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वैश्विक समीकरणों का रण और स्वदेशी का प्रण

भारत की नीति अब स्वदेशी की दिशा में आगे बढ़ रही है। रक्षा उत्पादन से लेकर तकनीकी शोध तक, हर क्षेत्र में स्वदेशी को प्राथमिकता दी जा रही है। यह न केवल आर्थिक स्वावलंबन का मार्ग है, बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता का भी आधार है।

Written byहितेश शंकरहितेश शंकर
Oct 18, 2025, 09:00 am IST
inस्वदेशी, भारत, विश्लेषण, सम्पादकीय

भारत की सभ्यता और संस्कृति का मूल भाव सदैव आत्मनिर्भरता, कौशल और सामूहिक उद्यमिता पर आधारित रहा है। भारतीय समाज ने अपने बूते अपने ज्ञान, अपनी विविधता और अपने कौशल को समझते हुए पीढ़ी दर पीढ़ी उद्यमिता को निखारा है। यही कारण है कि भारत की पहचान केवल एक उपभोक्ता समाज के रूप में नहीं, बल्कि एक सृजनशील उत्पादक और मूल्य आधारित समाज के रूप में रही है। हमारे पूर्वजों की कारीगरी, व्यापारिक नैतिकता और कला कौशल ने विश्व बाजारों में भारत को गौरव दिलाया था।

अंगस मैडिसन के सर्वे के अनुसार, वर्ष 1700 के आसपास विश्व व्यापार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 24.4 प्रतिशत थी। चीन के बाद भारत विश्व की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति था। भारत से कपास, रेशम, मसाले, इस्पात और नील जैसे उत्पाद विश्व बाजारों में निर्यात होते थे। भारत की ‘मेड इन इंडिया’ की पहचान उसी समय से थी, जो न केवल गुणवत्ता का प्रतीक थी, बल्कि स्थानीय संसाधनों पर आधारित आत्मनिर्भर उत्पादन की मिसाल भी थी।

औपनिवेशिक शासन ने जब भारतीय उद्योगों को नष्ट कर दिया, तब स्वदेशी आंदोलन से भारतीय आत्मा को पुनर्जीवित किया दादाभाई नौरोजी ने। उन्होंने अपने ऐतिहासिक भाषणों में ‘ड्रेन ऑफ वेल्थ’ का सिद्धांत प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारत की गरीबी का कारण विदेशी शोषण है और इसका समाधान स्वदेशी के पुनर्जागरण में निहित है। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वदेशी को केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक स्वतंत्रता का साधन बताया। उनके लिए स्वदेशी एक जनांदोलन था, जो आत्मगौरव और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बना।

महात्मा गांधी ने स्वदेशी को स्वावलंबन का रूप दिया चरखे से। उन्होंने केवल सूत नहीं काता, बल्कि आत्मनिर्भरता का प्रतीक गढ़ा। गांधी जी का मानना था कि स्वदेशी केवल वस्त्र पहनने का विचार नहीं, बल्कि विचार की स्वतंत्रता का प्रतीक है। उनके अनुसार जब व्यक्ति अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपने कौशल और संसाधनों पर भरोसा करता है, तभी वास्तविक स्वतंत्रता संभव होती है।

विश्व व्यवस्था में परिवर्तन शाश्वत है। हर युग में किसी न किसी क्षेत्र का वर्चस्व रहा है। औद्योगिक क्रांति के दौर में यह समय यूरोप और अमेरिका का था, लेकिन अब इतिहास फिर करवट ले रहा है। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र एशिया, विशेषकर भारत की ओर मुड़ रहा है। भारत का यह समय केवल संयोग नहीं, बल्कि अपने मूल स्वभाव से जुड़ने का परिणाम है-वह स्वभाव जो स्वदेशी का है। स्वदेशी का अर्थ सीमितता नहीं, बल्कि ‘स्व’ पर आधारित विकास है अर्थात् अपनी विशेषता अपनी प्रतिभा और अपनी परिस्थिति के अनुसार आगे बढ़ना। यह भाव केवल नीति में नहीं, बल्कि समाज अर्थव्यवस्था और व्यक्तिगत जीवन में भी दिख रहा है।

आज भारत में स्वदेशी का भाव पुनः जाग्रत हो रहा है, लेकिन एक नए रूप में। आधुनिक उद्यमिता और नवाचार के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब लाल किले से आत्मनिर्भर भारत और ‘वोकल फॉर लोकल’ की बात करते हैं तो वह गांधी जी के स्वदेशी का आधुनिक संस्करण ही है।

