मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारत की सांस्कृतिक एकता के सशक्त आधार
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मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम भारत की सांस्कृतिक एकता के सशक्त आधार

प्रभु श्रीराम का जीवन चरित्र कथा का केंद्र बिन्दु है। श्रीराम युग पुरुष है, धर्म की प्रतिमूर्ति हैं, नरश्रेष्ठ हैं। राम सनातन संस्कृति के केद्र बिन्दू हैं और हर सनातनी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं।

Written byराकेश सैनराकेश सैन — edited by Shivam Dixit
Oct 19, 2025, 10:02 pm IST
inभारत
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

आज दीपावली है, त्रेता युग में इसी दिन भगवान श्री राम रावण सहित सभी दुष्टों का वध करके चौदह वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे। अपने राजा राम की वापसी का जश्न मनाते हुए न केवल अयोध्यावासियों ने बल्कि पूरे देश ने दीपों की माला से उनका स्वागत किया। दीपावली केवल यहीं तक सीमित नहीं बल्कि प्रारम्भ है देश में रामराज्य की स्थापना का। श्रीरामायण त्रेतायुग की ऐतिहासिक कथा है।

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम आदर्श जीवन और धर्म के प्रतीक

प्रभु श्रीराम का जीवन चरित्र कथा का केंद्र बिन्दु है। श्रीराम युग पुरुष है, धर्म की प्रतिमूर्ति हैं, नरश्रेष्ठ हैं। राम सनातन संस्कृति के केद्र बिन्दू हैं और हर सनातनी के लिए प्रेरणा के स्रोत हैं। महानतम योद्धाओं में श्रीराम के गुणों को लेकर हमारे संतों, ऋषियों-मुनियों ने इस प्रकार लिखा है। श्रीराम विलक्षण व्यक्तित्व, अत्यंत वीर्यवान, तेजस्वी, विद्वान, धैर्यशील, जितेंद्रिय, बुद्धिमान, सुंदर, पराक्रमी, दुष्टों का दमन करने वाले, युद्ध एवं नीति कुशल, धर्मात्मा, मर्यादा पुरुषोत्तम, प्रजावत्सल, शरणागत को शरण देने वाले, सर्वशास्त्रों के ज्ञाता हैं।

श्रीराम आदर्श पुरुष और धर्म के साक्षात रूप

श्रीराम धर्मज्ञ हैं, कृतज्ञ हैं, सत्य वक्ता हैं, दृढ़ प्रतिज्ञ हैं, चरित्रवान हैं, समर्थ हैं, सर्वहितकारी हैं, विद्वान हैं, मन पर अधिकार रखने वाले हैं, क्रोध को जीतने वाले हैं, किसी की निंदा न करने वाले और सात्विक रोष करने वाले हैं। यह सब उनके आचरण में है। श्रीराम धर्मज्ञ हैं और धर्माचरित भी। अनेक मनुष्य धर्मज्ञ (धर्म को जानने वाले) तो होते हैं, लेकिन धर्म का आचरण नहीं करते। इसलिए उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया और श्रीराम साक्षात् विग्रहवान धर्म बन गए। श्रीराम एक आदर्श पुत्र, आदर्श भाई, आदर्श मित्र, आदर्श पति, आदर्श राजा, आदर्श समाज-सुधारक और आदर्श योद्धा के श्रेष्ठतम उदाहरण हैं। श्रीराम समाज के हर घर-परिवार के सदस्य लगते हैं। उनके भीतर समस्त मानवीय गुण हैं, जहाँ देवत्व की गरिमा के द्वार खुलते हैं। तुलसीदास तो कलियुग में कहते भी हैं कि श्रीराम निर्गुण ब्रह्म होते हुए भी भक्तों के लिए शरीर धारण करते हैं। यही नहीं, उन्हें सच्चिदानंद रूपी सूर्य भी कहते हैं। राम अनंत हैं, उनके गुण अनंत हैं। हरि अनंत हरिकथा अनंता। महर्षि वाल्मीकि ने श्रीराम को अनसूयो भी कहा है।

