जिन्ना के देश के आका चीन ने उस अरुणाचल प्रदेश में तवांग से महज 100 किलोमीटर अंदर अपने सैन्य हवाई अड्डे को तेजी से विस्तार दिया है, जिसे वह ‘दक्षिणी तिब्बत’ कहकर ‘अपना हिस्सा’ बताता है। उस क्षेत्र की ताजा तस्वीरों से हुआ यह खुलासा क्या भारत के लिए एक गहन चिंता की बात है, क्योंकि इसमें करीब 35 हैंगर हैं जिनमें लड़ाकू विमान और हेलीकाप्टर रखे जाएंगे?
भारत—चीन सीमा के एकदम पास स्थित यह चीनी लहुंजे एयरबेस गत एक साल में तेजी बनाया गया है। इस एयरबेस में करीब 35 मजबूत हैंगर और शेल्टर बनाए गए हैं, जिनमें लड़ाकू विमान, हेलीकाप्टर और भारी हथियार रखे जाएंगे। इस अपग्रेड के दौरान एप्रन और अन्य सुविधाओं का भी विकास हुआ है, जिससे भारी ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट भी यहां से संचालित हो सकेंगे। इस हवाई अड्डे का विस्तार चीन की सैन्य ताकत को भारत की सीमा के बेहद करीब लाने का संकेत है, जिससे भारत के लिए यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील और चिंता का विषय बन गया है।
बीते कुछ साल में चीन ने अरुणाचल प्रदेश की सीमा के पास अपने सैन्य बुनियादी ढांचे को विस्तार देने के लिए कई बड़े कदम उठाए हैं, जिसमें हेलीपोर्ट और अन्य सैन्य आधारों का निर्माण और पहले से मौजूद अड्डों का आधुनिकीकरण शामिल है। साफ है कि बीजिंग की ये गतिविधियां पूर्वी सीमा पर नियंत्रण बढ़ाने के उद्देश्य से हैं और भारत के खिलाफ किसी भी संभावित टकराव की स्थिति में चीन को हवाई श्रेष्ठता प्रदान कर सकती हैं। विशेष रूप से अरुणाचल प्रदेश से लगी सीमा पर हो रही सैन्य साज-सज्जा भारत की भौगोलिक कठिनाइयों को देखते हुए चीन को लाभ की स्थिति में रख सकती है, क्योंकि इस इलाके में सड़क और जमीन से सैनिकों की त्वरित आवाजाही कठिन है, इसलिए हवाई सुविधा अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।
भारत के लिए यह चुनौती कई मायने में महत्वपूर्ण है। पहला, चीन का यह कदम सुरक्षा संतुलन को प्रभावित करता है क्योंकि चीन भारत से सटी सीमा के करीब ऐसे एयरबेस से लड़ाकू विमानों और हथियारों को तेजी से तैनात कर सकता है। दूसरा, यह भारत को अपनी सीमा सुरक्षा रणनीति और सैन्य तैनाती को बढ़ाने पर मजबूर करता है ताकि किसी आकस्मिक स्थिति में प्रभावी जवाबी कार्रवाई की जा सके। तीसरा, इसके चलते भारत ने भी अपनी सैन्य तैनाती और अवसंरचना में सुधार शुरू कर दिया है, जैसे कि ब्रह्मोस सुपरसोनिक मिसाइलों की तैनाती की जा रही है और पूर्वी राज्य में विमान और अन्य सैन्य साधनों की संख्या बढ़ाई जा रही है।
भविष्य में संभव है कि चीन इस एयरबेस का उपयोग भारत-चीन के बीच किसी भी सीमा विवाद या सैन्य संघर्ष होने की स्थिति में अपनी वायु शक्ति का विस्तार करने के लिए करे। यह उसे त्वरित सैन्य तैनाती, आपूर्ति मार्गों की रक्षा और क्षेत्र में दबदबा बनाने में सक्षम बनाएगा। इसलिए, यह विस्तार भारत के सामरिक हितों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है और उससे निपटने के लिए भारत को अपनी सामरिक तैयारियों और सीमा प्रबंधन में सतर्कता बढ़ानी होगी। और भारत के रक्षा विशेषज्ञ क्योंकि चीन की मंशाओं को भलीभांति जानते हैं इसलिए भारत के सैन्य नीतिकारों ने इस पर काम करना बहुत पहले शुरू कर दिया था।
