“पहिले पहिल हम कईनी, छठी मईया व्रत तोहार । करिहा क्षमा छठी मईया, भूल-चूक गलती हमार॥.. ”
शारदा सिन्हा जी के गाए हुए इस गीत के ये शब्द सुनते ही मन में एक अलग ही भावनात्मक ऊर्जा भर जाती है, जो छठ पूजा की गहराई और श्रद्धा को महसूस कराती है।
मेरी छठ पूजा की सबसे खूबसूरत यादें सिमरिया घाट से जुड़ी हैं, जो केवल गंगा नदी के किनारे का एक पवित्र स्थान ही नहीं, बल्कि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जन्मभूमि भी है। उस घाट की ठंडी हवा, गीली रेत पर नंगे पैरों चलना, सूर्य की पहली किरण के साथ सूर्य देव को अर्घ्य देना और दादी के हाथों में सूप थामे मेरे बचपन का सबसे अनमोल हिस्सा है। दादी के गुनगुनाए छठ गीतों में वह मिठास, श्रद्धा और विश्वास होता था जो सांसों में घुलकर हर एक को अपने भीतर से जोड़ देता था। खासतौर पर जब शारदा सिन्हा के छठ गीत बजते, तो जैसे पूरा वातावरण भावनाओं की सच्ची नदी में तैरने लगता था। उनकी आवाज़ में मधुरता और आध्यात्मिक ऊर्जा इतनी गहरे उतरती है कि सुनने वाला अपने दर्द और सुख दोनों को महसूस करता है। ये गीत श्रद्धालुओं के दिलों को छू जाते हैं, जो छठ पर्व की आत्मा से सीधे जुड़ते हैं।
जीवन की तपस्या, श्रद्धा और प्रेम का साक्षात उत्सव
छठ पूजा सिर्फ त्योहार नहीं है, यह हमारे जीवन की तपस्या, श्रद्धा और प्रेम का साक्षात उत्सव है। यह पर्व हमें सिखाता है कि परंपरा में छुपा हुआ अनुशासन, संबंधों में गहराई और प्रकृति से जुड़ाव कितना महत्वपूर्ण है। निर्जला व्रत राखना, सूर्योदय और सूर्यास्त के समय सूर्यदेव को नमन करना, और शुद्ध जल में खड़े रहकर अर्घ्य देना, ये सब केवल आध्यात्मिक क्रिया नहीं, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी हैं। सूर्य की रोशनी विटामिन D का सबसे प्राकृतिक स्रोत है, जो हमारी हड्डियों और त्वचा के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है। जल में खड़े रहना शरीर से विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालता है, मन को शांत करता है और इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाता है। शुद्ध, प्राकृतिक आहार और उपवास से हमारे शरीर का डिटॉक्स होता है, और ऊर्जा का संचार होता है। छठ पूजा के दौरान घाटों और नदियों की सफाई यह संदेश देती है कि प्रकृति का सम्मान करना हमारे धर्म और अस्तित्व का सबसे बड़ा हिस्सा है।
सिमरिया घाट का सांस्कृतिक महत्व
छठ पूजा के दौरान सिमरिया घाट की पवित्रता और उसके सांस्कृतिक महत्व का कोई मुकाबला नहीं। यह वही जगह है जहां रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने जन्म लेकर हमारे साहित्य, देशभक्ति और संस्कार को नई ऊंचाइयां दीं। सिमरिया की धरती छठ पूजा के जल, मिट्टी, और सूरज की उन किरणों की तरह है जो हमें हमारे इतिहास और संस्कृति से जोड़ती हैं। इस घाट की हवा में देश प्रेम और आध्यात्मिकता की खुशबू है जो हर श्रद्धालु को अंदर तक भावुक कर देती है। शारदा सिन्हा के छठ गीत, जैसा कि दादी गुनगुनाती थीं, हमारी भावनाओं का प्रतिबिंब हैं। उनके स्वर में सुकून, प्यार और मातृत्व की ममता झलकती है। इस गीत को सुनते ही मन भावुक हो उठता है, मानो हर दर्द, हर पीड़ा उसके सुरों में पिघल जाती है। यह गीत केवल संगीत नहीं, बल्कि हमारी आत्मा की आवाज़ है, जो छठ पूजा की गहराई को महसूस करने पर मजबूर करता है।
प्रकृति, सूर्य, जल और धरती के प्रति सम्मान
छठ पूजा सनातन धर्म की गहरी जड़ है। यह हमें प्रकृति, सूर्य, जल और धरती के साथ सम्मान और संतुलन सिखाती है। आस्था, तपस्या और सेवा — ये तीनों ही छठ पूजा की आत्मा हैं। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि जीवन में संयम, सादगी, और समर्पण से बड़ी से बड़ी मुश्किल भी सहज लगने लगती है। छठ पूजा मनाने वाली महिलाएं और पुरुष अपने कर्त्तव्यों और तपस्या के माध्यम से परिवार को मजबूत बनाते हैं, समाज को एकजुट करते हैं और प्रकृति का संरक्षण करते हैं। “सूरज से प्यार, धरती से सेवा, जल से शुद्धता।” यह सरल लेकिन गहरा संदेश हमें पर्यावरण के संरक्षण की याद दिलाता है और हमसे जिम्मेदारी लेने को कहता है।
इस पावन पर्व पर जब हम घाटों पर खड़े होकर सूर्य को अर्घ्य देते हैं, तो केवल अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक नई ऊर्जा का संचार करते हैं। आपके मन में जब छठ गीत बजते सुनाई दें, तो उस भावना को महसूस कीजिए — प्रेम, त्याग, और विश्वास का जो कभी खत्म न हो।
छठ पर्व का विज्ञान
इस पर्व का विज्ञान हमें बताता है कि सूर्य की विटामिन D किरणें हमारे शरीर के लिए कितनी उपयोगी हैं, जल स्नान कैसे हमारे स्वास्थ्य को सुधारता है, और पूरा व्रत उर्जा और मानसिक शांति देता है। पर्यावरण की सफाई इसी पर्व की एक महत्वपूर्ण सीख है, जिससे हम प्रकृति की रक्षा करें और आने वाली पीढ़ियों को शुद्ध धरती सौंपें।
छठ पूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि जीवन का हिस्सा है। आइए, हम सब मिलकर सूर्य की किरणों की तरह उजियारा फैलाएं — प्रकृति का सम्मान करें, परिवार का प्रेम बढ़ाएं, और सनातन धर्म के आदर्शों को अपने जीवन में अमर करें। यही छठ पूजा का सच्चा अर्थ है, यही हमारी जिम्मेदारी है।
“जब अस्ताचल की ओर बढ़ता सूरज छठी मईया की आरती में नतमस्तक होता है, तब हर अर्घ्य के साथ हम न केवल सूर्य को जल चढ़ाते हैं, बल्कि अपने जीवन के अंधकार को भी प्रकाश में बदलने का संकल्प दोहराते हैं।”















