भारत-अमेरिका संबंध : दमदार कूटनीति मजबूत रणनीति
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भारत-अमेरिका संबंध : दमदार कूटनीति मजबूत रणनीति

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तारीफ की, उन्हें अपना मित्र बताया। भारत के कूटनीतिज्ञ भी अमेरिका की हर नीति को समझते हुए रणनीतिक सहयोग के मार्ग पर बढ़ रहे हैं

Written byसुमित मेहतासुमित मेहता
Nov 7, 2025, 11:52 am IST
in विश्व

नवंबर 1968 में वियतनाम युद्ध के संदर्भ में, विशेष रूप से दक्षिण वियतनामी राष्ट्रपति गुयेन वान थीयू के संबंध में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति हेनरी किसिंजर ने कहा था- ‘‘अमेरिका का दुश्मन होना खतरनाक हो सकता है, लेकिन अमेरिका का दोस्त होना घातक है।’’ यह वक्तव्य वियतनाम युद्ध की कूटनीति और उस समय के राजनीतिक संदर्भ को दर्शाता है, जब अमेरिका ने अपने मित्रों के प्रति कठोर रुख अपनाया था। इससे यह भी पता चलता है कि अमेरिकी हित अक्सर अस्थिर और परिवर्तनशील होते हैं। वे अपने विरोधियों से तो लड़ते हैं, परंतु अपने सहयोगियों को भी कठिन परिस्थितियों में छोड़ सकते हैं।

सुमित मेहता
चार्टर्ड अकाउंटेंट एवं ‘डाइग्नोसिंग जीएसटी फॉर डॉक्टर्स’ के लेखक

2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिका के साथ मजबूत संबंध बनाने के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं। इसमें 2020 के चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप के लिए प्रचार करना भी शामिल है, जिसमें उन्होंने अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके भारतीय-अमेरिकियों को रिपब्लिकन के पक्ष में झुकाया। ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी द्विपक्षीय संबंधों के प्रति सकारात्मक बने रहे। हालांकि, अब हालात कुछ बदल गए हैं, क्योंकि ट्रंप अब अमेरिका के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने पर केंद्रित हैं, भले ही इसके लिए भारत के प्रति कभी-कभी विरोधी रुख अपनाना पड़े। अमेरिका ने लगभग हर उस देश के साथ छल किया है, जो उसका दोस्त रहा है। अब भारत भी यह समझ चुका है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि 1991-92 के उदारीकरण के बाद से अमेरिका भारत का प्रमुख व्यापारिक और आर्थिक साझेदार रहा है। भारत की अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ा योगदान अमेरिका के साथ उसके व्यापार अधिशेष का रहा है। अमेरिका को छोड़कर भारत का किसी भी देश के साथ व्यापार अधिशेष नहीं है। इसके साथ भारत की सिलिकॉन वैली और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता भी जुड़ी है, जो देश में रोजगार और विदेशी मुद्रा आय का प्रमुख स्रोत है। लगभग 283 अरब अमेरिकी डॉलर के आईटी उद्योग में से 224 अरब डॉलर का हिस्सा अकेले अमेरिका का है। इसके अलावा, अधिकांश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी विभिन्न ‘टैक्स हेवन्स’ के माध्यम से मुख्यतः अमेरिका से ही आता है।

दूसरे शब्दों में, ट्रंप भली-भांति जानते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था में अमेरिका का योगदान असमान रूप से विशाल है और द्विपक्षीय व्यापार में अमेरिका द्वारा डाला गया किसी भी प्रकार का व्यवधान भारत के लिए गंभीर संकट खड़ा कर सकता था। इसी कारण अमेरिका ने भारत के प्रति कड़ा रुख अपनाने की कोशिश की। असल बात यह है कि जब से भारत ने रूसी कच्चा तेल खरीदना शुरू किया, तभी से अमेरिका इस बात पर जोर दे रहा है कि भारत रूसी कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे। रूस से मिलने वाला कच्चा तेल वैश्विक मानक कीमतों की तुलना में सस्ता था, लेकिन भारत के लिए दूसरा फायदा यह था कि शुरुआत में वह तेल का भुगतान भारतीय रुपये में कर रहा था। रूस को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रुपये का लेन-देन करने में कठिनाई आई तो भारत ने तेल भुगतान के लिए अमीराती दरहम और चीनी युआन का इस्तेमाल शुरू किया। स्वाभाविक रूप से अमेरिका को यह रास नहीं आया।

इसके दो मुख्य कारण थे। पहला, अमेरिका का आरोप है कि यूक्रेन के विरुद्ध युद्ध में भारत रूस को परोक्ष रूप से आर्थिक सहायता दे रहा था और दूसरा, इस संकटपूर्ण समय में रूस का समर्थन कर यह सुनिश्चित कर रहा था कि वह रूस पर अपनी रणनीतिक पकड़ बनाए रखे, जबकि अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस की डॉलर में मूल्यवर्गित संपत्तियों को जब्त कर लिया था।

