प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देश में ‘स्वदेशी स्टील’ अपनाने का आह्वान करते हुए इस्पात उद्योग को आत्मनिर्भर और पूर्णतः स्वदेशी बनाने की प्रेरणा दी। यह केवल नीति नहीं, बल्कि भारत की निहित औद्योगिक शक्ति को जगाने का संदेश है-वैसा ही जैसा जामवंत ने हनुमानजी को अपनी शक्ति का स्मरण कराया था। भारत के इस्पात क्षेत्र को भी अपनी क्षमता और आत्मविश्वास को पहचानना होगा ताकि स्वदेशी तकनीक से आत्मनिर्भर विकास संभव हो सके।

चेयरमैन, इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ प्लांट इंजीनियर्स डीएचसी एवं पूर्व संयुक्त निदेशक, स्टील अथॉरिटी इंडिया लिमिटेड
उद्योग जगत इस परिवर्तन के लिए तैयार है। इसके पीछे ठोस कारण हैं। पहला, स्वदेशी को अपनाना निर्भरता से दक्षता की ओर कदम बढ़ाना है। स्वतंत्रता के शुरुआती वर्षों में भारत के इस्पात उद्योग की नींव विदेशी सहयोग से रखी गई थी। इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी, बंगाल आयरन वर्क्स, विश्वेश्वरैया आयरन एंड स्टील और टाटा स्टील जैसे कुछ अग्रदूतों को छोड़ दें, तो अधिकांश सार्वजनिक एवं निजी इस्पात संयंत्र विदेशी डिजाइन व तकनीक पर आधारित थे। जैसे-राउरकेला स्टील प्लांट (जर्मन तकनीक), भिलाई, बोकारो और विशाखापत्तनम स्टील संयंत्र (सोवियत) दुर्गापुर स्टील प्लांट (ब्रिटिश) और सेलम स्टील प्लांट की स्थापना फ्रांसीसी विशेषज्ञता से हुई। एनएमडीसी, जेएसडब्ल्यू, जेएसपीएल जैसे उद्योग भी इन्हीं अंतरराष्ट्रीय प्रभावों से विकसित हुए।
प्रारंभिक चरण में भारत को इस्पात संयंत्रों की डिजाइन, इंजीनियरिंग, तकनीक, संचालन और रखरखाव के क्षेत्रों में सीमित अनुभव था। लेकिन पिछले सात दशकों में इन सभी संयंत्रों को संचालित करने, उनके रखरखाव और उन्हें आधुनिक बनाने के निरंतर प्रयासों से भारतीय लौह एवं इस्पात उद्योग ने इस्पात निर्माण के हर क्षेत्र में अनुपम व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लिया है। आज भारत इस्पात संयंत्रों के संचालन और रखरखाव में लगभग पूरी तरह आत्मनिर्भर है, कुछ विशेष तकनीकी क्षेत्रों को छोड़कर। तेजी से बदलती इस्पात तकनीकों के दौर में भी देश डिजाइन, तकनीक और परियोजना निष्पादन जैसे प्रमुख क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की दिशा में दृढ़ता से आगे बढ़ रहा है। अब समय है कि इन अनुभवों के आधार पर देश अपने दम पर स्वदेशी तकनीक से इस्पात उत्पादन में नई क्रांति लाए।

प्रतिभा की कमी नहीं
दूसरा, भारत का इस्पात क्षेत्र आज विश्व के सबसे बड़े तकनीकी कार्यबलों में से एक द्वारा संचालित है। लाखों कुशल अभियंता और धातुविज्ञानी पीढ़ियों से विकसित तकनीकी ज्ञान, नवाचार और समर्पण के साथ इस उद्योग की रीढ़ बने हुए हैं। उनकी दक्षता से संयंत्रों का संचालन न केवल प्रभावी, बल्कि आर्थिक रूप से भी सुदृढ़ हुआ है। भारतीय अभियंताओं ने देश और विदेश, दोनों में जटिल परियोजनाओं को सफलतापूर्वक पूरा कर अपनी वैश्विक योग्यता साबित की है। यही दक्ष मानव संसाधन भारत की सबसे बड़ी शक्ति है, जो उसे स्वदेशी विकास की दिशा में आगे बढ़ा रही है।
