद्ध साहस और समर्थन का संदेश दिया। अरबिंदो घोष, लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं ने “वंदे मातरम” को एक जन-घोष के रूप में इस्तेमाल करने के लिए प्रोत्साहित किया। इस गीत की जन-जन को प्रेरित करने की क्षमता को पहचानते हुए, अंग्रेजों ने इसे दबाने की कोशिश की, लेकिन उनके प्रयासों ने इसे और अधिक प्रसिद्ध बना दिया।

“वंदे मातरम” हाल के वर्षों में पर्यावरणीय चेतना और जवाबदेही के प्रतीक के रूप में और अधिक प्रसिद्ध हो गया है। इस गीत के कुछ संस्करणों ने भारत माता की प्राकृतिक सुंदरता के संरक्षण के महत्व को उजागर और सम्मानित करके देशभक्ति को सतत विकास के व्यापक उद्देश्य से जोड़ा है। “वंदे मातरम” का यह विकसित होता संस्करण इस गीत के चिरस्थायी महत्व और नई भारतीय पीढ़ियों को राष्ट्र की उन्नति में महत्वपूर्ण योगदान देने के लिए प्रेरित करने की इसकी क्षमता को दिखाता है। यह एक ऐसा गीत है जिसने भारतीयों को अपने राष्ट्र से प्रेम करने के लिए प्रेरित किया है।

शुरुआत में बांग्ला में लिखे जाने के बावजूद भाषाई और भौगोलिक बाधा को दूरकर पूरे भारत को एकसूत्र में पिरोया। विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक और भौगोलिक मूल के लोगों को जोड़ने की इसकी क्षमता राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने में इसके योगदान पर जोर देती है। समय के साथ, यह भारत की सांस्कृतिक विविधता और एकजुटता का प्रतिनिधित्व करने लगा। रवींद्रनाथ टैगोर की वंदे मातरम धुन का भारतीय संगीत पर दीर्घकालिक प्रभाव रहा है। इसे लोक, शास्त्रीय और समकालीन संस्करणों सहित विभिन्न तरीकों से प्रस्तुत किया गया है, और इसने देशभक्ति के कार्यक्रमों और भारतीय संगीत प्रदर्शनों में एक बड़ी भूमिका निभाई है। कविता, साहित्य और कलात्मक अभिव्यक्ति, सभी इस गीत से प्रभावित हुए हैं, जो भारतीय राष्ट्रवाद का प्रतिनिधित्व करता है।

अपनी रचना “महायोगी” में, अरबिंदो घोष इस गीत के महत्व को संक्षेप में समझाते हुए कहते हैं, “वंदे मातरम् राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति था।” जैसे-जैसे यह पूरे भारत में तेजी से फैला, लाखों लोग इसके बारे में बात करने लगे। कैम्ब्रिज के शिक्षाविदों ने इस गीत को “स्वदेशी आंदोलन का सबसे महान और सबसे स्थायी उपहार” माना है। 2002 के बीबीसी वर्ल्ड सर्विसेज पोल के अनुसार, वंदे मातरम दुनिया भर में दूसरा सबसे लोकप्रिय गीत था।

Topics: वंदे मातरम्वंदे मातरमपाञ्चजन्य विशेषबंकिमचंद्र चट्टोपाध्यायवंदे मातरम के 150 वर्ष
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ. पंकज जगन्नाथ जयस्वाल
डॉ पंकज जगन्नाथ जयस्वाल, शिक्षाविद्, लेखक और स्तंभकार हैं [Read more]
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