अमोल मजूमदार की कहानी संघर्ष, धैर्य और सपनों की मिसाल है। वह खिलाड़ी जिसने खुद भारत के लिए कभी नहीं खेला, लेकिन कोच बनकर भारतीय महिला क्रिकेट टीम को विश्व कप जिताया। यह कहानी 1988 से शुरू होती है। उस समय अमोल सिर्फ 13 साल के थे और स्कूल क्रिकेट टूर्नामेंट हैरिस शील्ड में अपनी बारी का इंतजार कर रहे थे। उसी मैच में उनके साथी खिलाड़ी सचिन तेंदुलकर और विनोद कांबली ने 664 रनों की ऐतिहासिक साझेदारी की। दिन खत्म हो गया, पारी घोषित कर दी गई, लेकिन अमोल को बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला। यही इंतजार उनके जीवन का प्रतीक बन गया।
साल 1993 में अमोल ने मुंबई की ओर से फर्स्ट-क्लास क्रिकेट में डेब्यू किया और पहली ही पारी में 260 रन ठोक दिए। यह तब किसी भी खिलाड़ी की डेब्यू पारी का विश्व रिकॉर्ड था। सभी को लगा कि वह भारत का अगला बड़ा बल्लेबाज बनेगा, लेकिन किस्मत ने उनके लिए कुछ और ही लिखा था। सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और वीवीएस लक्ष्मण जैसे दिग्गजों के दौर में उन्हें जगह नहीं मिली। करीब 20 साल लंबे करियर में अमोल ने 171 प्रथम श्रेणी मैच खेले, 11,167 रन बनाए और 30 शतक जड़े, लेकिन भारत के लिए एक भी मैच नहीं खेल सके। कई बार चयनकर्ताओं ने नजरअंदाज किया। 2002 में तो उन्होंने लगभग क्रिकेट छोड़ने का मन बना लिया था। तभी उनके पिता ने कहा – “खेल छोड़ना मत, तेरे अंदर अभी क्रिकेट बाकी है।” इस एक वाक्य ने उनका जीवन बदल दिया।
उन्होंने वापसी की और 2006 में मुंबई को रणजी ट्रॉफी जिताई। इसी दौरान उन्होंने एक युवा खिलाड़ी रोहित शर्मा को पहला मौका दिया। अमोल के खेल में अनुशासन और सोच में गहराई थी। शायद यही वजह है कि वह बाद में एक शानदार कोच बने। 2014 में क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद उन्होंने कोचिंग शुरू की। उन्होंने नीदरलैंड, दक्षिण अफ्रीका और राजस्थान रॉयल्स जैसी टीमों के साथ काम किया। अक्टूबर 2023 में उन्हें भारतीय महिला क्रिकेट टीम का मुख्य कोच नियुक्त किया गया। तब बहुत से लोगों ने सवाल उठाए, जिसने भारत के लिए कभी नहीं खेला, वो टीम को कैसे सिखाएगा? लेकिन दो साल बाद उन्होंने सबका जवाब अपने काम से दिया।
2025 महिला वनडे विश्व कप में भारत ने इतिहास रच दिया। फाइनल में भारत ने दक्षिण अफ्रीका को 52 रनों से हराकर पहली बार विश्व कप जीता। भारत ने पहले बल्लेबाजी करते हुए 50 ओवर में 298 रन बनाए और दीप्ति शर्मा ने शानदार गेंदबाजी करते हुए चार विकेट झटके। यह जीत अमोल मजूमदार के नेतृत्व की वजह से संभव हुई। टूर्नामेंट के शुरुआती चरण में जब भारत लगातार हार रहा था, तब मजूमदार ने टीम से सख्त लेकिन प्रेरणादायक बात की। कप्तान हरमनप्रीत कौर ने बाद में कहा – “सर जो भी कहते हैं, दिल से कहते हैं।” उस एक बातचीत ने पूरी टीम का आत्मविश्वास लौटा दिया।
सेमीफाइनल में ऑस्ट्रेलिया को हराने से पहले उन्होंने ड्रेसिंग रूम की बोर्ड पर लिखा – “हमें उनसे बस एक रन ज्यादा चाहिए।” यह वाक्य टीम के मन में बस गया, और भारत ने महिलाओं के क्रिकेट इतिहास का सबसे बड़ा रन चेज़ कर दिखाया। फाइनल जीतने के बाद जब सब खिलाड़ी जश्न मना रहे थे, तब अमोल शांत खड़े थे। उनकी आंखों में खुशी के साथ पुराना दर्द भी झलक रहा था, आखिर उनकी कहानी अब पूरी हो चुकी थी। जिस बच्चे को 13 साल की उम्र में बल्लेबाजी का मौका नहीं मिला था, वही आज कोच बनकर अपनी टीम को जीत का मौका दे रहा है। कभी जो इंतजार उनका सबसे बड़ा दर्द था, वही अब उनकी पहचान बन गया है।

















