Diwali 2025: इस दिवाली अपनाएं स्वदेशी, भारतीय दीयों और मिठाइयों से बढ़ाएं संस्कृति और कारीगरों का सम्मान
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Diwali 2025: इस दिवाली अपनाएं स्वदेशी, भारतीय दीयों और मिठाइयों से बढ़ाएं संस्कृति और कारीगरों का सम्मान

आज स्वदेशी हस्तशिल्प और पारंपरिक भारतीय उत्पाद विदेशों में भी बहुत मांग में हैं। मिट्टी के बने दीयों, हाथ से बुने कपड़े, हस्तनिर्मित लकड़ी और धातु की सजावट- ये सभी न केवल भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि विदेशों में भी अपनी जगह बना चुके हैं।

Written byMahak SinghMahak Singh
Oct 11, 2025, 05:23 pm IST
inभारत

दिवाली केवल दीपों का त्योहार नहीं है बल्कि हमारी भारतीय संस्कृति और परंपरा का प्रतीक भी है। यह पर्व अंधकार पर प्रकाश की विजय, बुराई पर अच्छाई की जीत और विदेशी प्रभावों से दूर रहकर अपने मूल्यों को अपनाने का संदेश देता है। हर दीपक, हर मिठाई और हर सजावटी आइटम में हमारी संस्कृति की गहरी जड़ें छिपी हुई हैं।

आज के समय में बाजारों में विदेशी वस्तुओं का प्रचलन बढ़ गया है- चॉकलेट, सजावटी आइटम, प्लास्टिक के खिलौने और चमकदार लाइट। ये चीजें आकर्षक जरूर लगती हैं लेकिन सच्चा त्योहार केवल स्वदेशी चीजों में ही महसूस किया जा सकता है। मिट्टी के दीये, देशी घी की मिठाइयां और कारीगरों द्वारा तैयार किए गए पारंपरिक सजावटी सामान न केवल हमारे त्योहार को असली बनाते हैं, बल्कि भारतीय शिल्पकला और सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखते हैं।

हमारे कारीगर, जो महीनों मेहनत करते हैं, हर दीपक को हाथ से तराशते हैं, मिठाइयों को पारंपरिक तरीके से बनाते हैं और सजावट के हर छोटे-बड़े टुकड़े में कला का जादू भरते हैं। इनकी मेहनत केवल हमारे घरों में रौनक नहीं लाती, बल्कि पूरी दुनिया में भारत की पहचान को मजबूती देती है। आज स्वदेशी हस्तशिल्प और पारंपरिक भारतीय उत्पाद विदेशों में भी बहुत मांग में हैं। मिट्टी के बने दीयों, हाथ से बुने कपड़े, हस्तनिर्मित लकड़ी और धातु की सजावट- ये सभी न केवल भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं बल्कि विदेशों में भी अपनी जगह बना चुके हैं।

इस दिवाली, स्वदेशी उत्पादों को अपनाना सिर्फ खरीदारी का विकल्प नहीं, बल्कि एक सामाजिक संदेश भी है। यह संदेश देता है कि हम अपनी परंपरा और संस्कृति को महत्व देते हैं और विदेशी वस्तुओं की चमक में खो जाने के बजाय अपने कारीगरों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का समर्थन करते हैं। मिट्टी के दीयों की रोशनी, देशी मिठाइयों की मिठास, और पारंपरिक सजावट- इन सबमें केवल त्योहारी आनंद ही नहीं है, बल्कि यह हमारे भारत की आत्मा और संस्कृति का प्रतीक भी हैं।

जब हम स्वदेशी को अपनाते हैं, तो हम अपने इतिहास, परंपरा और कारीगरों के कौशल को सम्मान देते हैं। हमारी मेहनत और हुनर दुनिया भर में सराहे जाते हैं और विदेशों में इनकी मांग लगातार बढ़ रही है। इस प्रकार, स्वदेशी अपनाना न केवल हमारी संस्कृति को बचाने का माध्यम है, बल्कि हमारे कारीगरों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और भारत की शिल्पकला को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने का भी जरिया है। इस दिवाली, चलिए हम विदेशी चमक के बजाय अपने देश की मिट्टी, अपने कारीगरों की मेहनत और अपनी संस्कृति की असली रोशनी को घर-घर तक फैलाएं। असली दिवाली वही है जिसमें हमारा गौरव, हमारी परंपरा और हमारे कारीगरों का सम्मान झलकता है। इस दिवाली, दीपों की रोशनी सिर्फ अंधकार मिटाने के लिए नहीं, बल्कि स्वदेशी अपनाने और भारतीय संस्कृति का उत्सव मनाने के लिए भी जलाएं।

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Mahak Singh
Mahak Singh
2022 में ज़ी न्यूज़ से पत्रकारिता की शुरुआत की। उसके बाद न्यूज़ नेशन, दैनिक जागरण और न्यूज़ 24 जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए पत्रकारिता के विभिन्न आयामों का अनुभव प्राप्त किया। वर्तमान में पाञ्चजन्य में सब एडिटर के रूप में कार्यरत हूं। ज़िमा ज़ी इंस्टीट्यूट ऑफ मीडिया आर्ट्स से मैने पत्रकारिता की है। [Read more]
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