Bangladesh: जमात ए इस्लामी बहा रही घड़ियाली आंसू, कुकर्मों के लिए माफी मांगी!
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Bangladesh: कट्टर मजहबी Jamaat-e-Islami बहा रही घड़ियाली आंसू, शफीकुर्रहमान ने ​पार्टी के कुकर्मों के लिए माफी मांगी!

जमात-ए-इस्लामी पर लाखों लोगों की हत्या, बलात्कार और जबरन पलायन के आरोप हैं, जिन्हें बाद में बांग्लादेश सरकार ने 'युद्ध अपराध' घोषित किया था। 1971 के बाद पार्टी पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब उसके कई नेता पाकिस्तान चले गए या भूमिगत हो गए थे

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Nov 4, 2025, 03:16 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
शफीकुर्रहमान (File Photo)

शफीकुर्रहमान (File Photo)

कट्टर इस्लामवादी देश बन चुके बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी (जेईआई) अब चुनाव की आहट सुन शैतानी चालें चल रही हैं। असली लिबास को ढकने के लिए मासूमियत का चोला ओढ़ने की कोशिश करने वाली, पूर्वी बंगाल में पाकिस्तान की बर्बर फौज के साथ मिलकर आम इंसानों को काट डालने वाली इस जमात-ए-इस्लामी का मुखिया हाल में न्यूयार्क गया था। वहां इस मुखिया शफीकुर्रहमान ने पत्रकारों के सामने मासूम चेहरा बनाकर कहा कि उनकी पार्टी के इतिहास से कई विवादित मुद्दे जुड़े हैं जिस पर हम सार्वजनिक रूप से माफी मांगते हैं। उसने कहा कि 1947 से अब तक, जिसे भी हमारी वजह से कोई तकलीफ या नुकसान पहुंचा हो उससे हम दिल से माफी मांगते हैं। शफीकुर्रहमान का यह बयान न सिर्फ पार्टी के कट्टर मजहबी रुख से ठीक उलट है, बल्कि बांग्लादेश की राजनीति में एक हैरतअंगेज घटनाक्रम माना जा रहा है। वहां आगामी फरवरी में आम चुनाव होने हैं।

आखिर ऐसा क्या किया था जमात-ए-इस्लामी ने जो चुनाव से ठीक पहले उसे गिरगिट की तरह रंग बदलने पर मजबूर होना पड़ा है। असल में यही जमात है जिसने 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान पाकिस्तान का साथ दिया था। इसी ने स्थानीय जनता, विशेषकर देशभक्त बंगालियों व हिन्दुओं पर हिंसा, हत्या और अन्य युद्ध अपराधों का कहर ढाया था। पाकिस्तान की बर्बर फौज के साथ हाथ मिलाकर निमर्मता की हदें पार की थीं। जानकारों का मानना है कि इन हरकतों को शफीकुर्रहमान बखूबी जानता है और यह भी जानता है कि बांग्लादेश के लोग इस आतताई पार्टी की पाशविकता को भूले नहीं हैं। इसलिए उसने इस स्तर पर जाकर सार्वजनिक माफी मांगने की चाल चली है।

शफीकुर्रहमान ने अपने बयान में साफ कहा है कि यह माफी किसी एक घटना, साल या समुदाय विशेष तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘हर उस मौके के लिए है जब किसी को भी जमात-ए-इस्लामी की वजह से कष्ट पहुंचा है’। यानी पार्टी ने 1947 के विभाजन, पूर्वी पाकिस्तान काल, 1971 के युद्ध और उसके बाद के किसी भी दौर में हुई गलतियों की जवाबदेही सार्वजनिक रूप से स्वीकार की है।

न्यूयार्क में शफीकुर्रहमान

जैसा पहले बताया, चुनावों की आहट सुनकर माफी मांगने का यह पैंतरा साफ बताता है कि जमात-ए-इस्लामी अपनी दागदार छवि को सुधारने, नई पीढ़ी व अन्य समुदायों में भरोसा बहाल करने की नाकाम कोशिश कर रही है। कारण यह कि उसके अपराध इस स्तर के हैं ही नहीं कि उसके लिए शफीकर्रहमान माफी तक मांग सके। स्वाभाविक ही, बांग्लादेश के राजनीतिक गलियारों में इस माफी पर बहस छिड़ गई है। आलोचक जहां इसे चुनावी रणनीति मान रहे हैं, वहीं कुछ इसे ‘असल पश्चाताप’ बता रहे हैं।

लेकिन अल्पसंख्यकों की प्रतिक्रिया मिलीजुली दिख रही है। पार्टी की बर्बर हरकतों से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे अल्पसंख्यक समुदायों को माफी की बात पर है कि सिर्फ बयान दे देने से न्याय नहीं मिलने वाला, जमीन पर बदलाव दिखना जरूरी है।

