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रामायण सत कोटि अपारा : जब तक रहेगी पृथ्वी, तब तक रहेगी रामकथा

हजारों वर्ष पहले रामायण की रचना हुई थी और वह भी संस्कृत भाषा में। रामकथा के प्रति लोगों में इतनी ललक है, आज भी रामायण की टीकाएं लिखी जा रही हैं। इन सबका आधार संस्कृत में रचित रामायण ही है। संस्कृत में रामायण पर इतना साहित्य है कि उन सबका वर्णन किसी एक लेख में करना संभव नहीं है

Written byरवि कुमाररवि कुमार
Nov 7, 2025, 03:05 pm IST
inभारत, विश्लेषण, धर्म-संस्कृति
एक पट्ट चित्र, जिसमें भक्त हनुमान अपने आराध्य श्रीराम को प्रणाम करते हुए दिख रहे हैं

एक पट्ट चित्र, जिसमें भक्त हनुमान अपने आराध्य श्रीराम को प्रणाम करते हुए दिख रहे हैं

रामकथा का आदि स्रोत ‘रामायण’ ही है। कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ‘रामायण’ की भारतीय जन-मानस में व्याप्ति पर लिखते हैं, “रामायण की कथा से भारतवर्ष के क्या बालक, क्या वृद्ध, क्या स्त्रियां सब को केवल शिक्षा ही नहीं मिलती है, शिक्षा के साथ-साथ उन्हें आनन्द भी मिलता है। भारतवासियों ने रामायण को शिरोधार्य ही नहीं किया, उन्होंने उसको अपने हृदय सिंहासन पर स्थापित किया है।”

रवि कुमार
संगठन मंत्री, विद्या भारती, जोधपुर, राजस्थान प्रांत

संस्कृत साहित्य में महर्षि वाल्मीकि आदिकवि हैं और उनकी कालजयी कृति ‘रामायण’ रामकथा की आदि रचना है। संस्कृत साहित्य में ‘रामायण’ को आदि काव्य का स्थान प्राप्त है। संस्कृत साहित्य के साथ दूसरी भारतीय भाषाओं में रचित रामकथा का आदि स्रोत रामायण ही है। प्रो. राधावल्लभ त्रिपाठी इस विषय पर लिखते हैं, “वाल्मीकि की रचना प्रथम उपलब्ध ‘रामायण’ है। आगे चलकर इससे प्रेरित होकर संस्कृत, प्राकृत तथा अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक ‘रामायणों’ की रचना हुई। योगवशिष्ठ, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, अद्भुदरामायण, मंत्ररामायण, भुशुंडिरामायण आदि रामकाव्य वाल्मीकि रामायण की प्रत्यक्ष परंपरा से ही है। जैन परंपरा में विमलसूरि का पउमचरित्र (प्राकृत में) तथा रविषेण का पद्मचरित्र भी रामायण काव्य है।”

वाल्मीकि कृत ‘रामायण’
चतुर्विंशत्सहस्राणि श्लोकामुक्तवानृषि:।
तथा सर्गशतान् पञ्च षटकाण्डाणि तथोत्तरम्।।
इस कालजयी रचना में 24,000 श्लोक, 500 सर्ग तथा सात काण्ड हैं। ‘रामायण’ के रचना काल के बारे में विभिन्न विद्वानों के अलग—अलग मत हैं। वाल्मीकि ‘रामायण’ में 24,000 श्लोक हैं, इसलिए इसे चतुर्विंशति साहस्री-संहिता’ भी कहा जाता है। गायत्री मंत्र भी 24 अक्षरों का ही है। वाल्मीकि रामायण का प्रत्येक हजारवां श्लोक इन्हीं मंत्राक्षरों से प्रारंभ होता है। इस आदिकाव्य को समस्त उत्तरवर्ती काव्यों का बीजरूप भी माना जाता है- ‘काव्यबीजं सनातनम्’। महाकवि भास से लेकर गोस्वामी तुलसीदास तक अनेक मूर्धन्य रचनाकार वाल्मीकीय ‘रामायण’ से उपकृत हुए हैं। ‘रामायण’ का प्रचार-प्रसार श्रीराम के दोनों पुत्रों कुश और लव द्वारा किया गया। महर्षि वाल्मीकि ने इन दोनों को महाकाव्यों के श्लोकों का सस्वर अभ्यास करवाया और गायन कर जनमानस में रामकथा को प्रसारित किया।