दरअसल, भारत द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदना और चीनी युआन व अमीराती दरहम में उसका भुगतान करना, अमेरिका की उस रणनीति को कमजोर कर रहा था जिसके तहत उसने रूस के विरुद्ध स्विफ्ट (SWIFT) की अंतरराष्ट्रीय भुगतान प्रणाली को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी। पश्चिमी देशों की ओर से कई अपीलों और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत पर सार्वजनिक रूप से दबाव डालने के प्रयासों के बावजूद भारत ने रूसी तेल की खरीद जारी रखी। इस रुख ने अमेरिका को नाराज कर दिया।

इस स्थिति में ट्रंप ने चालाक व्यापारी की तरह भारत पर दबाव बनाने का अवसर खोजा। उन्होंने दो बेहद संवेदनशील मुद्दों-भारत से अमेरिका को निर्यात किए जाने वाले माल पर टैरिफ और एच-1बी वीजा याचिका शुल्क 1,00,000 अमेरिकी डॉलर करने जैसे कठोर तरीके अपना कर भारत को आर्थिक रूप से जकड़ने की कोशिश की। अमेरिका द्वारा थोपे गए 50 प्रतिशत टैरिफ ने भारत में आर्थिक उथल-पुथल मचाई। इसका कारण यह रहा कि भारत अन्य बाजारों में अभी उतनी पहुंच नहीं रखता। अमेरिका ने इस कमजोरी को भांपा और भारत पर प्रभावी ढंग से दबाव बनाया।

फार्मास्युटिकल्स, वस्त्र, रत्न और आभूषण, चमड़े के उत्पाद आदि कई बड़े क्षेत्र अमेरिकी बाजार पर निर्भर हैं। इसलिए ट्रंप द्वारा पहले टैरिफ 10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत और फिर 50 प्रतिशत करने के बाद सूरत और कानपुर जैसे शहर चिंतित हुए। लाखों लोगों की नौकरियों पर संकट मंडराता देख और अपने हित की चिंता करके भारत ने अमेरिका के साथ बातचीत करने की पहल की, अपने तात्कालिक से लेकर दीर्घकालिक रणनीतिक विदेश नीति लक्ष्यों से समझौता न करते हुए।
वास्तव में ट्रंप पर व्यापार घाटे और राजकोषीय बजट घाटे को संतुलित करने का जबरदस्त दबाव है। उन पर अपने कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए बाजार ढूंढने, उन्हें विकसित करने, जीन संशोधित बीजों और मॉन्सेंटो जैसी अन्य कृषि कंपनियों के व्यावसायिक हितों को आगे बढ़ाने का भी दबाव है। उन्होंने अपने ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ समर्थकों से अमेरिका में नौकनियां सृजित करने के लिए बड़े वादे भी किए थे। 1980 के दशक से ही अमेरिका ने अपने विनिर्माण और फिर सेवाक्षेत्र को चीन और भारत जैसे देशों में आउटसोर्स करना शुरू कर दिया था।

यही नहीं, अमेरिका को अपने वार्षिक संघीय बजट को भी संतुलित करना था, जो लगभग 2 खरब अमेरिकी डॉलर के घाटे में है और व्यापार घाटा भी लगभग 1 खरब अमेरिकी डॉलर का है। ऐसे में ट्रंप को लगा होगा कि भारत अपनी आर्थिक स्थिरता और लक्ष्यों की रक्षा करते हुए अपनी विदेश नीति के उद्देश्यों का बचाव करने में बहुत कठिन और कमजोर स्थिति में है। फिर ट्रंप ने बहुत चालाकी से उस जगह पर आघात किया, जहां उसके हिसाब से भारत को सबसे अधिक नुकसान हो सकता था- वह है रोजगार क्षेत्र। इसी कारण भारत को अमेरिका से इथेनॉल और मक्के की खरीद बढ़ानी पड़ी। इसके विपरीत, भारत टैरिफ में कमी की उम्मीद कर रहा है, ताकि उसके श्रम प्रधान उद्योगों को अमेरिकी बाजारों तक पहुंच जारी रखने में मदद मिल सके। हालांकि बाद में ट्रंप ने 5 लाख एच-1बी वीजा आवेदनों पर एक लाख डॉलर शुल्क से छूट की पेशकश कर राहत दी है।

कुल मिलाकर, अमेरिका ने तात्कालिक या अल्पकालिक आर्थिक तबाही से बचने के लिए भारत पर दबाव डालने की कोशिश की और हमारी आर्थिक निर्भरता का दुरुपयोग कर हमारे दीर्घकालिक रणनीतिक विदेश नीति उद्देश्यों को बाधित करने का प्रयास किया।

ऐसी स्थिति में कोई भी समझदार और विवेकशील भारतीय सीधे-सीधे यह कैसे कह सकता है कि अमेरिका भारत का अच्छा मित्र है! इस संदर्भ में हेनरी किसिंजर का कथन आज भी प्रासंगिक है कि ‘अमेरिका के न तो स्थायी मित्र हैं, न स्थायी शत्रु; उसके केवल स्थायी हित हैं।’

Topics: कूटनीतिIndia-US relationsवियतनाम युद्धदमदारKootniti DiplomacyRanniti): Strategyप्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदीअमेरिकी डॉलररणनीतिभारत अमेरिका संबंध
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