जमात-ए-इस्लामी पर युद्ध अपराधों, समाज में दूरियां पैदा करने और मजहबी कट्टरता फैलाने के आरोप दशकों से लगते रहे हैं। बांग्लादेश की पूर्ववर्ती हसीना सरकार ने इस पार्टी के कई नेताओं को युद्ध अपराधों की सजा दी है, पार्टी का चुनावी पंजीकरण भी समाप्त कर दिया गया था।

यह माफी पार्टी की चुनावी समीकरण बैठाने, युवा मतदाताओं और आज के बांग्लादेश की लोकतांत्रिक उम्मीदों की कसौटी पर खरा दिखने की कवायद से बढ़कर कुछ नहीं है। यह बात तो तय है कि इस पार्टी की मजहबी कट्टर सोच में कोई बदलाव नहीं आएगा, क्योंकि उसका आधार ही मजहबी कट्टरता है। चोला बदलने का उसका यह कदम महज चुनावी स्वार्थ से ज्यादा कुछ नहीं है, यह मानने वालों की एक बहुत बड़ी आबादी है।

1971 जमात-ए-इस्लामी ने स्थानीय जनता, विशेषकर देशभक्त बंगालियों व हिन्दुओं पर हिंसा, हत्या और अन्य युद्ध अपराधों का कहर ढाया था

इस्लामवादी जमात-ए-इस्लामी पार्टी का वर्तमान ‘अमीर’ शफीकुर्रहमान ‘पुरानी गलतियों’ के लिए बिना शर्त माफी मांगने की बात न्यूयार्क में जाकर करता है तो उसके भी मायने हैं। वह अपने देश में तो ऐसा बोलने की अभी तक हिम्मत नहीं कर सका है क्योंकि पूरा देश उस पार्टी की असली सूरत को जानता है। अमेरिका इन दिनों अंदरखाने बांग्लादेश में कुछ ज्यादा ही दिलचस्पी ले रहा है, इसलिए संभव है शफीकुर्रहमान ने किसी लालच या दबाव में यह बयान दिया हो। गत दिनों यूएसएड का एक बड़ा अधिकारी बांग्लादेश गया था और उसके कुछ ही दिन बाद, पाकिस्तान हो आया है। उसके ये दौरे कुछ संकेत तो देते ही हैं। दोनों इस्लामी देशों पर अमेरिका के नीतिकार डोरे डाल रहे हैं, दुनिया के इस हिस्से में अपने अड्डे तलाश रहे हैं।

दरअसल, जमात-ए-इस्लामी का गठन 1941 में मौलाना अबुल अला मौदूदी ने किया था, जिसने इस्लाम को एक राजनीतिक व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किया था। विभाजन के बाद यह पार्टी पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) में भी सक्रिय रही। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में जब पूर्वी पाकिस्तान ने पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने का संघर्ष किया था, तब जैसा पहले बताया, जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान के पक्ष में खड़े होकर बंगाली राष्ट्रवादियों का विरोध किया था। इसके सदस्य पाकिस्तानी सेना की साठगांठ से कई बर्बर युद्ध अपराधों में शामिल पाए गए हैं।

इसी जमात के कार्यकर्ताओं ने तब ‘अल-बद्र’, ‘अल-शम्स’ जैसे कट्टर मजहबी संगठनों के माध्यम से पाकिस्तानी सेना के साथ मिलकर सशस्त्र कार्रवाई की। इसी ने बंगाली बुद्धिजीवियों, छात्रों और हिंदुओं को विशेष तौर पर निशाना बनाया था। पार्टी नेतृत्व ने एकीकृत मुस्लिम राज्य की हिमायत करते हुए पूर्वी पाकिस्तान के अलगाव का विरोध किया था। इसी जमात-ए-इस्लामी पर लाखों लोगों की हत्या, बलात्कार और जबरन पलायन के आरोप हैं, जिन्हें बाद में बांग्लादेश सरकार ने ‘युद्ध अपराध’ घोषित किया था। 1971 के बाद पार्टी पर प्रतिबंध लगाया गया था, तब उसके कई नेता पाकिस्तान चले गए या भूमिगत हो गए थे।

बांग्लादेश में युद्ध अपराधों की सुनवाई के लिए इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल गठित हुआ था। इसके तहत जमात-ए-इस्लामी पर हजारों आरोप लगे, कई नेताओं को मौत की सजा दी गई। लेकिन जमात-ए-इस्लामी लगातार अपने ऊपर लगे आरोपों को ‘राजनीतिक साजिश’ बता कर खारिज करती रही। आज भी कई विशेषज्ञों का मानना है कि जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में पाकिस्तानी हितों के एजेंडे को आगे बढ़ाती है।

Topics: पाकिस्तानBangladeshबांग्लादेशजमात-ए-इस्लामी1971jamat-e-islamiHindu Genocidemukti sangram
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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