वाशिंगटन में एक अलग ही तनाव उभर रहा है। इस्लामोफोबिया से ग्रस्त उस देश में यह बहस गहराती जा रही है कि इस्लामी देशों के ‘शरणार्थियों’ को कितना और सहा जाए? रिपब्लिकन कांग्रेसमैन ब्रैंडन गिल ने इस पर एक देशभक्त अमेरिकी जैसा बर्ताव किया तो वहां के इस्लामवादी बिफर गए। गिल को भी चिंता है कि किस कदर मध्य एशियाई मुस्लिम देशों के ‘शरणार्थी’ तेजी से उनके देश और पश्चिम के अन्य देशों में जाकर वहां अराजकता पैदा कर रहे हैं और उन देशों की ‘सेकुलर’ सरकारें उलटे असल नागरिकों को ही ‘नस्लवाद’ फैलाने का दोषी ठहरा रही हैं। सांसद गिल ने अल जजीरा के अमेरिकी—ब्रिटिश पत्रकार मेहदी हसन अजान विवाद को लेकर खरी खरी सुनाई है। उन्होंने बेशक, अमेरिका में पांथिक स्वतंत्रता, इस्लामोफोबिया और बहुसांस्कृतिक समाज की मर्यादाओं पर एक गहन बहस छेड़ दी है।
दरअसल, अमेरिका के टेक्सास प्रांत से रिपब्लिकन कांग्रेसमैन ब्रैंडन गिल और ब्रिटिश-अमेरिकी पत्रकार मेहदी हसन के बीच यह विवाद तब शुरू हुआ जब हसन ने एक वीडियो में अमेरिका में मस्जिदों से अजान दिए जाने का समर्थन किया। उन्होंने कहा, “अगर चर्च की घंटियां बज सकती हैं, तो मस्जिदों से अजान भी दी जा सकती है। हम भी उतने ही अमेरिकी हैं जितने कोई और, और किसी से डरने की जरूरत नहीं है।”
इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए सांसद गिल ने हसन को ‘यूके वापस जाने’ की सलाह दी और आरोप लगाया कि हसन जैसे लोग अमेरिका की बहुलतावादी संस्कृति को ‘बुनियादी रूप से बदलने’ की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने हसन से यह भी कहा कि “अगर आपका मुस्लिम देश में रहने का मन है तो ब्रिटेन जाकर रहो।”
अमेरिका का संविधान पांथिक स्वतंत्रता की गारंटी देता है। पहले संशोधन के तहत किसी भी मत के पालन, प्रचार और अभ्यास की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। इसे ही आड़ बनाकर हसन ने तर्क रखा था कि यदि चर्च की घंटियों को बजने अनुमति है, तो अजान देने को क्यों नहीं?
लेकिन रिपब्लिकन सांसद गिल का विरोध मजहब को लेकर नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान के संकट से जुड़ा है। वे इसे अमेरिका की असल पहचान पर खतरे के रूप में देखते हैं। गिल ने अपने तर्क में ब्रिटेन का उदाहरण दिया। असल में आज यह कोई छुपी बात नहीं है कि उस देश का तेजी से इस्लामीकरण हो रहा है और लेबर पार्टी की स्टार्मर सरकार इसे रोकने के बजाय बढ़ावा देती दिख रही है। गिल का बयान दरअसल ब्रिटेन में मुस्लिम ‘शरणार्थियों’ के बढ़ते आतंक और कई जिलों में शरिया कानून की मांग उठने जैसे मुद्दों की ओर भी इशारा करता है।
ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी लगभग 6.5 प्रतिशत है, और वहां पांथिक स्वतंत्रता के तहत मस्जिदों से अजान देने की अनुमति है। आज ब्रिटेन के स्कूलों तक में ‘कुरान’ और ‘इस्लाम के मूल्यों’ के बारे में पढ़या जा रहा है। खुद मुस्लिम स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कह सकते हैं, ब्रिटेन इस्लामीकरण के निशाने पर है।
हसन ने बाकी जगहों की तरह अमेरिका में भी गिल के बयानों को ‘नस्लवादी’ और ‘मजहब विरोधी’ ठहरा दिया। उसने कहा कि मुसलमानों ने अमेरिका के निर्माण में योगदान दिया है और वे भी उतने ही अमेरिकी हैं जितना कोई और। उसने यह भी याद दिलाया कि अमेरिका ‘प्रवासियों का देश’ है, और पांथिक विविधता उसकी ताकत है।
इस विवाद ने अमेरिका में सहिष्णुता और बहुसांस्कृतिक चलन की हदों पर बहस छेड़ी है। एक लोकतांत्रिक समाज में एक मजहब के वर्चस्व की कोशिश करके वहां दारुल इस्लाम का एजेंडा चलाने वाले तत्व पश्चिम के अधिकांश देशों में यही बर्ताव कर रहे हैं। बहुसंख्यक संस्कृति की आड़ में इलाकों पर शरियाई कानून थोपने की वकालत कर रहे हैं।
Mehdi Hasan to American Christians: "If you can have your church bell, we can have our Islamic prayer call" pic.twitter.com/Oy1IroBqS1
— End Wokeness (@EndWokeness) October 21, 2025
गिल द्वारा हसन को इन शब्दों में पलटवार किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर एक बहस छिड़ गई है जिसमें यूजर्स गिल और हसन, दोनों के साथ बड़ी संख्या में खड़े दिखते हैं। गिल के साथ असल में ऐसे लोग हैं जो ‘शरणार्थी’ बनकर आए इस्लामवादियों की अराजकता और पाशविकता को अपनी आंखों देख चुके हैं, तो हसन के साथ अधिकांशत: फिलिस्तीन समर्थक और खुद को ‘शरणार्थी’ के बाने में ढककर सरकार की मुफ्त मिल रही सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं।

