वैदिक युग में रामकथा

वैदिक युग से ही राम शब्द का उल्लेख मिलता है। ऋ ग्वेद में ‘राम’ शब्द का स्पष्ट उदाहरण मिलता है। ब्राह्मण ग्रंथों में ऐतरेय, शतपथ और उपनिषदों में प्रश्नोपनिषद में ‘रामायण’ के पात्रों का नामोल्लेख मिलता है। पुराणों में राम को भगवान विष्णु का अवतार माना गया है। पुराणों में रामकथा अलग—अलग रूपों में व्याप्त है। मार्कण्डेय, ब्राह्मण, वायु, विष्णु, श्रीमद्भागवत, ब्रह्म, गरुड़, हरिवंश, नारदीय, स्कन्द आदि, और कल्कि पुराण में रामकथा के अंश व्याप्त हैं। भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा में ज्ञान और ग्रंथ की परंपरा व्यक्ति से अधिक प्रभावी रही है। वैदिकयुग, ब्राह्मण, आरण्यक, रामायण और महाभारत युग, सूत्र-युग, ग्रंथ के आधार पर किए गए नामकरण हैं। ‘रामायण’के बाद रामकथा की दृष्टि से सर्वाधिक प्रमुख आख्यान ‘महाभारत’ है। महाभारत के वनपर्व (अध्याय 273-93) में ‘रामोपाख्यान’ में ‘रामायण’ की कथा का सार है। इस ‘रामोपाख्यान’ में महाभारत युगीन परिवेश का प्रभाव है।

स्वर्गीय रामदास गौड़ ने ‘हिन्दुत्व’ नामक पत्रिका में 18 रामायणों का उल्लेख किया है- 1. संवृत रामायण, 2. अगस्त्य रामायण, 3. लोमक्ष रामायण, 4. मंजुल रामायण, 5. सौपय रामायण, 6. महामाला रामायण, 7. सौहार्द रामायण, 8. मणिरत्न रामायण, 9. सौर रामायण, 10. चान्द्र रामायण, 11. मैंद रामायण, 12. स्वायं मुव रामायण, 13. मुब्रल रामायण, 14. सुवर्चस रामायण, 15. देव रामायण, 16. श्रावण रामायण, 17. दुरंत रामायण 18. चम्पू रामायण। इसके अतिरिक्त, ‘रामचरितम्’ शीर्षक से संस्कृत में आठ महाकाव्य उपलब्ध हैं, जिनके रचयिता क्रमश: काशीनाथ, अभिनंद, संध्याकार, नंदिन, कामाक्षी, देवविजय, रामवर्मन तथा गोदवर्मन हैं।

वाल्मीकि ‘रामायण’ का सृजनात्मक विकास संस्कृत के लौकिक और ललित साहित्य में रूपांतरित हुआ। भास और कालिदास के साथ रामचरितात्मक महाकाव्य, नाटक, खण्डकाव्य, चम्पूकाव्य और कथा-साहित्य में रामकथा का विस्तार हुआ। फादर कामिल बुल्के ने अपने प्रसिद्ध शोध ‘रामकथा’ में संस्कृत के ललित साहित्य में रामकथा के विस्तार का उल्लेख किया है। उन्होंने अपने ग्रंथ में जिन महाकाव्यों में ‘रामकथा’ सर्जनात्मक उपस्थिति का उल्लेख किया है, उनमें प्रमुख हैं- कालिदास का ‘रघुवंश’ (400 ई.), भट्टि का भट्टिकाव्य अथवा रावणवध (500 से 650 ई. के मध्य), कुमारदास का ‘जानकीहरण’ (800 ई.), अभिनन्द का ‘रामचरित’ (9वीं शताब्दी), साकल्यमल्ल का ‘उदासराघव’ (14वीं शताब्दी), वामन भट्टबाण का ‘रघुनाथ चरित’ (15वीं शताब्दी) चक्रकवि का ‘जानकी परिणय (17वीं शताब्दी), बनारस निवासी अद्वैत कवि का ‘रामलिंगामृत’ (17वीं शताब्दी) और मोहन स्वामी का ‘रामरहस्य’ (18वीं शताब्दी)।

20वीं शताब्दी में भी रामकथा पर आधारित संस्कृत महाकाव्य लिखे गए। प्रमुख महाकाव्यों में आचार्य रेवाप्रसाद द्विवेदी का ‘उत्तरसीताचरितम्’ और ‘अभिराज’ राजेन्द्र मिश्र का ‘जानकीजीवनम्’ विशेष प्रशंसित हुए।