असल में, चीन के इस सैन्य विस्तार का मतलब केवल बुनियादी ढांचे का विकास नहीं हो सकता, यह भूराजनीति में भारत के साथ बढ़ती तनावपूर्ण स्थिति में उसकी सैन्य रणनीतिक स्थिति मजबूत करना भी है। भारतीय सुरक्षा एजेंसियों और नीति निर्माताओं के लिए महत्वपूर्ण है कि वे इस संकेत की गंभीरता का पुख्ता अंदाजा लगाकर सामरिक, कूटनीतिक एवं क्षेत्रीय सहयोग के माध्यम से चीन की इस सैन्य गतिविधि का जवाब प्रभावी ढंग से दें।
सीमा के पास विस्तारवादी कम्युनिस्ट चीन की यह गतिविधि क्षेत्र की भौगोलिक-सामरिक स्थिति को बदलने वाली है और भारतीय सुरक्षा, खासकर पूर्वी सीमाओं की हवाई सुरक्षा के लिहाज से सावधान रहने को कहती है। इसलिए इसका असर न केवल सैन्य बल्कि राजनीतिक, आर्थिक और क्षेत्रीय स्थिरता पर भी पड़ेगा, जिसके चलते भारत को बहुआयामी रणनीति के तहत इस स्थिति से निपटना होगा। यह जरूर है कि इधर कुछ समय से भारत और चीन के शीर्ष नेतृत्व के बीच संबंधों को वापस पटरी पर लाने और द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाने को लेकर गंभीर चर्चा हुई है और दोनों ही देश विकास में साथ चलने को राजी भी हुए हैं, लेकिन कोई भी देश अपनी सामरिक स्थिति का सतत मूल्यांकन करते हुए उस दृष्टि से आवश्यक कदम उठाता ही है। भारत की केन्द्र सरकार इस बात को अच्छे से जानती है।
वैसे, भारत और चीन की वायुसेनाओं की तुलना समीक्षा करें तो दोनों में एक बड़ा फर्क होते हुए भी रैंकिंग में भारत चीन से एक पायदान पहले है और विश्व में तीसरी सबसे बड़ी वायुसेना शक्ति है। 2025 तक के आंकड़ों और रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायुसेना के पास लगभग 1700 विमान हैं, जबकि चीनी वायुसेना के पास लगभग 3300 विमान हैं। भारत के पास लगभग 900 लड़ाकू विमान हैं तो चीन के पास लगभग 1200-1700 लड़ाकू विमान हैं।
अन्य विमानों और संसाधनों की बात करें तो भारत के पास लगभग 899 हेलीकॉप्टर और 6 एरियल टैंकर हैं। चीन के पास 931 हेलीकॉप्टर और 10 एरियल टैंकर हैं। भारत के पास 270 ट्रांसपोर्ट विमान हैं, जबकि चीन के पास 289 हैं। दरअसल इधर गत लगभग 10 वर्ष से भारत ने सैन्य आधुनिककरण पर जोर दिया है, जिसमें राफेल, सुखोई-30 एमकेआई और तेजस जैसे विमान शामिल हैं।
चीन के पास जे-20 और जे-35 जैसे पांचवीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान हैं। उसके पास अधिक आधुनिक हवाई चेतावनी और नियंत्रण (AWACS) विमान और लड़ाकू ड्रोन हैं। लेकिन अनुभव और ऑपरेशन के मामले में भारतीय वायुसेना के पायलटों के पास उच्च ऊंचाई पर लड़ाकू अभियानों का अधिक अनुभव है।

