आज भारत में ‘मेक इन इंडिया’, ‘स्टार्टअप इंडिया’, ‘स्किल इंडिया’ और ‘डिजिटल इंडिया’ जैसे कार्यक्रम उसी स्वदेशी भावना को नई ऊर्जा दे रहे हैं। लाखों युवाओं में नवाचार की भावना विकसित हो रही है। छोटे-छोटे स्टार्टअप आज न केवल भारतीय बाजारों को बदल रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर भारतीय बुद्धिमता का परिचय दे रहे हैं।

वर्ष 2025 तक भारत में 195,782 से अधिक स्टार्टअप पंजीकृत हो चुके हैं और हजारों पेटेंट भारतीय वैज्ञानिकों और उद्यमियों के नाम पर दर्ज हैं। ये आंकड़े केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि स्वावलंबन की संस्कृति के पुनर्जन्म के संकेत हैं। भारत की नीतियों में अब आत्मनिर्भरता को केंद्र में रखा जा रहा है। उत्पादन से लेकर शिक्षा, ऊर्जा से लेकर रक्षा और कृषि से लेकर तकनीक तक, हर क्षेत्र में भारत पर भरोसे की भावना मजबूत हो रही है। यह वही भावना है, जो स्वदेशी का मूल है यानी अपने में विश्वास।

समाज भी अब स्थानीय उत्पादों को अपनाने की दिशा में बढ़ रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूह, महिला उद्यमिता, हस्तशिल्प और कृषि आधारित उद्योग इस स्वावलंबन की जड़ों को गहरा बना रहे हैं। स्वदेशी से स्वावलंबन की यह यात्रा केवल आर्थिक पुनरुद्धार नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण है। जब भारत अपने मूल स्वभाव, कौशल, नवाचार और आत्मबल पर भरोसा करता है तो वह विश्व को एक नया मॉडल देता है। आज का भारत न केवल अपने लिए, बल्कि विश्व के लिए भी एक उदाहरण बन रहा है कि कैसे परंपरा और प्रौद्योगिकी का संगम सतत विकास का मार्ग बन सकता है।

भारत की यह कहानी केवल बीते गौरव की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि भविष्य के आत्मविश्वास की घोषणा है। स्वदेशी की शक्ति पर खड़ा भारत ही स्वावलंबी भारत है। भारत की यात्रा स्वदेशी से स्वावलंबन की यात्रा है, जहां आत्मविश्वास कौशल और संस्कृति मिलकर एक नई आर्थिक चेतना का निर्माण कर रहे हैं। आज जब भारत का युवा अपने विचारों से विश्व को दिशा दे रहा है तो यह स्पष्ट है कि भारत का समय आ गया है, वह समय जो अपने मूल स्वभाव, अपने स्वदेशी विचार और अपने स्वावलंबन के बल पर विश्व में भारत का मस्तक ऊंचा रखेगा।

आज भू-राजनीति यानी वैश्विक समीकरणों का रण केवल सैन्य शक्ति या आर्थिक संसाधनों पर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और नवाचार की क्षमता पर टिका है। ऐसे में भारत के लिए स्वदेशी का प्रण ही सबसे बड़ी शक्ति बन सकता है, जब कोई राष्ट्र अपने संसाधनों, अपने उद्योग, अपने कौशल और अपनी तकनीक पर भरोसा करता है तो वह किसी भी वैश्विक दबाव से मुक्त होकर आत्मविश्वास से आगे बढ़ सकता है।

भारत की नीति अब इसी दिशा में आगे बढ़ रही है। रक्षा उत्पादन से लेकर तकनीकी शोध तक, हर क्षेत्र में स्वदेशी को प्राथमिकता दी जा रही है। यह न केवल आर्थिक स्वावलंबन का मार्ग है, बल्कि रणनीतिक स्वतंत्रता का भी आधार है। आज की भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में वही देश अग्रणी होंगे जो अपने बूते पर खड़े होंगे। भारत का स्वदेशी प्रण उसे इसी राह पर ले जा रहा है, जहां वह विश्व मंच पर आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता, दोनों का प्रतीक बनेगा।

X@hiteshshankar

Topics: रणनीतिक स्वतंत्रता Strategic independenceमेक इन इंडिया (Make in Indiaहितेश शंकरवोकल फॉर लोकल (Vocal for Local)आत्मनिर्भरतातकनीकी शोध (Technological researchस्वदेशीउद्यमिता (Entrepreneurship)Swadeshiस्टार्टअप (Startup)पाञ्चजन्य विशेषड्रेन ऑफ वेल्थ (Drain of Wealth)नवाचार (Innovation)स्वदेशी Swadeshiस्वावलंबन Self-reliance/Autarkyवैश्विक समीकरण
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हितेश शंकर पत्रकारिता का जाना-पहचाना नाम, वर्तमान में पाञ्चजन्य के सम्पादक [Read more]
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