ASEAN: क्या फिर नजदीक आएंगे US और China? 'Trade' पर क्या चाल चलेंगे Trump और Xi! बर्फ पिघलेगी या खिंचेंगी तलवारें?
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ASEAN: क्या फिर नजदीक आएंगे US और China? ‘Trade’ पर क्या चाल चलेंगे Trump और Xi! बर्फ पिघलेगी या खिंचेंगी तलवारें?

ट्रंप के नेतृत्व में चीन नीति में बदलाव ताइवान पर नीति में नरमी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन स्थापित करने के रूप में भी देखा जा रहा है

Written byAlok GoswamiAlok Goswami
Oct 27, 2025, 12:17 pm IST
in विश्व, विश्लेषण
चीन के उपप्रधानमंत्री ही लीफेंग (दाएं) और अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बीच हुई मलेशिया में व्यापार वार्ता

चीन के उपप्रधानमंत्री ही लीफेंग (दाएं) और अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के बीच हुई मलेशिया में व्यापार वार्ता

जहां कुछ दिन पहले तक चीन को लेकर अमेरिका नित नई टैरिफ धमकियां देते हुए इसे 100 फीसदी तक करने को तैयार हुआ था, अब उस तनातनी में कुछ बदलाव आता दिख रहा है। खासकर मलेशिया में ASEAN शिखर सम्मेलन के मौके पर अमेरिका और चीन के कारोबारी अधिकारियों की दो दिन की चर्चा और ‘कुछ मुद्दों पर सहमति’ के बाद आ रहे बयान बता रहे हैं कि जल्दी ही दक्षिण कोरिया में मिलने जा रहे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वार्ता संभवत: रिश्तों पर जमी बर्फ पिघला देंगे। बताया गया है कि अमेरिका और चीन के बीच व्यापार संबंधी कुछ महत्वपूर्ण सहमतियां बनी हैं। इन समझौतों से दोनों देशों के बीच सालों से चल रहे बहुचर्चित ट्रेड वॉर की तीव्रता कम होने के संकेत दिए गए हैं। बेशक, शी-ट्रंप वार्ता के लिए माहौल सकारात्मक नजर आ रहा है।

सवाल है कि क्या 2018 से ही चीन को लेकर शंकालु रहे ट्रंप चीन को एक नए नजरिए से देख रहे हैं? ट्रंप प्रशासन ने हाल में अनेक अवसरों पर में चीन के साथ संवाद को प्राथमिकता देने के संकेत दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने मलेशिया में खुलकर कहा कि वे चीन के साथ एक ‘गुड डील’ करने जा रहे हैं। कुछ हफ्ते पहले तक इन्हीं ट्रंप ने चीन के खिलाफ 100 फीसदी टैरिफ लगाने की धमकी दी थी, लेकिन अब ऐसा लगता है कि वे ‘व्यापारिक संतुलन और स्थिरता’ के लिए संवाद को आगे ला रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि ट्रंप शासन का यह नरम रुख अमेरिकी चुनावों, वैश्विक मंदी के भय तथा एशिया में स्थिरता चाहने की रणनीतिक जरूरत के चलते हो सकता है।

बयान बता रहे हैं कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की वार्ता रिश्तों पर जमी बर्फ पिघला देगी।  (File Photo)

जैसा पहले बताया, साल 2018 से शुरू हुई अमेरिका-चीन ‘ट्रेड वार’ दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती रही है, जिसमें तकनीकी, कृषि, स्टील, रेयर अर्थ मेटल्स और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में उपभोक्ताओं और कंपनियों पर असर पड़ा है। टैरिफ बढ़ने से वैश्विक आपूर्ति शृंखला में अड़चनें सामने आई हैं, निवेश और व्यापारिक भावनाएं प्रभावित हुई हैं तथा तकनीक और ऑटो क्षेत्रों में मंदी आई है। अब ताजा समझौते ने इस ‘ट्रेड वार’ को अस्थायी आराम दिया है, जिससे विश्व बाजार में स्थिरता की उम्मीद बंधी है।

साथ ही, चीन ने भी अपनी ओर से अमेरिकी कंपनियों को रेयर अर्थ मिनरल्स व अन्य महत्वपूर्ण सामग्रियों के निर्यात पर नियंत्रण लगाने की धमकी दी थी, जिसका सीधा असर वैश्विक तकनीक उद्योग और रक्षा क्षेत्र पर पड़ सकता था। नई सहमति के तहत यह नियंत्रण कम से कम एक वर्ष के लिए टाल दिया गया है, जिससे अमेरिकी तकनीकी, ऑटो और विमानन कंपनियों को राहत मिल सकती है।

यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि मलेशिया में इन दोनों पक्षों के बीच किन बिन्दुओं पर सहमति बनी है। इनमें प्रमुख हैं, एक, अमेरिका द्वारा 1 नवंबर से लागू होने वाले 100 फीसदी टैरिफ को टालना; दो, चीन द्वारा रेयर अर्थ मिनरल्स (दुर्लभ खनिज) और मैग्नेट्स पर निर्यात नियंत्रण को एक साल के लिए रोकना; तीन, फेंटेनाइल निर्माण और निर्यात को रोकने में सहयोग पर चर्चा; चार, कृषि उत्पादों के आयात/निर्यात में सामंजस्य बनाने की पहल करना; पांच, टिकटॉक जैसी अमेरिकी कंपनियों की बिक्री, संचालन और डेटा सुरक्षा पर अंतिम सम्मति की संभावनाएं जगना; छह, ट्रेड वॉर में मौजूदा ‘युद्धविराम’ इस व्यापार समझौते को आगे बढ़ाएगा।

दोनों पक्षों के अधिकारियों का कहना है कि समझौते का खाका लगभग तैयार है और शी-ट्रंप के बीच आमने—सामने की वार्ता के दौरान इस पर अंतिम हस्ताक्षर किए जा सकते हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ट्रंप प्रशासन का चीन के साथ संवाद और समझौते की ओर लौटना एक रणनीतिक और व्यावहारिक कदम है, जिससे वैश्विक व्यापार तंत्र में स्थिरता आने की संभावना है। मलेशिया में हुई सहमति दिखाती है कि दोनों राष्ट्र एक-दूसरे के आर्थिक हितों को ध्यान में रखते हुए, तनाव को टालकर व्यावहारिक समाधान चाहते हैं, हालांकि सभी विवादित मुद्दों का पूर्ण समाधान अभी शेष है।

‘ट्रेड वार’ का दबाव कायम तो है, परंतु यह तात्कालिक समझौता दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सक्रिय सहयोग और प्रतिस्पर्धा का नया आयाम साबित हो सकता है। ट्रंप की चीन नीति में हाल में आए इस बदलाव के कई प्रमुख कारण हैं, जिनमें वैश्विक आर्थिक दबाव और आपूर्ति शृंखला, विश्व अर्थव्यवस्था में तकनीक, रेयर अर्थ मिनरल्स और कच्चे तेल जैसे क्षेत्रों में चीन की निर्णायक भूमिका जैसे मुद्दे शामिल हैं।

लगता है, ट्रंप को महसूस हुआ है कि वैश्विक सप्लाई चेन को बाधित करके अमेरिकी उद्योग और उपभोक्ताओं पर भी उलटा प्रभाव पड़ रहा है। इसी कारण ट्रंप प्रशासन ने चीन से सुलह की प्रेरणा ली और टैरिफ व ‘ट्रेड वॉर’ के तीखेपन को कम करने की कोशिश की है।

इसके साथ ही, अमेरिकी तकनीकी और ऑटो कंपनियां चीन के रेयर अर्थ मिनरल्स और इलेक्ट्रॉनिक्स सप्लाई पर निर्भर हैं। चीन के निर्यात नियंत्रण से अमेरिकी कंपनियों की उत्पादन क्षमता कम हो रही थी, जिससे वहां आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ गया। इसलिए, ट्रंप ने व्यापार वार्ता की दिशा नरमी दिखाई है ताकि अमेरिका का आर्थिक विकास बना रह सके।

Representational Image

लेकिन सवाल यह भी है कि इन दोनों देशों की आगामी वार्ता में ताइवान और हिंद-प्रशांत रणनीति को लेकर भी कोई चर्चा होगी? ट्रंप के नेतृत्व में चीन नीति में बदलाव ताइवान पर नीति में नरमी और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन स्थापित करने के रूप में भी देखा जा रहा है। यह बदलाव क्षेत्रीय सहयोग बनाए रखने और भारत, जापान जैसे साझेदार देशों को साधे रखने की रणनीतिक जरूरत भी दर्शाता है। ताइवान के साथ रक्षा संवाद को टालना और पाकिस्तान के साथ गर्मजोशी, हो न हो, इसी संतुलन को साधने की नीति का हिस्सा है।

‘एनवीडिया’ जैसी अमेरिकी कंपनियों पर लगे प्रतिबंधों में संशोधन कर चीन को एआई चिप्स की आपूर्ति की अनुमति दी गई है। यह चीज अमेरिका की तकनीकी बढ़त बनाए रखने और चीनी सेना की निगरानी रखने से जुड़ी है। लेकिन यह रियायत एक प्रकार से सीधे-सीधे चीन का सहयोग भी है, जिसके पीछे उद्योगपतियों की लॉबी भी अहम भूमिका निभाती आ रही थी।

 

Topics: ASEANus china trade dealtrump xi talksचीनट्रंपmalaysia
Alok Goswami
Alok Goswami
A Delhi based journalist with over 25 years of experience, have traveled length & breadth  of the country and been on foreign assignments too. Areas of interest include Foreign Relations, Defense, Socio-Economic issues, Diaspora, Indian Social scenarios, besides reading and watching documentaries on travel, history, geopolitics, wildlife etc. [Read more]
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