आज हम जिस विशाल भारत को देखते हैं, उसकी कल्पना भी सरदार वल्लभ भाई पटेल के बिना नहीं की जा सकती थी। आचार्य विष्णुगुप्त ( चाणक्य) के बाद यदि किसी ने संपूर्ण भारत के एकीकरण का स्तुत्य प्रयास किया तो वे थे लौह-पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल। आधुनिक काल की बात करें तो जिस तरह जर्मनी के एकीकरण में ‘बिस्मार्क’ ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी; ठीक उसी तरह सरदार वल्लभ भाई पटेल ने भी आजाद भारत को एक विशाल राष्ट्र बनाने में उल्लेखनीय योगदान दिया। आधुनिक भारत के निर्माता सरदार वल्लभ भाई पटेल सही मायने में राष्ट्रीय एकता के बेजोड़ शिल्पी थे। अप्रतिम साहसिक कार्यों के कारण कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें ‘‘लौह पुरुष’’ और ‘‘सरदार’’ जैसे उपाधियों से अलंकृत किया था।
स्वतंत्रता से पहले रियासतों के विलय की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
वर्ष 1947 के पहले छह महीने भारत के इतिहास में अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। यह वह दौर था जब साम्राज्यवादी शासन के साथ-साथ भारत का विभाजन अपने अंतिम चरण में था। तब यह तस्वीर पूरी तरह से साफ नहीं थी कि क्या देश का एक से अधिक बार विभाजन होगा? कीमतें आसमान पर पहुंच गई थीं, खाद्य पदार्थों की कमी आम बात थी। लेकिन सबसे बड़ी चिंता भारत की एकता को लेकर थी। इस पृष्ठभूमि में ‘गृह विभाग’ का गठन वर्ष 1947 के जून महीने में किया गया। इस विभाग का प्रमुख लक्ष्य देश की उन 565 रियासतों के भारतीय गणराज्य में विलय के साथ उनके रिश्तों के बारे में बातचीत करना था, जिनके आकार, आबादी, भू-भाग व आर्थिक स्थितियों में काफी भिन्नताएं थीं। उस समय महात्मा गांधी ने कहा था कि ‘राज्यों की समस्या इतनी ज्यादा विकट है कि सिर्फ ‘आप’ ही इसे सुलझा सकते हैं।’
रियासतों के विलय में लौह पुरुष का अदम्य संकल्प
काबिलेगौर हो कि यहां पर ‘आप’ से उनका आशय सरदार वल्लभभाई पटेल से था। समय काफी कम था और जवाबदेही बहुत बड़ी; लेकिन इसे अंजाम देने वाली शख्सियत भी कोई साधारण नहीं थी। सरदार पटेल इस बात के लिए दृढ़-प्रतिज्ञ थे कि वह किसी भी सूरत में राष्ट्र को झुकने नहीं देंगे। उन्होंने और उनकी टीम ने एक-एक करके सभी रियासतों से बातचीत कर उनको ‘आजाद भारत’ का अभिन्न हिस्सा बनाना सुनिश्चित किया। यह सरदार पटेल की दृढ़ इच्छाशक्ति, नेतृत्व कौशल और रणनीतिक चातुर्य का ही कमाल था कि 562 देशी रियासतों का भारत में विलय हो सका। जरूरत पड़ने पर वे कभी बल प्रयोग से भी नहीं चूके। हैदराबाद के निजाम ने जब एक भारत की अवधारणा को नहीं माना तो पटेल ने सेना उतारकर उसका घमंड चूर कर दिया। ‘ऑपरेशन पोलो’ नाम का यह सैन्य अभियान पूरी तरह सफल रहा और इस तरह हैदराबाद भारत का हिस्सा बन गया। जूनागढ़ के लिए भी उन्होंने यही रास्ता अख्तियार किया। लक्षद्वीप समूह को भी भारत के साथ मिलाने में पटेल की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। सरदार पटेल कश्मीर को भी बिना शर्त भारत में जोड़ना चाहते थे पर नेहरू जी ने हस्तक्षेप कर कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया। नेहरू जी की हठधर्मिता के कारण कश्मीर की समस्या अंतर्राष्ट्रीय समस्या बन गयी थी। नेहरू जी अगर चाहते तो वह कश्मीर को भी सरदार पटेल को सौंप उसका पूर्ण विलय बिना किसी शर्त पर करा सकते थे।
