
भारत को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आह्वान असल में एक राष्ट्रीय मिशन है। इसमें उन्होंने देशवासियों से स्वदेशी वस्तुओं को अपनाने, स्थानीय उद्योगों और कारीगरों का समर्थन करने का आग्रह किया है ताकि भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत हो, रोजगार बढ़े और आयात पर निर्भरता कम हो। इस आह्वान का मूल उद्देश्य महात्मा गांधी के ‘स्वदेशी अपनाओ’ और पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ‘अंत्योदय’ के दर्शन को वर्तमान युग में जीवंत करना है। स्वदेशी, विश्व में आर्थिक व तकनीकी क्षेत्र में उभरते भारत और टैरिफ युद्ध में अवसर जैसे विविध विषयों में पाञ्चजन्य की सलाहकार संपादक तृप्ति श्रीवास्तव ने स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह-संयोजक डॉ. अश्वनी महाजन के साथ विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं उस वार्ता के संपादित अंश
दीपावली जैसे त्योहारों में सस्ते विदेशी सामान के बीच लोग स्वदेशी उत्पादों को कैसे प्राथमिकता दें, यह कितनी बड़ी चुनौती है? अमेरिका की टैरिफ वॉर और वैश्विक हालात के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वदेशी और आत्मनिर्भरता के आह्वान को आप कैसे देखते हैं?
देखिए, स्वदेशी का विचार भारत में नया नहीं है। स्वामी दयानंद से लेकर 1905 के स्वदेशी आंदोलन तक यह आजादी की प्रेरणा रहा है। 1991 में स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना वैश्वीकरण के खतरे के बीच इसी सोच को आगे बढ़ाने के लिए हुई। कोई देश विदेशी पूंजी या वस्तुओं पर निर्भर रहकर विकसित नहीं हो सकता। इंग्लैंड, फ्रांस और अमेरिका ने आत्मनिर्भर नवाचारों से प्रगति की, जबकि चीन ने सस्ते उत्पादों से विश्व व्यापार का संतुलन बिगाड़ा और भारत-चीन व्यापार घाटा बढ़ा। इसके विरोध में स्वदेशी जागरण मंच ने 2017 में चीनी उत्पादों के बहिष्कार का अभियान और रामलीला मैदान में बड़ी रैली की। इससे देश में स्वदेशी के प्रति जागरूकता बढ़ी। आज अधिकांश देशभक्त चीनी सामान खरीदने से बचते हैं, क्योंकि वे सस्ते तो हैं पर टिकाऊ नहीं। इसके विपरीत, भारतीय उत्पाद मजबूत और लंबे समय तक चलने वाले होते हैं। हमारी मितव्ययिता सस्तेपन नहीं, बल्कि स्थायित्व की संस्कृति से जुड़ी है।
स्वदेशी अपनाना अब केवल भावना नहीं, बल्कि व्यावहारिक और पर्यावरणीय दृष्टि से भी जरूरी है। चीन ने सस्ते दामों पर सामान बेचकर कई भारतीय उद्योगों, जैसे सौर उपकरण निर्माण, को नुकसान पहुंचाया। सौर उद्योग इसका उदाहरण है। अब सरकार की डीसीआर नीति ने बदलाव आया है, जिसके तहत सरकारी परियोजनाओं में स्वदेशी कंपोनेंट्स का उपयोग अनिवार्य है। इसके परिणामस्वरूप विक्रम, वारी और अडानी जैसी कंपनियां स्वदेशी उत्पादन बढ़ा रही हैं। प्रधानमंत्री की सूर्य घर योजना से सौर उपकरण निर्माण को और प्रोत्साहन मिलेगा। इसलिए उपभोक्ताओं, उद्योगपतियों और निर्माताओं, सभी को स्वदेशी उत्पादन को प्राथमिकता देनी चाहिए।

1990 के दशक में वैश्वीकरण के दौर में चीन जैसे देश भारतीय बाजारों में कैसे हावी हो गए? क्या उस समय की नीतिगत कमी के कारण स्वदेशी उत्पादन कमजोर पड़ा?