श्रीराम आदर्श चरित्र और सांस्कृतिक प्रतीक

अनसूया नैतिक गुण है, अर्थ है-किसी की निंदा न करना, ईष्र्या न करना, दूसरे में दोष न निकालना। श्रीराम की विनम्रता उनके चरित्र को और अधिक प्रकाशित करती है। विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करने के बाद उनसे श्रीराम अत्यंत विनम्रता से कहते हैं-‘मुनिप्रवर! हम दोनों (श्रीराम और लक्ष्मण) आपकी सेवा में उपस्थित हैं। आज्ञा दीजिए, हम क्या सेवा करें?, साथ ही श्रीराम आत्मसम्मान से परिपूर्ण भी हैं। इसके अभाव में जितक्रोध और विनम्रता जैसे नैतिक मूल्य कमजोरी बन जाते हैं। उदाहरणार्थ, जब परशुराम श्रीराम के पराक्रम को हेय समझते हैं तो श्रीराम आत्मसम्मान के कारण ही उनसे कहते हैं-‘हे भार्गव! मैं क्षत्रिय धर्म से युक्त हूँ तो भी आप मुझे पराक्रमहीन और असमर्थ सा मानकर मेरा तिरस्कार कर रहे हैं। अच्छा, अब मेरा तेज और पराक्रम देखिए। श्रीराम सर्वहितकारी भी हैं, लेकिन वे दुष्ट व अत्याचारी पर दया नहीं करते। वे सज्जनों को बचाते हैं और दुष्टों को दंड देते हैं। वे ताडक़ा का वध के समय विश्वामित्रजी से कहते भी हैं-‘गो, ब्राह्मण तथा समूचे देश का हित करने के लिए मैं आप जैसे महात्मा के आदेश का पालन करने को सब प्रकार से तैयार हूं।’ तपस्वी वाल्मीकि मुनिवर नारदजी से स्वयं पूछते हैं, ‘इस समय इस संसार में गुणवान, वीर्यवान, धर्मज्ञ, उपकार मानने वाला, सत्यवक्ता और दृढ़प्रतिज्ञ कौन है? कौन है सदाचार से युक्त, समस्त प्राणियों का हितसाधक, विद्वान्, सामथ्र्यशाली और प्रियदर्शन ?

मन पर अधिकार रखने वाला, क्रोध को जीतने वाला, कांतिमान, किसी की भी निंदा नहीं करने वाला कौन है? संग्राम में कुपित होने पर जिससे देवता भी डरते हैं ?’ सुनकर नारदजी बोले ‘मुने! आपने जिन बहुत से दुर्लभ गुणों का वर्णन किया है, उनसे युक्त इक्ष्वाकु वंश में उत्पन्न हुए एक ऐसे पुरुष हैं, जो रामनाम से विख्यात हैं।’ श्रीराम के गुणों का वर्णन करते हुए नारद मुनि कहते हैं, ‘उनके कंधे मोटे और भुजाएँ बड़ी-बड़ी घुटने तक लंबी हैं; छाती चौड़ी, मस्तक सुंदर, ललाट भव्य और चाल मनोहर है। उनका शरीर मध्यम और सुडौल, देह का रंग चिकना, वक्षस्थल भरा हुआ और आँखें बड़ी-बड़ी हैं। वे धर्म के ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ तथा प्रजा के हित साधन में लगे रहते हैं। वे यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेंद्रिय और मन को एकाग्र रखने वाले हैं। वे गंभीरता में समुद्र और धैर्य में हिमालय के समान हैं। वे विष्णु भगवान् के समान बलवान, चंद्रमा के समान मनोहर, त्याग में कुबेर, सत्य मे द्वितीय धर्मराज के समान हैं। वे सच्चे अर्थों में आर्य हैं।’ इसी कारण से ब्रह्माजी महर्षि वाल्मीकि को कहते भी हैं-‘इस पृथ्वी पर जब तक नदियों और पर्वतों की सत्ता रहेगी, तब तक संसार में रामायण कथा का प्रचार होता रहेगा।’ इसका अर्थ ही है कि जब तक मानव सभ्यता है, तब तक श्रीराम जैसे व्यक्तित्व और उनसे प्रेरित भक्तों का होना आवश्यक है और समाज के लिए अपेक्षित भी। श्रीराम एक ऐसे महानायक हैं, जो सामान्य मानव का जीवन जीते हुए सुख-दु:ख, मान-अपमान और आशा-निराशा के द्वंद्वों को झेलते हुए भी आदशों, सिद्धांतों तथा जीवन-मूल्यों की सुरक्षा के लिए सदा समर्पित रहे। इसलिए वे हर युग में आदर्श हैं। श्रीराम भारत की सांस्कृतिक एकता के सशक्त आधार हैं। रामकथा देश को एक सूत्र में युगों-युगों से पिरोती आ रही है।

Topics: Lord Shri RamDiwali 2025Treta YugaRavana's killingarrival in AyodhyaIndian culture and unityRamayanaDiwali
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