तीसरा कारण है-भारत की डिजाइन एवं इंजीनियरिंग विशेषज्ञता क्षमताएं। भारत की डिजाइन और इंजीनियरिंग कंपनियां, जैसे- मेकॉन, इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड (EIL) और एम.एन. दास्तूर के पास धातुकर्म डिजाइन और परियोजना परामर्श में छह से अधिक दशकों का अनुभव है। इन कंपनियों ने इस्पात संयंत्रों की संपूर्ण डिजाइन, उपकरण विशिष्टता, परियोजना प्रबंधन और एकीकृत इस्पात संयंत्रों की कमीशनिंग अपनी दक्षता पहले ही सिद्ध कर दी है, लेकिन अधिकतर कार्य सीमित क्षमता वाले संयंत्रों तक ही सीमित रहा है।
इसका मतलब है कि भारत के पास पहले से ही वह मूलभूत इंजीनियरिंग ढांचा मौजूद है, जो स्वदेशी इस्पात तकनीक के डिजाइन और विकास के लिए आवश्यक है। एक स्पष्ट नीतिगत दिशा इन इंजीनियरिंग कंपनियों को स्वदेशी डिजाइन, स्वच्छ प्रौद्योगिकी और लागत-कुशल संयंत्र इंजीनियरिंग के अगले चरण का नेतृत्व करने के लिए सशक्त बना सकती है।
चौथा कारण है- भारत के पास विश्वस्तरीय तकनीकी संस्थानों और अकादमिक क्षमता। तकनीकी संस्थानों का जाल, जैसे-आईआईटी, एनआईटी, आईआईएससी और विशेष इंजीनियरिंग विश्वविद्यालय विश्व के सबसे प्रतिभाशाली धातुविज्ञानी और अभियंताओं को तैयार कर रहा है। ये संस्थान ‘स्वदेशी स्टील’ अभियान के लिए सबसे मूल्यवान संपत्ति हैं। इन्हें उद्योग से जुड़े तकनीकी इनक्यूबेटर, अनुसंधान कार्यक्रमों और बड़े स्तर की परियोजनाओं पर प्रशिक्षण के माध्यम से जोड़ा जा सकता है।
इंजीनियरिंग शिक्षा के कई क्षेत्रों में अब व्यावहारिक शिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जा रहा है, जहां डिजाइन, संयंत्र निर्माण, संचालन और रखरखाव जैसे विषय पढ़ाए जा रहे हैं। हालांकि, इस दिशा में और अधिक ध्यान और प्रोत्साहन की आवश्यकता है। विशेष रूप से, इस्पात प्रौद्योगिकी के लिए समर्पित संस्थानों की स्थापना आवश्यक है, ताकि लौह निर्माण, इस्पात निर्माण और रोलिंग तकनीकों में विषय-विशिष्ट विशेषज्ञता विकसित की जा सके।

दुनिया में भारतीय अभियंता, कंपनियां
पांचवां कारण, आज भारतीय अभियंता विश्वभर में प्रमुख इस्पात तकनीकी डिजाइन और इंजीनियरिंग कंपनियों का नेतृत्व कर रहे हैं। वे एसएमएस समूह, डेनियली, सिमन्स, पॉल वर्थ जैसी अग्रणी कंपनियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जो भारत की क्षमता और विश्वसनीयता का स्पष्ट प्रमाण है। यानी, भारत बड़े इस्पात संयंत्रों की मौजूदा तकनीकों के साथ-साथ भविष्य की नई तकनीकों के विकास में सक्षम है। भारतीय अभियंता वैश्विक स्तर पर संचालन और रखरखाव के सर्वश्रेष्ठ विशेषज्ञ हैं। कॉर्पोरेट क्षेत्र में भारतीय कंपनियां पहले से ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काम कर रही हैं, जैसे- आर्सेलर मित्तल, जो मित्तल परिवार के नेतृत्व में विश्व के सबसे बड़े इस्पात उत्पादकों में से एक है। जेएसडब्ल्यू स्टील की संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रमुख उपस्थिति है।