चीन की आर्थिक रणनीति का असर केवल भारत पर नहीं, बल्कि पूरी दुनिया पर पड़ा। उसने योजनाबद्ध रूप से अतिरिक्त उत्पादन क्षमता बनाई और सस्ते उत्पादों के जरिए वैश्विक बाजारों पर कब्जा करने का लक्ष्य रखा। आज उसका सबसे बड़ा निर्यात अमेरिका को है, जबकि यूरोप, जापान और अफ्रीका में भी वह सस्ता सामान डंप करता है। 2001 में चीन के विश्व व्यापार संगठन में शामिल होने के बाद यह प्रभाव और बढ़ा, जिसका असर 2004 के बाद भारत पर स्पष्ट दिखा। वाजपेयी सरकार ने जो 24 प्रतिशत औसत आयात शुल्क लगाया था, यूपीए सरकार ने उसे घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया। इससे 2004 से 2014 के बीच चीन से आयात 3,000 प्रतिशत बढ़ गया। इससे इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलीकॉम, केमिकल्स, खिलौने और उपभोक्ता वस्तु उद्योग बुरी तरह प्रभावित हुए। इन सभी क्षेत्रों में चीन से आयात तेजी से बढ़ा। फार्मास्युटिकल क्षेत्र में भी यही हुआ। पहले एपीआई (कच्चा माल) का 90 प्रतिशत उत्पादन भारत में होता था, लेकिन सस्ते चीनी उत्पादों के कारण आयात निर्भरता बढ़ी। चीन ने पेनिसिलिन-जी जैसे एपीआई मात्र 9 डॉलर प्रति किलो में बेचकर भारतीय निर्माताओं को खत्म किया और बाद में कीमत 35 डॉलर कर दी। नीतिगत लापरवाही के कारण भारत चीन पर निर्भर होता गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में नई सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ अभियान शुरू किया। हालांकि कुछ आर्थिक विशेषज्ञ, जैसे नीति आयोग के तत्कालीन उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया, वैश्वीकरण के समर्थक थे और टैरिफ बढ़ाने के विरुद्ध राय रखते थे। फिर भी 2017 के बाद सरकार ने महसूस किया कि बिना संरक्षण उद्योग आत्मनिर्भर नहीं बन सकते। 2018 के बजट में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने घरेलू उद्योगों के संरक्षण हेतु आयात शुल्क बढ़ाने की घोषणा की। यह निर्णय आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी उत्पादन की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ। 1991 के बाद पहली बार किसी वित्तमंत्री ने अपने बजट भाषण में ‘संरक्षण’ शब्द का प्रयोग किया। भारत में उस समय यह तर्क दिया जाता था कि सस्ता विदेशी सामान जीवनस्तर सुधारता है, लेकिन इसके कारण उद्योग बंद हुए, रोजगार घटे और विदेशी निर्भरता बढ़ी। बढ़ते आयात से रुपया भी कमजोर हुआ, जबकि निर्यात अपेक्षित रूप से नहीं बढ़ा। वास्तव में सस्ती वस्तुएं नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर उद्योग और स्वदेशी उत्पादन ही स्थायी आर्थिक सशक्तिकरण का आधार हैं।
एक समय अमेरिकी डॉलर 12 रुपये के बराबर था, जो अब बढ़कर 88-89 रुपये हो गया है, फिर भी निर्यात में अपेक्षित बढ़ोतरी नहीं हुई। यदि इतने वर्षों के अवमूल्यन से निर्यात नहीं बढ़ा, तो आगे गिरावट से भी सुधार की संभावना कम है। भारत का आयात अधिकतर मूल्य-अलोचनीय है, जैसे तेल, मशीनरी और अन्य अनिवार्य वस्तुएं। इसलिए रुपये की कमजोरी से आयात घटता नहीं। निर्यात भी मूल्य-असवेदनशील हैं, जिससे अवमूल्यन का लाभ सीमित रहता है। इसलिए यह धारणा कि मुद्रा गिरने से निर्यात बढ़ेगा, भारत के संदर्भ में व्यावहारिक नहीं। स्वदेशी जागरण मंच का मत है कि समाधान रुपये का अवमूल्यन नहीं, बल्कि स्वदेशी उत्पादन को सशक्त बनाना और आत्मनिर्भर उद्योगों को बढ़ावा देना है। इसी में आर्थिक स्वराज्य और स्थिरता का मार्ग है।
स्वदेशी जागरण मंच की स्थापना के समय मुख्य चुनौती क्या थी? तब से अब तक इसने स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए किस दिशा में काम किया है?