नाट्यलेखन में रामकथा

वाल्मीकि रामायण की कथा को संस्कृत-नाट्य साहित्य में रूपायित करने वाले नाटककारों में भास का नाम लिया जाता है। भास कालिदास के पूर्ववर्ती साहित्यकार हैं। ‘प्रतिमा’ और ‘अभिषेक’ दो नाटकों में उन्होंने रामकथा को संजोया है। ‘प्रतिमनाटक’ में कुल सात अंक हैं, जिसमें अयोध्याकांड की कथावस्तु और सीताहरण का चित्रण किया गया है। ‘अभिषेकनाटक’ ‘प्रतिमा’ का पूरक नाटक है। अभिषेक नाटक में बाली वध से लेकर श्रीराम के अभिषेक तक की कथा का वर्णन है। दिंगनाग का ‘कुंदमाला’ नाटक भास के रूपकों की तरह रचा गया। ‘कुंदमाला’ के छह अंक हैं। नाट्यशिल्प और रंगमंचीय दृष्टि से यह उल्लेखनीय नाट्य रचना है।
भवभूति का नाम संस्कृत के महत्वपूर्ण नाट्यकारों में लिया जाता है। उनके तीन नाटक हैं- ‘महावीरचरितम्’, ‘मालतीमाधवम्’ और ‘उत्तररामचरित्तम्’। ‘महावीरचरितम्’ और ‘उत्तररामचरितम’ रामकथा पर आधारित नाटक है। इनका रचनाकाल 8वीं शताब्दी का प्रारंभ है। दोनों में ही सात अंक हैं। ‘उत्तररामचरितम्’ भवभूति की प्रसिद्धि का आधार है। इस नाटक से भवभूति को वैश्विक नाटककार का स्थान प्राप्त हुआ। सात अंकों के इस नाटक में राम-राज्याभिषेक, सीता-परित्याग और राम-सीता मिलन की कथा है। नाटक का प्रधान रस ‘करुण-रस’ है।

अनंगहर्ष मायूराज का ‘उदात्तराघव’ (900 ई.), मुरारी का ‘अनर्घराघव’, राजशेखर का ‘बाल रामायण’ (10वीं शताब्दी), रामभक्त हनुमान द्वारा रचित ‘हनुमन्नाटक’, दक्षिण भारतीय नाटककार शक्तिभद्र का ‘आश्चर्यचूड़ामणि’ (9वीं शताब्दी), जयदेव का ‘प्रसन्नराघव’ (1200-1250 ई.) की गणना प्रमुख रामकथा नाटकों में होती है।

स्फुट काव्य और कथा साहित्य

साहित्य-दर्पण के रचयिता विश्वनाथकृत ‘राघवविलास’, मुद्गलभट्ट कृत ‘रामार्यशतक’, कृष्णेन्द्र कृत ‘आर्यारामायण’ प्रसिद्ध स्फुट-काव्य हैं। कथा-साहित्य की सबसे प्राचीन रचना गुणाढ्यकृत ‘बृहत्कथा’ (प्रथम शतब्दी ई.पू.) में रामकथा भी वर्णित थी। इसके दो विस्तृत रूपांतर मिलते हैं -जैनियों का ‘वसुदेवहिण्डि’ (5वीं शताब्दी) तथा सोमदेवकृत ‘कथा-सरित्सागर’। गुणाढ्य की रचना का संक्षेप क्षेमेन्द्र द्वारा ‘बृहत्कथा-मंजरी’ में किया गया है, जिसमें रामकथा अति संक्षिप्त रूप से वर्णित है।

रागकाव्य व चम्पूकाव्य

तीन प्रमुख रागकाव्य भी रचित हुए-रामपाणिवाद रचित ‘गीतारामम्’, विश्वनाथ सिंह रचित ‘संगीतरघुनन्दनम्’ और गंगाधर शास्त्री कृत ‘संगीतराघवम्’। काव्य व नाट्य के अतिरिक्त चम्पूविधा में भी रामकथा का वर्णन आता है। इनकी संख्या अधिक नहीं है। इसमें प्रमुख है- मालवेश्वर भोजदेव (1005-55 ई.) द्वारा प्रणीत ‘रामायणचम्पू’ जो किष्किंधाकाण्ड तक ही लिखा जा सका। इस चम्पू का युद्धकाण्ड बाद में अनेक कवियों ने लिखा- भारतचम्पू टीकाकार लक्ष्मणसूरि, राजचूड़ामणि दीक्षित, घनश्याम कवि, मुक्तिश्वर दीक्षित, गरलपूरी शास्त्री। भोजदेव के अनन्तर वेंकटाध्वरी ने 17वीं शताब्दी में रामकथापरक दो चम्पूकाव्य लिखे- उत्तरामचरितचम्पू तथा यादवराघवीयचम्पू।
कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर ने अपने ‘रामायण’ शीर्षक लेख में लिखते हैं, ”शताब्दियों पर शताब्दियां बीतती चली गईं, तथापि ‘रामायण’ का स्रोत भारतवर्ष में तनिक नहीं सूखा है। आज भी प्रतिदिन गांव-गांव, घर-घर में इसे पढ़ा-सुना जा रहा है।” यह तथ्य ब्रह्मा के उसी वचन का सत्यापन करता है कि जब तक पृथ्वी लोक पर पर्वत, नदियां रहेंगी, तब तक यहां रामायण-कथा प्रचारित होती रहेगी-
यावत् स्थास्यन्ति गिरयः सरितश्च महीतले।
तावद् रामायणकथा लोकेषु प्रचरिष्यति॥
वाल्मीकि रामयण 1.2.35॥ 

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रवि कुमार
(लेखक : विद्या भारती जोधपुर प्रांत के संगठन मंत्री और विद्या भारती प्रचार विभाग की केन्द्रीय टोली के सदस्य हैं) [Read more]
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