जब भारत विदेशी शासन के अधीन संघर्ष कर रहा था, तब स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा 1875 में स्थापित आर्य समाज गुलाम भारत में अज्ञानता और असमानता के अंधकार के बीच प्रकाश के सूर्य की तरह उभरा। यह बात ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने कही। मुख्यमंत्री श्री माझी भुवनेश्वर के चंद्रशेखरपुर स्थित रेलवे ऑडिटोरियम में आयोजित आर्य महासम्मेलन-2025 में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। यह कार्यक्रम आर्य समाज की 150वीं स्थापना वर्षगांठ के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था।
मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि हम पिछले 150 वर्षों पर नजर डालें तो भारत के पुनर्जागरण में आर्य समाज का योगदान अतुलनीय रहा है। आर्य समाज केवल एक धार्मिक सुधार आंदोलन नहीं था, बल्कि एक नैतिक, शैक्षिक और सामाजिक क्रांति थी। उन्होंने आगे कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती एक ऐसे संत थे जिन्होंने अंधविश्वास, जातिवाद और सामाजिक बुराइयों को चुनौती देने का साहस किया। उनके नेतृत्व में आर्य समाज ने शिक्षा, महिला सशक्तिकरण और वैदिक शिक्षाओं के पुनरुद्धार के माध्यम से भारत में एक नई चेतना का संचार किया।
स्वामी दयानंद के मार्गदर्शन में आर्य समाज ने बाल विवाह का विरोध किया, महिला शिक्षा को बढ़ावा दिया, विधवा पुनर्विवाह के बारे में जागरूकता बढ़ाई और समाज को एक नई दिशा दी। मुख्यमंत्री ने कहा कि आज जब हम महिला सशक्तिकरण, समावेशी विकास और जमीनी स्तर पर महिला नेतृत्व को प्रोत्साहित करने की दिशा में काम कर रहे हैं, तो यह स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा दिखाए गए मार्ग पर ही चल रहा है।
युवा समुदाय को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती युवा सशक्तिकरण के प्रथम प्रणेता थे। उन्होंने युवाओं से महर्षि दयानंद के सिद्धांतों और आदर्शों से प्रेरित होकर स्वयं को जागृत करने, अपनी अंतर्निहित शक्ति पर विश्वास रखने तथा विवेक विकसित करने का आह्वान किया। इस अवसर पर मुख्यमंत्री एवं अतिथियों ने एक स्मारिका का विमोचन भी किया। कार्यक्रम में उत्कल आर्य प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष स्वामी व्रतानंद सरस्वती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह क्षेत्र प्रचारक श्री जगदीश प्रसाद खाड़ांगा और आर्य प्रतिनिधि सभा (नई दिल्ली) के उपाध्यक्ष श्री योगेंद्र खट्टर ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का स्वागत भाषण उत्कल आर्य प्रतिनिधि सभा के कार्यकारी अध्यक्ष पंडित वीरेन्द्र कुमार पंडा ने दिया।

