हमने हमेशा स्वदेशी उत्पाद अपनाने और सरकार से स्वदेशी समर्थक नीतियां बनाने का आग्रह किया है। हमारा उद्देश्य विदेशी सामान को सीमित करना और आवश्यकतानुसार टैरिफ बढ़ाना है, अत्यधिक संरक्षण नहीं। स्वर्गीय अरुण जेटली जी ने जब टेलीकॉम और इलेक्ट्रॉनिक्स पर 10-20 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाया, तो देश में मोबाइल निर्माण शुरू हुआ। नतीजा, विदेशी मोबाइल आयात लगभग बंद हुए और आज भारत करीब 14-15 अरब डॉलर के मोबाइल फोन निर्यात कर रहा है। यह स्वदेशी नीतियों की बड़ी सफलता है।
उसी प्रकार, जब व्हाइट गुड्स पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ाई गई, तो देश में उनका उत्पादन तेजी से बढ़ा। 2017-18 में इलेक्ट्रॉनिक्स आयात 28 अरब डॉलर था, जो 2018-19 में घटकर 18 अरब डॉलर रह गया। डीसीआर नीति और मामूली टैरिफ वृद्धि जैसे बदलावों से इलेक्ट्रॉनिक्स और टेलीकॉम क्षेत्र में आयात घटा और निर्यात बढ़ा। आज सबको समझ में आ गया कि भारत के विकास, रोजगार वृद्धि और विकसित राष्ट्र बनने का एकमात्र मार्ग स्वदेशी है। दस वर्ष पहले तक रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की चर्चा नहीं होती थी। जब देश ने रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी मार्ग अपनाया, तो हमने आकाश और ब्रह्मोस मिसाइल, एंटी-ड्रोन सिस्टम, तेजस विमान और स्वदेशी इंजन जैसे कई उपलब्धियां हासिल कीं। हाल में भारत पर हजारों ड्रोन हमले हुए, लेकिन भारत में बनी जैन टेक्नोलॉजी की एंटी-ड्रोन प्रणाली ने एक भी ड्रोन को लक्ष्य भेदने नहीं दिया।
विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया कि भारत 2047 तक भी अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय के 25 प्रतिशत तक नहीं पहुंचेगा और अपनी तकनीक विकसित करना उसकी गलती होगी। उनका सुझाव था कि भारत विदेशी तकनीक ही अपनाए। लेकिन भारत ने इस सोच को गलत साबित किया। हमने अपनी तकनीक से यूपीआई, ब्रह्मोस, आकाश, एंटी-ड्रोन सिस्टम, चंद्रयान, 4जी और 5जी जैसी सफलताएं हासिल कीं, बिना किसी विदेशी मदद के। यह दिखाता है कि आत्मनिर्भरता और स्वदेशी नवाचार के बल पर भारत न केवल आगे बढ़ सकता है, बल्कि विश्व नेतृत्व की क्षमता रखता है। उदाहरण के लिए, विदेशी कंपनी रोश की एक कैंसर दवा की कीमत 18 लाख रुपये थी। पेटेंट समाप्त होने के बाद हैदराबाद की नैटको कंपनी ने वही दवा 48,000 रुपये में तैयार की। यह संभव हुआ हमारे पेटेंट कानून के कारण, जो मामूली बदलाव कर दोबारा पेटेंट लेने से रोकता है। स्वदेशी जागरण मंच के प्रयासों से यह प्रावधान मजबूत हुआ, जिससे भारतीय कंपनियां सस्ती और प्रभावी दवाएं बना सकीं। यह साबित करता है कि स्वदेशी नीति न केवल आत्मनिर्भरता बल्कि सामाजिक न्याय का भी माध्यम है।

भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान दुनिया ने हमारे ब्रह्मोस और आकाश की शक्ति देखी। हमारे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को कई देशों ने अपने यहां लागू करने की इच्छा जताई है। इसे आप कैसे देखते हैं? क्या अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा शुरू किए गए टैरिफ वॉर और वैश्विक व्यापार दबावों के बीच स्वदेशी मिशन और प्रधानमंत्री की आत्मनिर्भर नीति का जनमानस पर सकारात्मक असर पड़ा है?
