भुवनेश्वर: बुधवार की सुबह ओडिशा की धरती भक्ति, परंपरा और उल्लास से सराबोर रही। राज्यभर में कार्तिक पूर्णिमा का पवित्र पर्व धूमधाम से मनाया गया, जिसके साथ ही लोगों ने बोइत बंदाण ( नाव वंदना) उत्सव के रूप में अपनी समृद्ध समुद्री विरासत को श्रद्धापूर्वक नमन किया। तड़के से ही श्रद्धालु नदियों, तालाबों और जलाशयों के किनारे उमड़ पड़े, जहां उन्होंने केले की छाल, पत्तों और फूलों से बनी लघु नौकाएं जल में प्रवाहित कीं। इन नौकाओं को दीपक, अगरबत्ती, पान, सुपारी और कौड़ियों से सजाया गया था — जो शुभता, समृद्धि और मंगल की कामना का प्रतीक है।
“आ का मा बाई, पान गुआ थोई, पान गुआ तोरा, मासा कर धर्म मोरा…” की गूंज जब गांवों और नगरों में फैलती गई, तो मानो कलिंग की गौरवशाली समुद्री स्मृतियां फिर जीवंत हो उठीं। कटक के गडगडिया घाट, भुवनेश्वर के बिंदुसागर पुष्करिणी और पुरी के समुद्र तटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी। जब उगते सूरज की किरणें नदियों पर तैरती हजारों दीपों पर पड़ीं, तो वह दृश्य केवल भक्ति का नहीं, बल्कि आत्मगौरव का प्रतीक था। यह पर्व ओडिशा की उस सांस्कृतिक आत्मा को दर्शाता है जो परंपरा में जड़ित होकर भी भविष्य की ओर अग्रसर है — एक ऐसा राज्य जो अपने गौरवशाली अतीत से प्रेरणा लेकर विकसित भारत के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा रहा है।
पुरी में श्रद्धालुओं ने भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के ‘राजाधिराज वेश’ का दुर्लभ दर्शन किया, जो कार्तिक माह के समापन का प्रतीक है।

आस्था, संस्कृति और समुद्री गौरव का संगम
कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह उत्सव ओडिशा की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस दिन श्रद्धालु नदियों में स्नान करते हैं और फिर केले के तने या वटवृक्ष के पत्तों से बनी लघु नावें जल में प्रवाहित करते हैं। इन्हें ‘बोइत’ कहा जाता है, जो कलिंग के उन साहसी समुद्री व्यापारियों (साधवों) की याद में प्रवाहित की जाती हैं, जिन्होंने प्राचीन काल में भारत महासागर पार कर बाली, जावा, सुमात्रा और श्रीलंका तक व्यापारिक यात्राएं करते थे । ऐसा माना जाता है कि जब साधव लंबी समुद्री यात्राओं पर निकलते थे, तो उनकी पत्नियां उनकी कुशलता और समृद्धि के लिए प्रार्थना करती थीं। आज बोइत वंदाण उसी प्राचीन परंपरा का पुनः स्मरण है, जो ओडिशा की समृद्ध समुद्री सभ्यता की गौरवगाथा सुनाती है।
राज्यभर में इस उत्सव में महिलाओं और बच्चों की विशेष भागीदारी रही। नदियों के घाट दीपों से जगमगाते नजर आए, और हर जलधारा पर बहती लघु नौकाओं ने भक्ति, परंपरा और गर्व की अनूठी तस्वीर पेश की।
कलिंग की समुद्री स्मृतियों से आधुनिक विकास की ओर
कार्तिक पूर्णिमा का यह पर्व केवल आस्था का नहीं, बल्कि ओडिशा की गौरवशाली समुद्री विरासत के पुनर्जीवन का प्रतीक भी है। यह अतीत के उस युग की याद दिलाता है, जब कलिंग के व्यापारी अपने साहस, कौशल और संस्कृति से विश्व को परिचित कराते थे।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने दी बधाई
इस पावन अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने देशवासियों, विशेषकर ओडिशा के लोगों को हार्दिक शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि “ऐतिहासिक ‘बालीयात्रा’ उत्सव तथा ‘बोइत बंदाण’ के शुभ अवसर पर देशवासियों विशेषकर ओडिशावासियों को मैं हार्दिक शुभकामनाएं देती हूं। बालीयात्रा ओडिशा की गौरवशाली समुद्री वाणिज्यिक परंपरा एवं सांस्कृतिक धरोहर की प्रतीक है। ।”
राष्ट्रपति ने कहा कि मुझे विश्वास है कि अपने गौरवशाली अतीत को याद करते हुए हम सब मिलकर विकसित भारत के निर्माण के लिए कार्य करेंगे ।
मुख्यमंत्री मोहन माझी पारादीप में बोइत बंदाण कार्यक्रम में हुए शामिल
इसी अवसर पर पारादीप में मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने ‘बोइत बंदाण उत्सव 2025’ में भाग लिया और राज्य की समुद्री परंपरा को सशक्त बनाने की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने कहा, “बोइत बंदांण और बाली यात्रा केवल पर्व नहीं, बल्कि ओडिशा की गौरवशाली पहचान और साधवाओं की अटूट भावना के प्रतीक हैं।”
मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि राज्य सरकार, पारादीप पोर्ट प्राधिकरण और केंद्रीय पोर्ट्स, शिपिंग एवं जलमार्ग मंत्रालय के सहयोग से ओडिशा में समुद्री बुनियादी ढांचे को मजबूत करने हेतु ₹46,000 करोड़ के निवेश की योजना पर कार्य कर रही है।

















