देश के नागरिकों, विशेषकर युवाओं में आत्म-जागरूकता की भावना पैदा करके ही एक गौरवशाली और शक्तिशाली भारत का निर्माण किया जा सकता है। हमें ‘स्व’ के आधार पर आगे बढ़ना होगा। ‘स्व’ की स्थापना का अर्थ है स्वधर्म, स्वदेशी और स्वराज्य। स्वधर्म का मतलब अपनी धर्म और संस्कृति की रक्षा करना, स्वदेशी का अर्थ है स्वदेशी भावना का विकास करना और स्वराज्य का अर्थ है देश में भारतीय परंपरा आधारित शासन व्यवस्था को पुनः स्थापित करना। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर केन्दुझर में आयोजित युवा सम्मेलन को संबोधित करते हुए संघ के ओडिशा (पूर्व) प्रांत के बौद्धिक प्रमुख तन्मय महापात्र ने यह बात कही।
महापात्र ने कहा कि 15 अगस्त 1947 को हमें स्वाधीनता मिली। स्वाधीनता के 78 वर्ष बाद भी हमारा तंत्र स्व आधारित नहीं बन पाया है। अर्थात हमारे स्वाधीन होने के इतने वर्षों बाद भी हमारी शासन व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन नहीं हो सका। केवल स्वाधीन होना पर्याप्त नहीं है। समाज के सभी क्षेत्रों में हमारी पहचान स्थापित होना आवश्यक है। हमारा परिचय अर्थात भारतीयता का परिचय। प्रत्येक क्षेत्र में हमारी सभ्यता, संस्कृति और परंपराओं की विशिष्टता स्थापित होना आवश्यक है। इसे ‘स्व बोध’ कहा जाता है।
भारत की पहचान पर संकट
उन्होंने कहा कि भारत वर्ष विदेशी दासता की जंजीरों से ऐसे ही मुक्त नहीं हुआ है। स्वातंत्र्यवीर सावरकर, मदनलाल ढिंगरा, उधम सिंह, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु,जयी राजगुरु, बक्सी जगबंधु, वीर सुरेन्द्र साए, देवी जैसे अनगिनत स्वतंत्रता सेनानियों और बलिदानियों के रक्त के कारण भारत को स्वाधीनता मिली। महापात्र ने कहा कि स्वाधीनता से स्वतंत्रता की यात्रा है और इस यात्रा को हमें तय करना पड़ेगा। इसका आधार ‘स्व बोध’ है। भारत पर अनेक हमलावरों ने हमला किया औरवे सभी भारत को गुलाम बनाना चाहते थे। लेकिन वर्षों तक वे पूरे भारत को पराधीन नहीं कर सके। परिस्थिति को देखते हुए वे इस निष्कर्षपर पहुंचे कि भारत का परिचय और इसकी पहचान को परिभाषित करने वाले तत्वों को जब तक ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक भारत को गुलाम बनाया जाना संभव नहीं है। इस कारण उन्होंने तय किया कि भारत को भारत होकर रहने नहीं दिया जाएगा। यदि भारत की पहचान उसकी शिक्षा, संस्कृति और सभ्यता को ध्वस्त कर दिया जाता है, तब भारत का स्वाभिमान मिट्टी में मिल जाएगा और भारत को गुलाम बनाना सहज होगा।
स्वदेशी ज्ञान और सांस्कृतिक गौरव पर जोर
हमारे वीरों और स्वतंत्रता सेनानियों केमन में दृढ़ इच्छाशक्ति थी कि वे देश के स्वाभिमान और ‘स्व’ की भावना को समाप्त नहीं होने देंगे। इसलिए उन्होंने अपने प्राणों की आहुति दी। हमें उस ‘स्व बोध’ के आधार पर आगे बढ़ना है। तन्मय महापात्र ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य विज्ञान, अर्थशास्त्र, व्यावसायिक ज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान में स्वदेशी ज्ञान का उपयोग आज की आवश्यकता है। कार्यक्रम की अध्यक्षता केन्दुझर जिला संघचालक भागिरथी पृष्टि ने की। दूसरे सत्र की अध्यक्षता जिला कार्यवाह बिनोद महांत ने की, जिसमें विभाग के बौद्धिक प्रमुख सत्य रंजन महाकुड मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित हुए। उन्होंने भारत के गौरवशाली अतीत, वर्तमान और भविष्य पर अपने विचार व्यक्त किए। उनका कहना था कि भारत की शिक्षा, विज्ञान, स्वास्थ्य और वैज्ञानिक परंपरा का एक समृद्ध इतिहास रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि आज भी इंडोनेशिया, कंबोडिया, फिलीपींस और वियतनाम जैसे देशों में हिंदू संस्कृति का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है।
सत्य रंजन महाकुड ने कहा कि वर्तमान में भारत एक विकसित युग की ओर अग्रसर है, और हमारा सपना है कि आने वाले समय में भारत सभी क्षेत्रों में आत्मनिर्भर और समृद्ध बनकर विश्व गुरु के स्थान पर प्रतिष्ठित हो। इसी उद्देश्य के साथ, उन्होंने युवाओं से राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। कार्यक्रम के दौरान विभिन्नयुवा प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया। इस युवा सम्मेलन का संचालन जिला महाविद्यालय प्रमुख मलय कुमार खंडा ने किया।
