मीडिया ने यह धारणा बना दी है कि टैरिफ बढ़ाने से निर्यात पर असर पड़ेगा, जबकि सच्चाई इसके विपरीत है। अब अमेरिका जितना भारत के लिए जरूरी है, उतना ही वह भारत पर निर्भर है। अगर अमेरिका कोई रोक लगाता भी है, तो सीमित क्षेत्र (कपड़ा, गारमेंट्स या जेम्स-ज्वेलरी) तक ही असर होगा। भारत का एक व्यापारी अकेले उतना बासमती चावल निर्यात करता है, जितना पूरा पाकिस्तान मिलकर करता है। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जो भारत की बढ़ती निर्यात क्षमता और आत्मविश्वास को दिखाते हैं।
बासमती चावल का वैश्विक बाजार लगभग भारत पर निर्भर है, उसका कोई विकल्प नहीं। इसी तरह, भारतीय दवाइयां विदेशी दवाओं से लगभग 200 गुना सस्ती हैं। निर्यातकों का मानना है कि अगर अमेरिका टैरिफ नहीं घटाता, तो भारत दवाइयां और बासमती चावल मध्य पूर्व और यूरोप को भेज देगा, अमेरिका को नहीं देगा। यदि वह चीन का साथ देता है, तो यह उसके अपने ही हितों को नुकसान पहुंचाने जैसा होगा। भारत आज एक वैश्विक शक्ति के रूप में संतुलन स्थापित कर रहा है। हम दुनिया से व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग चाहते हैं, पर आत्मसम्मान और बराबरी के आधार पर। यही दृष्टिकोण अपनाने के बाद दुनिया भारत की ओर आकर्षित हो रही है। भले ही हम पहले तीन औद्योगिक क्रांतियों से चूक गए हों, लेकिन चौथी क्रांति-स्पेस, डिफेंस, डिजिटल पेमेंट और टेलीकॉम तकनीक-के केंद्र में आज भारत मजबूती से खड़ा है। दुनिया अब भारत की प्रगति और तकनीकी क्षमता को स्वीकारने लगी है।
पहले हमें धमकाया जाता था कि “अगर आदेश नहीं माने तो स्विफ्ट से बाहर कर देंगे।” हमने जवाब दिया कि ठीक है, हम अपना यूपीआई आधारित वैकल्पिक पेमेंट सिस्टम बनाएंगे और आज वह सफलतापूर्वक काम कर रहा है। अब अमेरिका हमें प्रतिबंधों की धमकी नहीं देता। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भी भारत ने अपने हितों को सर्वोपरि रखा। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसी कार्रवाइयों ने दिखा दिया कि भारत अपने निर्णय खुद लेता है। हमारे स्वदेशी हथियारों की मांग इतनी बढ़ गई है कि उत्पादन अगले दस वर्ष तक भी उसकी भरपाई नहीं कर पाएगा। यही हमारी आत्मनिर्भरता की असली ताकत है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अभी भी डॉलर का दबदबा है। भारतीय रुपया अब 19 देशों में मान्य है और चीनी मुद्रा भी प्रभाव बढ़ा रही है। क्या दुनिया बहु-मुद्रा व्यवस्था की ओर बढ़ रही है? क्या डॉलर की यह वैश्विक मोनोपाॅली खत्म होगी?