जेएसपीएल ओमान और अन्य देशों में अपने संयंत्र संचालित कर रहा है। इसी तरह, नीदरलैंड और ब्रिटेन में टाटा स्टील यूरोप अपनी इकाइयां संचालित कर रहा है। सौभाग्य से, इन शीर्ष वैश्विक इस्पात संचालन का प्रबंधन मुख्यतः भारतीय पेशेवरों द्वारा किया जाता है, जिन्हें कार्यकुशलता और प्रबंधन क्षमता के लिए विश्व स्तर पर सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इन विशेषज्ञों का अंतरराष्ट्रीय अनुभव भारत की तकनीकी परिपक्वता को समृद्ध कर चुका है। अब समय आ गया है कि इस अनुभव और दक्षता को देश के भीतर दिशा दी जाए, ताकि इसका उपयोग स्वदेशी विकास, आत्मनिर्भरता और स्वच्छ तकनीक के नेतृत्व के लिए किया जा सके।
छठा कारण-स्वदेशी उपकरण निर्माण और एमएसएमई क्षेत्र की परिपक्वता। भारत का सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) क्षेत्र, जो विश्व में सबसे बड़ा है, औद्योगिक प्रगति का एक मौन, किंतु सशक्त स्तंभ है। ये उद्यम इस्पात संयंत्रों में आवश्यक लगभग सभी प्रमुख उपकरणों और घटकों का डिजाइन, निर्माण और आपूर्ति करने में सक्षम हैं। भेल (BHEL), बेल (BEL), एल एंड टी और टाटा प्रोजेक्टस जैसी बड़ी भारतीय कंपनियां पहले ही देश और विदेश में ऊर्जा एवं इस्पात परियोजनाएं सफलतापूर्वक संचालित कर चुकी हैं और अब भारत में भी परिपक्व और अनुभवी हैं।
यदि इन्हें स्पष्ट दिशा और समन्वय मिले, तो ये निर्माण एवं विनिर्माण कंपनियां देश में इस्पात संयंत्रों की संपूर्ण प्रक्रिया-यथाक्रम निर्माण, संयोजन और कमीशनिंग स्वतंत्र रूप से संभाल सकती हैं। वर्तमान में कई उपकरण विदेशों से आयात किए जाते हैं, जैसे- ब्लास्ट फर्नेस चार्जिंग सिस्टम, निरंतर ढलाई मशीन, रोलिंग मिल स्टैंड व रोल, पुनः तापन भट्ठियां, कंप्रेसर, पंप और नियंत्रण प्रणालियां। हालांकि, इन सभी क्षेत्रों में भारत की तकनीकी और वित्तीय क्षमता पर्याप्त है, यदि ध्यान केंद्रित किया जाए तो इन उपकरणों का स्वदेशी निर्माण पूरी तरह संभव है।
ऐसे निपट सकते हैं चुनौतियों से
भले ही इस्पात उद्योग में भारत का सशक्त आधार है और विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश भी है, फिर भी पूरी आत्मनिर्भरता, विशेषकर उच्च क्षमता वाले इस्पात संयंत्रों के क्षेत्र में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं, जिन पर ध्यान देना आवश्यक है।
तकनीकी अंतर : उन्नत इस्पात निर्माण और रोलिंग तकनीकें अभी तक स्वदेशी रूप से विकसित नहीं की जा सकी हैं। इसके लिए वात भट्ठी डिजाइन, प्रत्यक्ष अपचयन (direct reduction), स्वचालन और स्वच्छ इस्पात निर्माण प्रक्रियाओं पर केंद्रित अनुसंधान एवं विकास आवश्यक है।

उपकरण संबंधी अंतर : उच्च प्रदर्शन वाले रोल्स, कंटीन्यूअस कास्टर मोल्ड्स और परिशुद्ध स्वचालन प्रणालियां अभी भी आयात की जाती हैं। इन क्षेत्रों में घरेलू विनिर्माण क्षमता का अभाव है, जिसे शीघ्र विकसित किया जाना चाहिए।