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संघर्षों से निकलकर बने राष्ट्र के लौहपुरुष
31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में कृषक पिता झवेरभाई पटेल व माता लाडबा पटेल की चौथी संतान के रूप में जन्मे वल्लभ भाई पटेल का समूचा जीवन संघर्षों में बीता। करमसद के प्राथमिक विद्यालय और पेटलाद स्थित उच्च विद्यालय से शिक्षा प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपनी अधिकांश शिक्षा खुद स्वाध्याय से ही अर्जित की। जब वे 17 साल के थे तब उनकी शादी गना गांच की रहने वाली झावेर बा से हो गयी थी। 22 साल की उम्र में मैट्रिक की परीक्षा पास कर वह बैरिस्टर की पढ़ाई के लिए लंदन गये। सन् 1913 में वापस आकर उन्होंने अहमदाबाद में एक वकील के रूप में अपनी कानूनी प्रैक्टिस शुरू कर दी तथा शीघ्र ही सफल आपराधिक वकील के रूप में समूचे क्षेत्र में अपनी धाक जमा ली। बताते चलें कि यह वह समय था जब महात्मा गांधी देश की आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ असहयोग आन्दोलन छेड़े हुए थे। सन् 1926 में उनकी भेंट गांधी जी से हुई और वे स्वाधीनता आंदोलन में कूद पड़े।
किसानों के हक के लिए अडिग सरदार
साल 1928 में गुजरात में बारडोली सत्याग्रह हुआ जिसका नेतृत्व वल्लभ भाई पटेल ने किया। यह प्रमुख किसान आंदोलन था। उस समय प्रांतीय सरकार किसानों से भारी लगान वसूल रही थी। सरकार ने लगान में 30 फीसदी वृद्धि कर दी थी। जिसके चलते किसान बेहद परेशान थे। वल्लभ भाई पटेल ने सरकार की मनमानी का कड़ा विरोध किया। सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने की कोशिश में कई कठोर कदम उठाए। लेकिन अंत में विवश होकर सरकार को पटेल के आगे झुकना पड़ा और किसानों की मांगे पूरी करनी पड़ी। दो अधिकारियों की जांच के बाद लगान 30 फीसदी से 6 फीसदी कर दिया गया। बारडोली में किसान आंदोलन का सफल नेतृत्व करने के कारण उनका नाम ‘सरदार’ पड़ा। जानना दिलचस्प हो कि इस आंदोलन की सफलता पर हर्षित होकर गांधी जी ने कहा था, ‘’जिस तरह रामकृष्ण परमहंस को विवेकानंद नाम का दुर्लभ नर रत्न मिला था, उसी तरह मुझे भी वल्लभ भाई के रूप में अमूल्य वस्तु प्राप्त हुई है।‘’ खेड़ा सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी ने सरदार पटेल के बारे में कहा था कि ”कई लोग मेरे पीछे आने के लिए तैयार थे, लेकिन मैं अपना मन नहीं बना पाया कि मेरा डिप्टी कमांडर कौन होना चाहिए। फिर मैंने वल्लभ भाई के बारे में सोचा।”
गौरतलब हो कि 1932 में वल्लभभाई पटेल की माताजी का निधन हुआ। उस समय वल्लभभाई 16 माह की सजा के दौरान गांधीजी के साथ यरवदा जेल में थे। अंग्रेज उन्हें कुछ शर्तों के साथ उनकी माताजी के अंतिम संस्कार में जाने की छूट देने को तैयार थे, लेकिन सरदार उनकी शर्तों को मानने को तैयार नहीं हुए। इस प्रकार वह अपनी माँ अंतिम संस्कार तक में भी नहीं गये। बड़े भाई विट्ठलभाई के अंतिम संस्कार में भी इन्हीं शर्तों के कारण शामिल नहीं हुए। ऐसा था इस महामानव का चट्टानी व्यक्तित्व।
भारत की एकता और राष्ट्रवाद के शिल्पी- सरदार पटेल