अब व्यवस्था बदल रही है। जहां अमेरिका डॉलर और पेमेंट सिस्टम को नियंत्रित करता है, चीन दुर्लभ भू-खनिज और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला पर पकड़ बना रहा है। भारत इन सब से अलग राह पर है। भारत ने कभी संसाधनों या तकनीक को हथियार नहीं बनाया। हमने सबको वैक्सीन से लेकर वेंटिलेटर तक उपलब्ध कराए, चाहे कोई हमारा पक्षधर हो या नहीं। यही हमारी नीति है-समानता, सहयोग और स्वदेशी आत्मविश्वास।
हम चाहते हैं कि जैसे दुनिया में डॉलर के आधार पर लेन-देन होता है, वैसे ही भारतीय रुपये की भी अंतरराष्ट्रीय मान्यता बढ़े। दुर्भाग्य से पिछली सरकारों ने रुपये को वैश्विक व्यापार सेटलमेंट का हिस्सा नहीं बनने दिया, जिसे अब जाकर लागू किया गया है। नीतिगत बदलाव के बाद 20 देशों ने रुपया आधारित वेस्ट्रो अकाउंट खोले और रुपये में व्यापार शुरू हुआ। हालांकि चुनौती यह है कि भारत का व्यापार सभी देशों के साथ संतुलित नहीं है। जैसे-जैसे रुपये की अंतरराष्ट्रीय मान्यता बढ़ रही है, देश इसे आपसी व्यापार में इस्तेमाल करने लगे हैं। भारत ने रूस जैसे देशों को सुझाव दिया है कि वे अपने रुपये भंडार को निवेश के रूप में भारत में लगाएं, जैसे-यूरोप और अमेरिका के निवेशक भारतीय शेयर बाजार में करते हैं।
हम चीन की कंपनियों को ठेके नहीं देना चाहते, इसलिए रूस को अवसंरचना परियोजनाओं में भागीदारी के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। जहां तक डॉलर की बात है, राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियां स्वयं उसकी एकाधिकार स्थिति को कमजोर कर रही हैं, यह भारत के लिए अवसर है। हाल ही में एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा कि मित्र देशों का जमा धन अमेरिका अपने विकास कार्यों में उपयोग करेगा। इससे पहले भी अमेरिका ने रूस की जमा पूंजी पर कब्जा कर लिया था, जो अब तक किसी देश ने नहीं किया था। इस कदम से बाकी देशों में भी भय पैदा हुआ है। परिणामस्वरूप, कई राष्ट्र अपने फेडरल रिजर्व में जमा डॉलर निकालकर सोना खरीद रहे हैं, क्योंकि उन्हें डॉलर पर भरोसा नहीं रहा। सोने के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और देश इसे सुरक्षित निवेश मान रहे हैं। यह स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका अपनी नीतियों से खुद ही डॉलर की विश्वसनीयता कमजोर कर रहा है।

यूरो के बाद अब कई देश वैकल्पिक मुद्राओं की ओर बढ़ रहे हैं। ऐसे दौर में भारत ने रुपये की अंतरराष्ट्रीय मान्यता को बढ़ाने के दिशा में ठोस कदम उठाए हैं। किसी भी देश की मुद्रा तभी मजबूत होती है, जब उसकी उद्योग और तकनीक प्रगति कर रहे हों। आज भारत सेमीकंडक्टर, रेरा, टेलीकॉम और स्पेस जैसे क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। यदि हमें 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है, तो हमें स्वदेशी उत्पादन, तकनीक और वस्तुओं को अपनाकर आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करना होगा।
आज स्वदेशी का विचार केवल स्वदेशी जागरण मंच तक सीमित नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री से लेकर हर नागरिक तक इसका समर्थन कर रहा है। अब देश का हर बच्चा स्वदेशी की बात करता है। जिस तरह अरत्तई जैसे भारतीय एप ने वॉट्सएप का विकल्प प्रस्तुत किया और लाखों लोग रोज इससे जुड़ रहे हैं या मैपल्स जैसे प्लेटफॉर्म गूगल को चुनौती दे रहे हैं। यह दिखाता है कि भारत तकनीक में आत्मनिर्भर बन रहा है। गूगल, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट में अग्रणी भारतीय प्रतिभाएं अब भारत की ओर लौट रही हैं और यही स्वदेशी की असली सफलता है। जब भारत विकसित राष्ट्र बनेगा, तब हर भारतीय गर्व से कह सकेगा-हम एक गौरवशाली देश के नागरिक हैं।

