गुणवत्ता और निष्पादन : हालांकि, भारत संचालन में मजबूत है, परंतु परियोजना निष्पादन की गुणवत्ता और निरीक्षण प्रणालियों में सुधार की आवश्यकता है। भारत को गुणवत्ता सुनिश्चितता और स्वच्छ इस्पात परियोजना निष्पादन के लिए एक राष्ट्रीय रूपरेखा विकसित करनी होगी।
कच्चा माल और आयात पर निर्भरता : भारत बड़ी मात्रा में लौह अयस्क चूर्ण का निर्यात करता है, जो एक गंभीर आर्थिक हानि है। इसके अलावा, कोकिंग कोयला और कुछ धातुकर्म कच्चे पदार्थ भी आयात किए जाते हैं। इस स्थिति से निपटने के लिए ‘लाभवर्धन’, सिंटरिंग, पैलेटाइजेशन और भारतीय कोयले व अयस्क से कोक निर्माण की तकनीकें विकसित करनी होंगी, जिससे लागत प्रभावी और आत्मनिर्भर उत्पादन सुनिश्चित हो सके। जब अन्य आयातक देश लौह चूर्ण से ही हॉट मेटल बना सकते हैं, तो भारत क्यों नहीं? यह एक अत्यंत गंभीर मुद्दा है और इस प्रावधान के बिना किसी भी इस्पात परियोजना को वित्तपोषण नहीं मिलना चाहिए।
स्वच्छ इस्पात, स्वच्छ संयंत्र, स्वच्छ तकनीक : स्वदेशी मिशन का लक्ष्य देश में उत्पादन करना नहीं, बल्कि स्वच्छ व लागत प्रभावी उत्पादन सुनिश्चित करना भी होना चाहिए। भविष्य के प्रत्येक इस्पात संयंत्र को निम्न सिद्धांतों पर आधारित होना चाहिए-
स्वच्छ इस्पात : न्यूनतम अपशिष्ट के साथ ऊर्जा-कुशल, उच्च गुणवत्ता वाला उत्पादन।
स्वच्छ संयंत्र : पर्यावरण-संवेदनशील डिजाइन, जो शून्य उत्सर्जन, धूल-मुक्त संचालन और उच्च सुरक्षा सुनिश्चित करे।
स्वच्छ तकनीक : स्वदेशी नवाचारों के माध्यम से हरित ऊर्जा, अपशिष्ट ऊष्मा पुनर्प्राप्ति और कम कार्बन-तीव्रता को बढ़ावा दे। यह त्रिस्तरीय प्रतिबद्धता भारतीय इस्पात को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ बनाएगी।

ऐसे साकार होगा सपना
स्वदेशी स्टील के इस दृष्टिकोण को साकार करने के लिए एक सुव्यवस्थित और समयबद्ध कार्ययोजना आवश्यक है। स्वदेशी और स्वच्छ तकनीक के क्रियान्वयन के लिए कुछ ठोस कदम उठाने होंगे।
राष्ट्रीय सहयोग मंच : एक संघ का गठन किया जाना चाहिए, जिसमें सेल, टाटा स्टील, जेएसडब्ल्यू, जेएसपीएल की अनुसंधान एवं विकास इकाइयां, मेकॉन, ईआईएल, एमएन दास्तूर जैसे परामर्शदाता तथा आईआईटी, एनआईटी और तकनीकी विश्वविद्यालयों को शामिल किया जाए। इन सभी को विशिष्ट तकनीकी क्षेत्रों जैसे-वात भट्ठी डिजाइन से लेकर स्टील संयंत्रों की स्वच्छ ऊर्जा प्रणालियों तक की जिम्मेदारियां सौंपी जानी चाहिए।
इंजीनियरिंग शिक्षा सुधार : इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों में औद्योगिक प्रशिक्षण, संयंत्र डिजाइन और सतत विकास को शामिल किया जाना चाहिए। ‘स्वदेशी अभियंताओं’ की एक नई पीढ़ी का निर्माण करना होगा, जो नवोन्मेष और व्यावहारिक क्रियान्वयन-दोनों में दक्ष हो।
वैश्विक भारतीय प्रतिभा का उपयोग : विदेशों में तकनीकी कंपनियों में कार्यरत भारतीय अभियंताओं को प्रेरित किया जाए कि वे राष्ट्रीय परियोजनाओं, परामर्श सेवाओं या संयुक्त उपक्रमों के माध्यम से भारत में योगदान दें। इससे वैश्विक सर्वोत्तम तकनीकी अनुभव व प्रथाएं भारत तक पहुंच सकेंगी।