वे अनुभवी प्रशासक थे। उन्होंने अहमदाबाद में स्वच्छता कार्य को आगे बढ़ाने में सराहनीय कार्य किए। उन्होंने पूरे शहर में स्वच्छता और जल निकासी प्रणाली सुनिश्चित की। उन्होंने सड़क, बिजली तथा शिक्षा जैसी शहरी अवसंरचना के अन्य पहलुओं पर भी जोर दिया। आज यदि भारत जीवंत सहकारिता क्षेत्र के लिए जाना जाता है तो इसका श्रेय सरदार पटेल को जाता है। ग्रामीण समुदायों, विशेषकर महिलाओं को सशक्त बनाने का उनका विजन अमूल परियोजना में दिखता है। यह सरदार पटेल ही थे, जिन्होंने सहकारी आवास सोसायटी के विचार को लोकप्रिय बनाया और इस प्रकार अनेक लोगों के लिए सम्मान और आश्रय सुनिश्चित किया। वह किसान पुत्र थे और भारत के किसानों की उनमें प्रगाढ़ आस्था थी। श्रमिक वर्ग उनमें आशा की किरण देखता था तथा व्यापारी और उद्योगपतियों ने उनके साथ इसलिए काम करना पसंद किया, क्योंकि वे समझते थे कि सरदार पटेल भारत के आर्थिक और औद्योगिक विकास के विजन वाले दिग्गज नेता हैं। उनके राजनीतिक मित्र भी उन पर भरोसा करते थे। आचार्य कृपलानी का कहना था कि जब कभी वह किसी दुविधा में होते और यदि बापू का मार्गदर्शन नहीं मिल पाता था, तो वह सरदार पटेल का रुख करते थे।
“एकता के प्रतीक सरदार पटेल: राजनीति से परे राष्ट्रहित के प्रतीक”
इस अप्रतिम राष्ट्र नायक की बहुमूल्य विरासत का उत्सव मनाने के लिए समूचा देश प्रति वर्ष 31 अक्टूबर को उनकी जयंती एकता दिवस के रूप में मनाता है। बकौल प्रधानमंत्री मोदी, “आज हम कश्मीर से कन्याकुमारी, अटक से कटक और हिमालय से महासागर तक हर तरफ जो तिरंगा लहराता देख रहे हैं, उसका पूरा श्रेय सरदार वल्लभभाई पटेल को जाता ही है।” ऐसे महान पुरूष की विचारधारा को राजनीति व जातिवाद के चश्मे से तौला जाना निःसंदेह शर्मनाक है। आजादी के बाद 65 वर्षों से देश में शासन करने वाले दलों ने जिन सरदार पटेल का कोई सम्मान नहीं किया लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उनके नाम से विशाल स्मारक बनवाना कांग्रेसियों को बहुत बुरा लगा कि भाजपा व संघ परिवार वाले आखिर क्यों उन सरदार पटेल को मानने लगे, जिन्होंने महात्मा गांधी की हत्या के आरोप में संघ को प्रतिबंधित किया था! सचमुच यह अपने आप में बड़ा प्रश्न है। मगर इस प्रश्न के उत्तर के लिए अतीत का पुनरवलोकन जरूरी है।
जानना दिलचस्प हो कि दिसंबर 1947 में जयपुर और जनवरी 1948 में लखनऊ में दिए भाषणों में सरदार पटेल ने सार्वजनिक रूप से संघ के लोगों को देशभक्त बताते हुए कहा था कि दंडात्मक कानून की कार्रवाई गुंडों के खिलाफ की जाती है, देशभक्तों के विरुद्ध नहीं। 29 जनवरी, 1948 को पंजाब में दिए अपने एक भाषण में पंडित नेहरू ने संघ की तीखी आलोचना की थी लेकिन सरदार पटेल उस समय भी संघ की तारीफ कर रहे थे। मगर अगले ही दिन अचानक 30 जनवरी, 1948 को महात्मा गांधी की हत्या हो गयी तथा संघ भी संदेह के घेरे में आ गया। इस कारण गृहमंत्री सरदार पटेल को संघ पर पाबंदी लगानी पड़ी मगर व्यापक जाँच पड़ताल में निर्दोष साबित होने ने बाद सरदार पटेल ने यह छह माह स्वयं यह पाबंदी हटा दी थी। हालांकि नेहरू जी ऐसा नहीं चाहते थे किंतु सरदार वल्लभभाई पटेल, पुरुषोत्तम दास टंडन तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सरकार चलाने में संघ का सहयोग चाहते थे।

















