देश में मतदाता लिस्ट को शुद्ध और स्पष्ट बनाने के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग के द्वारा देशभर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) कराने के फैसले के खिलाफ तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (डीएमके) ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। पार्टी के संगठन सचिव आर.एस. भारती ने 3 नवंबर 2025 को यह याचिका दाखिल की। उनका कहना है कि यह प्रक्रिया संवैधानिक सीमाओं से बाहर है और वास्तव में नागरिकों का राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) जैसी है। चुनाव आयोग ने 27 अक्टूबर को 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस दूसरे चरण की घोषणा की थी, जो 28 अक्टूबर से शुरू हो गया।
डीएमके झूठ फैला रही है कि इससे लाखों वोटरों को बिना ठीक से जांचे वोट देने से वंचित किया जा सकता है, जो लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के लिए खतरा है। याचिका वकील सौश्रिया हवेलिया ने तैयार की और सीनियर एडवोकेट एन.आर. एलंगो ने सेटल की। इसे एडवोकेट विवेक सिंह ने फाइल किया। यह एसआईआर के दूसरे चरण के खिलाफ पहली याचिका है।
डीएमके का झूठ-थोपा जा रहा एसआईआर
याचिका में कहा गया है कि बिना किसी राज्य से सलाह-मशविरा या जरूरी प्रशासनिक वजह बताए, इतना बड़ा, संसाधन खर्चीला और सामाजिक रूप से उथल-पुथल मचाने वाला कदम उठाना संविधान के संघीय ढांचे का उल्लंघन है। यह ढांचा संविधान की बुनियादी संरचना का हिस्सा है। तमिलनाडु में पहले ही स्पेशल समरी रिवीजन (एसएसआर) अक्टूबर 2024 से 6 जनवरी 2025 तक हो चुका था। इसमें माइग्रेशन, मौत और अयोग्य वोटरों को हटाने जैसे मुद्दे सुलझाए गए थे। वोटर लिस्ट 6 जनवरी 2025 को अपडेट होकर जारी हुई और उसके बाद भी लगातार अपडेट होती रही। फिर भी एसआईआर थोपने से राज्य को सिर्फ केंद्र के आदेशों का पालन करने वाला एजेंसी बना दिया गया, जो वोटरों को बिना वजह बाहर करने का खतरा पैदा करता है।
बिहार का उदाहरण
याचिकाकर्ता ने बिहार के एसआईआर का हवाला दिया, जहां रजिस्टर्ड वोटरों को बड़े पैमाने पर बाहर किया गया। वहां 2003 की वोटर लिस्ट में न होने वालों को नागरिकता का सबूत देना पड़ रहा है। डीएमके का कहना है कि एसआईआर मौजूदा कानूनी ढांचे को बदलने की कोशिश कर रहा है। रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपल एक्ट (आरओपीए) 1950 या रजिस्ट्रेशन ऑफ इलेक्टर्स रूल्स 1960 में ऐसी प्रक्रिया का जिक्र नहीं है। आरओपीए की धारा 28(3) कहती है कि सारी रूल्स गजट में नोटिफाई होनी चाहिएं और संसद के सामने रखी जानी चाहिएं। एसआईआर के लिए ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसलिए यह कानूनी तौर पर अमान्य है।

