अनुसंधान एवं विकास में अनिवार्य निवेश : हर इस्पात निर्माता को अनुसंधान एवं विकास के लिए एक निश्चित बजट निर्धारित करना चाहिए, विशेष रूप से स्वच्छ इस्पात, पर्यावरण संरक्षण और ऊर्जा-कुशल तकनीकों के लिए। परियोजनाओं की स्वीकृति इस शर्त के पालन पर निर्भर होनी चाहिए।
वित्तीय और नीतिगत समर्थन : भारतीय रिजर्व बैंक तथा इस्पात मंत्रालय को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नई इस्पात परियोजनाओं में स्वदेशी तकनीकों का उपयोग हो, जैसे- beneficiation, pelletisation व भारतीय कोयले एवं नवीकरणीय ऊर्जा के माध्यम से स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन।
आयात प्रतिस्थापन रणनीति : सभी आयातित वस्तुएं, जैसे- चार्जिंग सिस्टम, ड्राइव्स, refractory materials आदि को ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत अभियान के अंतर्गत स्वदेशी रूप से विकसित किया जाए। हर उत्पाद के प्रदर्शन का मूल्यांकन सुनिश्चित हो ताकि स्वदेशी निर्माण गुणवत्ता में अंतरराष्ट्रीय स्तर प्राप्त कर सके।
स्वच्छ इस्पात मिशन-2035 : एक राष्ट्रीय मिशन ‘स्वच्छ और स्वदेशी इस्पात-2035’ शुरू किया जाना चाहिए, जिसका उद्देश्य अगले दस वर्ष में इस्पात उद्योग के अंतर वाले क्षेत्रों में डिजाइन, विनिर्माण और स्वच्छ उत्पादन तकनीकों में पूर्ण आत्मनिर्भरता प्राप्त करना हो।

भारत के लिए भविष्य का दृष्टिकोण
भारत पहले से ही विश्व का दूसरा सबसे बड़ा इस्पात उत्पादक देश है, लेकिन हमारी उत्पादन क्षमता अभी भी वैश्विक अग्रणी देश की तुलना में लगभग आधी है। इस अंतर को पाटने के लिए उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ तकनीक के स्वामित्व, पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ इस्पात नवाचार में नेतृत्व करने पर भी ध्यान देना होगा। स्वदेशी तकनीक, सक्षम परियोजना प्रबंधन और स्वच्छ संचालन के माध्यम से भारत टिकाऊ इस्पात निर्माण में वैश्विक अगुवा बन सकता है, जो अपनी आवश्यकताओं के साथ-साथ विश्व की मांग को भी पूरा कर सके। इसलिए प्रधानमंत्री का स्वदेशी आह्वान केवल एक आर्थिक नीति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक और राष्ट्रीय जागरण है।
हमारे पास ज्ञान, मानव संसाधन और संस्थागत क्षमता सब मौजूद हैं, जिससे हम अपने लिए स्वच्छ और दक्ष इस्पात संयंत्रों का डिजाइन, निर्माण, अभियांत्रिकी और संचालन कर सकते हैं। आवश्यकता केवल समन्वय, विश्वास और सामूहिक प्रयास की है। स्वच्छ इस्पात, स्वच्छ संयंत्र और स्वच्छ तकनीक में आत्मनिर्भर भारत का यह दृष्टिकोण कोई स्वप्न नहीं, बल्कि एक साकार होने योग्य नियति है। जिस दिन यह पूरा होगा, वह दिन नए भारत के औद्योगिक ‘राम राज्य’ की स्थापना का प्रतीक बनेगा-एक ऐसा भारत जो आत्मनिर्भर, टिकाऊ और विश्व में आदरणीय होगा।
















